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Army Air Defence Day | आर्मी एयर डिफेंस डे: दुश्मन के हवाई हमलों को मिट्टी में मिला देगा ‘आकाशतीर’, भारतीय सेना की वो ढाल जिसे भेदना नामुमकिन

नई दिल्ली: 10 जनवरी का दिन भारतीय सेना के उन साइलेंट योद्धाओं को समर्पित है, जिनकी नजरें हमेशा आसमान पर टिकी रहती हैं. आर्मी एयर डिफेंस डे सिर्फ एक तारीख नहीं है. यह उस अभेद्य सुरक्षा कवच का प्रतीक है, जो दुश्मन के हवाई मंसूबों को पलक झपकते ही नाकाम कर देता है. चाहे फाइटर जेट हों, मिसाइलें हों या कामिकेज ड्रोन भारतीय सेना की एयर डिफेंस कोर हर चुनौती के लिए तैयार है.

आज जब युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और आसमान से खतरे कई गुना बढ़ चुके हैं, तब ‘आकाशतीर’ जैसी अत्याधुनिक डिजिटल प्रणाली भारतीय रक्षा तंत्र को नई ऊंचाई पर ले जा रही है. यही वजह है कि आर्मी एयर डिफेंस को भारतीय सेना की वह ढाल माना जाता है, जिसे भेद पाना दुश्मन के लिए लगभग असंभव है.

क्यों खास है आर्मी एयर डिफेंस डे?

10 जनवरी 1994 को भारतीय सेना की वायु रक्षा इकाई को आर्टिलरी से अलग कर एक स्वतंत्र कोर का दर्जा दिया गया था. यही दिन आज ‘आर्मी एयर डिफेंस डे’ के रूप में मनाया जाता है. यह दिन उन गनर्स और ऑपरेटरों को समर्पित है, जो बिना किसी शोर-शराबे के देश के आसमान की हिफाजत करते हैं और हर संभावित हवाई हमले को जमीन पर ही ढेर कर देते हैं.

(फोटो ANI)

कैसे हुई भारतीय वायु रक्षा की शुरुआत?
भारतीय सेना में वायु रक्षा की नींव द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पड़ी. 15 सितंबर 1940 को मुंबई के कोलाबा में पहले एंटी-एयरक्राफ्ट ट्रेनिंग सेंटर की स्थापना हुई. आजादी के बाद 1947 में भारत को सीमित संसाधन मिले, लेकिन इन्हीं संसाधनों के सहारे एयर डिफेंस ने खुद को मजबूत किया और धीरे-धीरे एक शक्तिशाली कोर का रूप ले लिया.

1971 का युद्ध: जब आसमान में गूंजी एयर डिफेंस की दहाड़

1971 के भारत-पाक युद्ध में आर्मी एयर डिफेंस ने अपनी असली ताकत दिखाई. बिना आधुनिक रडार सिस्टम के, भारतीय गनर्स ने पाकिस्तानी ‘साबर जेट’ को मार गिराया. अरुमुगम पी. जैसे जांबाज सैनिकों ने यह साबित कर दिया कि तकनीक से ज्यादा अहम होता है हौसला और सटीक रणनीति.

क्या है ‘आकाशतीर’ और क्यों है यह गेम चेंजर?

‘आकाशतीर’ भारतीय सेना की डिजिटल रीढ़ मानी जाती है. यह एक नेटवर्क-सेंट्रिक एयर डिफेंस सिस्टम है, जो देशभर के रडार, मिसाइल यूनिट्स और गन सिस्टम को एक प्लेटफॉर्म पर जोड़ता है. यह पलभर में तय कर लेता है कि आसमान में उड़ रही चीज दोस्त है या दुश्मन. सेना ने 2026 को ‘नेटवर्किंग और डेटा-सेंट्रिसिटी का वर्ष’ घोषित किया है, जिसमें आकाशतीर की भूमिका सबसे अहम है.

(फोटो ANI)

ऑपरेशन सिंदूर ने कैसे साबित की ताकत?

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुश्मन ने बड़ी संख्या में चीनी ड्रोन और शॉर्ट-रेंज मिसाइलों से हमला किया. लेकिन आर्मी एयर डिफेंस की 23 मिमी ट्विन बैरल गन और आकाशतीर नेटवर्क ने इन सभी खतरों को सीमा पार करने से पहले ही नष्ट कर दिया. इस ऑपरेशन ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत ड्रोन-केंद्रित युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार है.

भविष्य की तैयारी: ड्रोन और डेटा वॉर

आज के दौर में खतरे सिर्फ फाइटर जेट तक सीमित नहीं हैं. कामिकेज ड्रोन, लॉइटरिंग म्युनिशन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर नई चुनौतियां हैं. इन्हीं को ध्यान में रखते हुए आर्मी एयर डिफेंस ‘अश्वनी’ जैसी विशेष ड्रोन यूनिट्स के साथ मिलकर एक मल्टी-लेयर सुरक्षा घेरा तैयार कर रही है.

सेना वायु रक्षा कॉलेज: जहां तैयार होते हैं आसमान के रक्षक
ओडिशा के गोपालपुर में स्थित आर्मी एयर डिफेंस कॉलेज अत्याधुनिक सिमुलेटर और लाइव फायर रेंज से लैस है. यहां जवानों को सिर्फ निशाना लगाना नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और हाई-टेक सिस्टम ऑपरेशन में भी माहिर बनाया जाता है.

आर्मी एयर डिफेंस डे का संदेश

हर साल 10 जनवरी को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है. यह दिन याद दिलाता है कि जब तक आर्मी एयर डिफेंस की नजरें आसमान पर हैं, तब तक भारत की सरहदें सुरक्षित हैं.

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