केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में खामोश खतरा! अफ्रीकन कैटफिश बिगाड़ रही पूरा इकोसिस्टम, बढ़ी वन विभाग की चिंता

Last Updated:June 17, 2026, 09:47 IST
Keoladeo National Park African Catfish Threat: पक्षियों के स्वर्ग कहे जाने वाले केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में अफ्रीकन कैटफिश का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. मांगुर नाम से जानी जाने वाली यह मछली जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने के साथ प्रवासी पक्षियों के भोजन स्रोत को भी प्रभावित कर रही है. डीएफओ चेतन कुमार के अनुसार, यह बेहद आक्रामक प्रजाति है जो तेजी से फैलती है और छोटी मछलियों की संख्या घटा देती है. वन विभाग हर साल विशेष अभियान चलाकर इसे पकड़ता है, लेकिन इसकी तेज प्रजनन क्षमता के कारण समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है. इससे उद्यान की जैव विविधता पर खतरा बना हुआ है.
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भरतपुर. पक्षियों के स्वर्ग के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान इन दिनों एक गंभीर और खामोश खतरे से जूझ रहा है. उद्यान की झीलों में पाई जाने वाली आक्रामक प्रजाति अफ्रीकन कैटफिश, जिसे स्थानीय भाषा में मांगुर कहा जाता है, यहां की जैव विविधता और खाद्य श्रृंखला पर लगातार नकारात्मक असर डाल रही है. यह खतरनाक मछली बेहद तेज गति से प्रजनन करती है और झीलों में मौजूद छोटी मछलियों को बड़ी मात्रा में खा जाती है.
यही छोटी मछलियां प्रवासी पक्षियों के भोजन का मुख्य स्रोत होती हैं. ऐसे में मांगुर की बढ़ती संख्या सीधे तौर पर पक्षियों के भोजन पर असर डाल रही है, जिससे उनकी संख्या और व्यवहार पर भी खतरा मंडरा रहा है. घना विभाग इस समस्या से निपटने के लिए पिछले करीब 17 वर्षों से लगातार अभियान चला रहा है. विभाग की ओर से अब तक एक लाख से अधिक मांगुर मछलियों को झीलों से बाहर निकाला जा चुका है. इसके बावजूद इस प्रजाति की तेज प्रजनन क्षमता के कारण इसे पूरी तरह खत्म करना बड़ी चुनौती बना हुआ है.
अफ्रीकन कैटफिश एक बेहद आक्रामक और खतरनाक प्रजाति है
घना रेंज के डीएफओ चेतन कुमार ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि अफ्रीकन कैटफिश एक बेहद आक्रामक और खतरनाक प्रजाति है. यह न केवल छोटी मछलियों को खत्म करती है, बल्कि पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर देती है. उन्होंने बताया कि इस मछली की मौजूदगी से प्रवासी पक्षियों के भोजन पर सीधा संकट खड़ा हो जाता है. घना विभाग द्वारा विशेष रूप से गर्मियों के दौरान, जब झीलों में पानी कम हो जाता है, अभियान चलाया जाता है ताकि मांगुर को आसानी से पकड़ा जा सके.
लगातार प्रयासों के बावजूद समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है
इस दौरान जाल और अन्य तकनीकों की मदद से बड़ी संख्या में मछलियों को निकाला जाता है. लगातार प्रयासों के बावजूद यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है. मांगुर की जीवटता और तेजी से फैलने की क्षमता के चलते यह केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के लिए एक स्थायी चुनौती बनती जा रही है. यदि समय रहते इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं पाया गया, तो आने वाले समय में उद्यान की जैव विविधता और पक्षियों की संख्या पर इसका गहरा असर देखने को मिल सकता है.
About the Authordeep ranjan
दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें
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