आज का पीठ दर्द मामूली नहीं, 20-30 में ही बूढ़े हो रहे युवा,’टेक नेक’ और ‘सिटिंग एपिडेमिक’ के शिकार

Tech Neck and Sitting Epidemic : हमारे मस्तिष्क से लेकर नितंब तक खांचेदार हड्डियों का एक ढाचा होता है जिसे रीढ़ की हड्डी कहते हैं. इसमें मुख्य रूप से तीन भाग होते हैं. गर्दन वाले भाग को सर्वाइकल स्पाइन कहा जाता है. इसमें 7 हड्डियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई होती है. गर्दन से पसली के ढाचे तक के भाग को थोरोसिक स्पाइन कहा जाता है. इसमें 12 हड्डियां होती हैं. इसके बाद नीचे लंबर स्पाइन होता है, जिसमें 5 और इसके नीचे सेक्रम की 5 हड्डियां आपस में जुड़ी हुई एक मजबूत हड्डी बनाती हैं. अंत में कॉक्सिक्स (टेलबोन) होती है. खास बात यह है रीढ़ की हड्डियों या स्पाइन के बीच में हड्डियों की आकृति इस तरह की होती है जिससे इसके बीच में गर्दन से लेकर नितंब तक एक पाइप की तरह जगह बन जाती है. ब्रेन से जितनी भी नसें निकलती हैं सब इसी होकर निकलती है और यहीं से पूरे शरीर में तंत्रिकाओं का जाल बिछती है. इसलिए इसे स्पाइनल कॉर्ड भी कहा जाता है.
पूरे शरीर का भार हड्डियों से बने इस स्पाइन पर टिका होता है, जबकि स्पाइनल कॉर्ड पूरे शरीर से तंत्रिकाओं के माध्यम से संदेश ब्रेन तक और ब्रेन से शरीर तक पहुंचाने का काम करती है. ऐसे में समझा जा सकता है कि स्पाइन का हमारे जीवन में कितना महत्व है. लेकिन आज की आधुनिक जीवनशैली में 20-30 साल के युवाओं का स्पाइन कमजोर होने लगा है. वे जवानी में ही बूढ़े दिखने लगे हैं. इसी उम्र में इतनी तरह की परेशानियां होने लगती हैं कि जिंदगी मुश्किल लगने लगती है. इसकी दो सबसे बड़ी वजहें ‘टेक नेक’ और ‘सिटिंग एपिडेमिक’हैं. ऐसा क्यों होता है, आइए इसके बारे में डॉ. भुवना आहूजा से बात करते हैं.
क्या होता है टेक नेक
जैसा कि यह नाम से ही लगता है कि इसमें टेक यानी तकनीक के कारण गर्दन को होने वाली दिक्कत. डॉ. भुवना आहूजा बताती हैं कि जब हम गर्दन बिना किसी प्रेशर के सहज भाव में सीधी रखते हैं तो इस समय इसका वजन साढ़े 4 से साढ़े 5 किलोग्राम का होता है. तब गर्दन लगभग 0 डिग्री पर होती है लेकिन जैसे ही हम किसी चीज को देखने के लिए गर्दन को 60 डिग्री के कोण पर झुकाते हैं तो इस पर 27 किलोग्राम का एक्स्ट्रा वजन बढ़ जाता है. अब आप समझ जाइए कि इसका क्या असर हो सकता है. जब गर्दन पर 27 किलो का वजन प्रेशर देता रहेगा तो इससे रिपीटिटिव स्ट्रेन सिंड्रोम हो जाएगा. इस अत्यधिक बायोमेकेनिकल लोड के कारण गर्दन की मांसपेशियों, टेंडन्स और लिगामेंट्स में माइक्रो-ट्रॉमा यानी बारीक खिंचाव और क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन पैदा होगा. अगर लगातार इसपर खिंचाव होता रहेगा तो सर्वाइकल लॉर्डोसिस नाम की बीमारी हो जाएगी. यानी हमारी गर्दन की हड्डियों में जो सी आकार का कर्व बना होता है वह सीधा होने लगेगा. इससे गर्दन का पूरा सिस्टम बिगड़ जाएगा. हड्डियां और टेंडन अपनी जगह से छिटकने लगेंगी जिससे नसों पर दबाव बढ़ेगा और कम उम्र में डिस्क डिजनरेशन, बुलगिंग डिस्क या न्यूरोलॉजिकल नसों के दबने का खतरा तेजी से बढ़ जाएगा. अब आप समझ गए होंगे कि गर्दन किसकी झुकी रहती है. शायद ही कोई युवा हो जो स्मार्ट फोन का इस्तेमाल न करता हो. जैसे ही आप स्मार्ट फोन पर झुकेंगे आपकी गर्दन पर 27 किलो का लोड बढ़ेगा और ये सारी समस्याएं होंगी. यही कारण है कि आजकल अधिकांश युवा इसके शिकार हो रहे हैं.
क्या होता है सिटिंग एपिडेमिक
सिटिंग एपिडेमिक आधुनिक लाइफस्टाइल से जुड़ी एक ऐसी खतरनाक समस्या है. सिटिंग मतलब बैठना और एपिडेमिक मतलब महामारी यानी एक ही तरह से सब ग्रस्त हो जाना. यानी बैठने की बीमारी से इसे समझ लीजिए. आज के समय लोग दिनभर में 8 से 12 घंटे लगातार कुर्सी पर बैठकर बिताते हैं. अगर आप ऑफिस में काम करते हैं तो चेयर पर बैठते हैं यदि आप पढ़ाई कर रहे हैं तो चेयर पर बैठकर पढ़ते हैं, बाकी समय स्मार्ट फोन पर स्क्रॉल करते हैं, वह भी काम बैठकर करते हैं या सोकर करते है. सोकर स्मार्टफोन चलाना और भी खतरनाक है. लगातार बैठे रहने के कारण गुरुत्वाकर्षण का पूरा दबाव रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से यानी लंबर स्पाइन और पेल्विस पर पड़ता है. इससे पीठ की मांसपेशियां सुस्त और कमजोर होने लगती हैं. इस निष्क्रियता के चलते ब्लड सर्कुलेशन धीमा हो जाता है, मांसपेशियों में खिंचाव खत्म होने लगता है और रीढ़ की हड्डियों के बीच की डिस्क पर एकतरफा दबाव पड़ने से वह समय से पहले घिसने लगती हैं. इतना ही नहीं, इससे मेटाबॉलिज्म सुस्त होने के कारण मोटापा, डायबिटीज और कम उम्र में रीढ़ की गंभीर बीमारियां तेजी से महामारी की तरह फैल रही हैं.
इन दोनों बीमारी का प्रभाव
डॉ. भुवना आहुजा बताती हैं कि दोनों बीमारी की प्रकृति लगभग एक जैसी है. वैसे तो सिटिंग एपिडेमिक बीमारी नहीं बल्कि एक आदत है और इस आदत की वजह से टेक नेक सिंड्रोम होता है. लेकिन इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है. अगर आप लगातार इस दर्द को नजरअंदाज करेंगे तो गर्दन के उस हिस्से से निकलने वाली नसें लगातार दबेगी. इससे डिस्क घिसने लगेंगे. दरअसल, गर्दन की हड्डियां वर्टिब्री के बीच जेल जैसी कुशनिंग होती है, जिसे इंटरवर्टेब्रल डिस्क कहते हैं. जब गर्दन पर लगातार गलत पोस्चर या स्पाज्म के कारण दबाव बना रहता है, तो यह जेल सूखने लगता है और डिस्क घिसने लगती है. ऐसे में ये डिस्क अपनी जगह से खिसक जाएगी और फूलकर मोटी हो जाएगी. इसे ही स्लिप डिस्क या हर्नियेटेड डिस्क कहा जाता है. इसमें बहुत ज्यादा दर्द होगा. ब्रेन से नसें निकलकर गर्दन से होते हुए हाथ और पैरों तक पहुंचती हैं. जब ये नसें लगातार दबी रहेगी तो हाथ-पैर में सुन्नापन आने लगेगा और स्थिति खराब होने पर मोटर पावर चली जाएगी. यानी हाथ या पैर आपकी ताकत लगाने से भी नहीं काम करेगा. इसमें न केवल हाथों बल्कि पैरों का संतुलन भी बिगड़ने लगेगा. फिर चलने में लड़खड़ाहट और गंभीर मामलों में मल-मूत्र त्याग के नियंत्रण पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे हालात में इमरजेंसी स्थिति पैदा हो सकती है.
गर्दन के दर्द से कैसे निपटें
अगर आप चाहते हैं कि गर्दन में दर्द न हो तो सबसे पहले आप मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा देर न रहें. अगर आप ऑफिस में लेपटॉप पर काम कर रहे हैं तो हर आधे-एक घंटे पर सीट से कुछ देर के लिए उठ जाएं. लगातार न तो मोबाइल स्क्रीन को देखें न ही लेपटॉप पर रहें. डाइट में पौष्टिक फूड को शामिल करें. मुख्य रूप से विटामिन बी 12, विटामिन डी की कमी से भी ऐसा हो सकता है. इसलिए भोजन में मशरूम, बादाम, ड्राई फ्रूट्स, अंडा, मछली, सीड्स, दूध, दही, हरी सब्जी, फल आदि का ज्यादा सेवन करें. शराब और सिगरेट को छोड़ दें. नियमित रूप से एक्सरसाइज करें और एक्टिव रहें. अगर तीन महीने से ज्यादा से गर्दन में दर्द हो रहा है तो डॉक्टर से अवश्य दिखाएं. ध्यान रखिए अगर बीमारी बढ़ गई है तो बिना डॉक्टरी इलाज से ठीक नहीं होगा. इसका शत प्रतिशत इलाज है. इसलिए इलाज कराइए.



