चांद से मिट्टी लाएगा भारत, अपना स्पेस स्टेशन होगा; क्रायोजेनिक इंजन पर जीत से ISRO ने खोला भविष्य का रोडमैप

बेंगलुरु. जिस तकनीक को कभी भारत से छिपाया गया, जिस पर दुनिया की बड़ी ताकतों ने रोक लगा दी थी, आज उसी तकनीक में भारत ने ऐसा परचम लहराया है कि पूरी दुनिया उसकी ओर देख रही है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अध्यक्ष वी. नारायणन ने ऐलान किया है कि भारत ने क्रायोजेनिक इंजन तकनीक पर पूरी तरह महारत हासिल कर ली है. यही वह तकनीक है, जिसे कभी भारत को देने से साफ इनकार कर दिया गया था. अब यही आत्मनिर्भर भारत अंतरिक्ष विज्ञान में ऐसी ऐतिहासिक छलांग लगाने जा रहा है, जो देश को दुनिया की अग्रणी स्पेस शक्तियों की कतार में और मजबूती से खड़ा करेगी.
आईएसआरओ प्रमुख ने बताया कि भारत अब अपने पहले मानवरहित गगनयान मिशन की तैयारी में जुटा है. इसके साथ ही चंद्रयान-4 के जरिए चंद्रमा से मिट्टी और नमूने वापस लाने का मिशन तेजी से आगे बढ़ रहा है. वहीं चंद्रयान-5, जिसे जापान के साथ मिलकर विकसित किया जा रहा है, चंद्रमा पर पहले से कहीं अधिक भारी और अत्याधुनिक रोवर उतारेगा.
बेंगलुरु में आयोजित 17वें एयर चीफ मार्शल एल.एम. कात्रे मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए वी. नारायणन ने भारत के भविष्य का महत्वाकांक्षी स्पेस रोडमैप भी सामने रखा. उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य 2035 तक अपना स्पेस स्टेशन स्थापित करना और 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को चंद्रमा पर उतारना है. उन्होंने गर्व के साथ कहा, “हमने क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन विकसित कर लिया है, वही तकनीक जिसे कभी भारत को देने से मना कर दिया गया था.”
उन्होंने बताया कि भारत ने तीन क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम विकसित करके और इस प्रक्रिया में कई विश्व रिकॉर्ड बनाकर टेक्नोलॉजी न मिलने की चुनौती को तकनीकी नेतृत्व में बदल दिया है. नारायणन ने कहा कि भारत के मानव-युक्त अंतरिक्ष उड़ान मिशन पर आगे बढ़ने से पहले, पहला बिना चालक दल वाला गगनयान मिशन मुख्य फोकस है. उन्होंने लेक्चर के दौरान कहा, “हम अभी इस साल पहले बिना चालक दल वाले मिशन पर काम कर रहे हैं. फिर, नतीजों की समीक्षा करने के बाद, हम मानव-युक्त मिशन पर वापस आएंगे.”
उन्होंने कहा कि चंद्रयान-4 भारत का पहला चंद्रमा से सैंपल वापस लाने वाला मिशन होगा, जबकि जापान के साथ मिलकर किए जाने वाले चंद्रयान-5 मिशन में लगभग 100 दिनों तक काम करने में सक्षम 350 किलोग्राम का रोवर भेजा जाएगा; इसकी तुलना में चंद्रयान-3 में 25 किलोग्राम का रोवर था और उसकी काम करने की अवधि 14 दिन थी.
अंतरिक्ष तकनीक में भारत की प्रगति पर प्रकाश डालते हुए नारायणन ने कहा कि देश ने 1963 में उपहार में मिले सात किलोग्राम के साउंडिंग रॉकेट को लॉन्च करने से लेकर दुनिया के कुछ सबसे उन्नत लॉन्च व्हीकल और अंतरिक्ष यान बनाने तक का सफर तय किया है. भारत के क्रायोजेनिक इंजन प्रोग्राम को याद करते हुए उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी न मिलने से आखिरकार देश की अपनी क्षमताएं मजबूत हुईं. उन्होंने कहा, “आज मैं उन देशों का शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने टेक्नोलॉजी देने से इनकार किया था. आज हमने तीन क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम विकसित कर लिए हैं.”
देश के दीर्घकालिक विजन का जिक्र करते हुए नारायणन ने कहा कि भारत 2035 तक अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने और 2040 तक किसी भारतीय को चंद्रमा पर भेजने की दिशा में काम कर रहा है. उन्होंने कहा, “2040 तक कोई भारतीय हमारे राष्ट्रीय ध्वज के साथ भारतीय लॉन्चर का उपयोग करके चंद्रमा पर उतरेगा.” उन्होंने कहा कि चंद्रयान-2 ने चंद्रमा की कक्षा में सबसे हाई-रिज़ॉल्यूशन वाला कैमरा स्थापित किया था, जबकि चंद्रयान-3 ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला पहला देश बनाया.
ISRO चेयरमैन ने रियूजेबल लॉन्च व्हीकल और गगनयान जैसे प्रोग्राम में भारतीय वायु सेना और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के महत्वपूर्ण योगदान का श्रेय उन्हें दिया और कहा कि HAL के सहयोग के बिना भारत के लॉन्च व्हीकल और सैटेलाइट प्रोग्राम इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते. उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा में ISRO की भूमिका पर भी प्रकाश डाला और कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सभी भारतीय सैटेलाइट ने बेहतरीन प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय जरूरतों को पूरा करने में योगदान दिया. भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के विकास का ज़िक्र करते हुए नारायणन ने कहा कि ISRO ने 105 से ज़्यादा लॉन्च व्हीकल मिशन और 135 सैटेलाइट मिशन पूरे किए हैं, साथ ही 34 देशों के 434 सैटेलाइट लॉन्च किए हैं.
उन्होंने बताया कि इस संगठन को लगभग 450 उद्योगों, 400 से ज़्यादा स्टार्ट-अप और करीब 130 शैक्षणिक संस्थानों का सहयोग मिला है. अंतरिक्ष मिशनों में सटीकता की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा, “हमें एकदम सटीक होना होगा, 100 में से 100.” लेक्चर के बाद पत्रकारों से बात करते हुए नारायणन ने कहा कि ISRO ने अपने 200-टन वाले सेमी-क्रायोजेनिक इंजन के विकास में एक अहम उपलब्धि हासिल की है. हाल ही में हुए पावरहेड टेस्ट के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, “हम थ्रस्ट लेवल के लगभग 90 प्रतिशत तक पहुंच गए हैं. चूंकि हम कदम-दर-कदम आगे बढ़ रहे हैं, इसलिए यह एक बड़ी उपलब्धि और मील का पत्थर था, और अब हम इंजन टेस्ट की तैयारी कर रहे हैं.”
हाल की मुश्किलों के बाद लॉन्च मिशन फिर से शुरू करने के बारे में नारायणन ने कहा कि सैटेलाइट तैयार हैं और लॉन्च की तारीखों की घोषणा जल्द ही की जाएगी. उन्होंने कहा, “सैटेलाइट तैयार हैं, हम उस पर काम कर रहे हैं, इसलिए हम जल्द ही सही तारीख बताएंगे.” PSLV कार्यक्रम से जुड़े एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “हमने कारणों को समझ लिया है और हम वापसी की प्रक्रिया में हैं.” गगनयान के बारे में नारायणन ने कहा कि इंसानों को ले जाने के लिए ज़रूरी सभी बड़े काम पूरे हो चुके हैं और यह कार्यक्रम अब फ़्लाइट वैलिडेशन के चरण में पहुंच गया है.
उन्होंने कहा, “व्हीकल की पूरी ह्यूमन-रेटिंग का काम पूरा हो चुका है और सेफ्टी सिस्टम का विकास भी पूरा हो गया है. अब, असल इंसानों को भेजने से पहले हमें तीन ऐसे मिशन करने होंगे जिनमें इंसान नहीं होंगे. हम पहले बिना इंसानों वाले मिशन पर काम कर रहे हैं, इसलिए आपको जल्द ही तारीखों के बारे में पता चल जाएगा.”



