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लेदर और टेक्सटाइल से नहीं, कानपुर की सोडा वाटर फैक्ट्री से शुरू हुई औद्योगिक पहचान, 1830 में ब्रिटिशर्स ने रखी थी नींव

Last Updated:June 27, 2026, 16:19 IST

कानपुर की औद्योगिक पहचान की शुरुआत किसी कपड़ा मिल या चमड़ा उद्योग से नहीं, बल्कि एक सोडा वाटर फैक्ट्री से हुई थी. उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1830 में तत्कालीन कॉनपुर (Cawnpore) में पहली बार एक सोडा वाटर मैन्युफैक्ट्री और डिस्पेंसरी की स्थापना की गई थी. इसे शहर की शुरुआती औद्योगिक इकाइयों में माना जाता है. इसका प्रमाण 9 फरवरी 1830 को प्रकाशित कलकत्ता ईस्ट इंडिया गजट में छपे विज्ञापन से मिलता है, जिसे कानपुर के किसी उद्योग का पहला प्रकाशित विज्ञापन भी माना जाता है.

कानपुरः कानपुर की औद्योगिक पहचान की शुरुआत किसी कपड़ा मिल या चमड़ा उद्योग से नहीं, बल्कि एक सोडा वाटर फैक्ट्री से हुई थी. उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1830 में तत्कालीन कॉनपुर (Cawnpore) में पहली बार एक सोडा वाटर मैन्युफैक्ट्री और डिस्पेंसरी की स्थापना की गई थी. इसे शहर की शुरुआती औद्योगिक इकाइयों में माना जाता है. इसका प्रमाण 9 फरवरी 1830 को प्रकाशित कलकत्ता ईस्ट इंडिया गजट में छपे विज्ञापन से मिलता है, जिसे कानपुर के किसी उद्योग का पहला प्रकाशित विज्ञापन भी माना जाता है. विज्ञापन के अनुसार यह इकाई Bathgate, Porteous & Co. नामक ब्रिटिश कंपनी द्वारा संचालित की जाती थी. कंपनी ने अपने विज्ञापन में बताया था कि उसकी Mineral Water Manufactory, Cawnpore पूरी तरह शुरू हो चुकी है और इसका संचालन सीधे उसके एक साझेदार की निगरानी में किया जा रहा है.

सोडा के साथ मिलती थी औषधीय पानी और दवाइयां

विज्ञापन से पता चलता है कि फैक्ट्री में केवल सोडा वाटर ही नहीं, बल्कि Double Aerated Soda Water, Magnesia, Cheltenham Water और अन्य एरेटेड मिनरल वाटर भी तैयार किए जाते थे. कंपनी का दावा था कि इनकी गुणवत्ता कलकत्ता में बनने वाले उत्पादों के बराबर है.इसी परिसर में एक डिस्पेंसरी (औषधालय) भी संचालित होती थी, जहां लोगों को ताजा दवाइयां, पेटेंट मेडिसिन और चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराए जाते थे. उस दौर में यह सुविधा उत्तर भारत के लिए काफी आधुनिक मानी जाती थी.

बोतलों की वापसी पर मिलती थी रकम

विज्ञापन में उत्पादों की कीमतें भी प्रकाशित की गई थीं. सोडा वाटर अलग-अलग आकार की बोतलों में बेचा जाता था और खाली बोतल वापस करने पर ग्राहकों को उसकी कीमत लौटा दी जाती थी. इससे पता चलता है कि करीब दो सौ साल पहले भी बोतलों के पुन: उपयोग (री-यूज) की व्यवस्था लागू थी. ब्रिटिश कंपनी ने अपने विज्ञापन में लिखा था कि उत्तर भारत के निवासियों को उनकी डिस्पेंसरी से दवाइयां और अन्य सामान हमेशा उपलब्ध रहेगा. साथ ही, शहर के बाहर से मिलने वाले ऑर्डर नाव, कुली या बैलगाड़ी जैसे उपलब्ध परिवहन माध्यमों से समय पर भेजे जाएंगे. इससे स्पष्ट होता है कि उस समय भी कानपुर से दूसरे क्षेत्रों तक उत्पादों की आपूर्ति की जाती थी.

यहीं से शुरू हुई कानपुर की औद्योगिक यात्रा

औद्योगिक विशेषज्ञों का मानना है कि 1830 में शुरू हुई यह सोडा वाटर फैक्ट्री कानपुर के संगठित औद्योगिक विकास की पहली महत्वपूर्ण कड़ी थी. इसके बाद 1859 में हारनेस फैक्ट्री, 1862 में एल्गिन मिल, 1873 में म्योर मिल और 1876 में लाल इमली जैसी बड़ी औद्योगिक इकाइयों की स्थापना हुई. धीरे-धीरे कानपुर देश के सबसे बड़े औद्योगिक शहरों में शामिल हो गया.आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन 1830 में ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित यह छोटी सी सोडा वाटर फैक्ट्री कानपुर के औद्योगिक इतिहास की पहली दर्ज औद्योगिक इकाई के रूप में एक महत्वपूर्ण विरासत मानी जाती है. इसी नींव पर आगे चलकर कानपुर ने कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग और एमएसएमई उद्योगों के क्षेत्र में देशभर में अपनी अलग पहचान बनाई.

About the AuthorRajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें

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