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21 साल तक की सरकारी नौकरी, फिर बन बैठे एक्टर, 1 रोल से बना डाली कभी न मिटने वाली पहचान

Last Updated:June 22, 2026, 05:01 IST

हिंदी सिनेमा में जब भी दमदार खलनायकों की बात होती है, तो अमरीश पुरी का नाम सबसे पहले लिया जाता है. उनकी भारी आवाज, तीखे हाव-भाव और स्क्रीन पर जबरदस्त मौजूदगी ने उन्हें बॉलीवुड का सबसे यादगार विलेन बना दिया. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि फिल्मों में आने से पहले वह 21 साल तक सरकारी नौकरी करते रहे थे.

नई दिल्ली. 22 जून 1932 को पंजाब के नवांशहर में जन्मे अमरीश पुरी का फिल्मी दुनिया से पुराना नाता था. उनके बड़े भाई मदन पुरी और चमन पुरी पहले से फिल्मों में काम कर रहे थे. मशहूर गायक और अभिनेता के. एल. सहगल भी उनके रिश्तेदार थे. इसके बावजूद बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाना उनके लिए आसान नहीं था.

युवा उम्र में अमरीश पुरी अभिनेता बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे थे. उन्होंने फिल्मों में हीरो बनने के लिए स्क्रीन टेस्ट भी दिया, लेकिन पहली ही कोशिश में उन्हें निराशा हाथ लगी. इसके बाद उन्होंने कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) में नौकरी शुरू कर दी. हालांकि नौकरी मिलने के बाद भी उन्होंने अपने सपने को कभी नहीं छोड़ा.

“मैं हूं हीरो तू है जीरो” 1989 की आइकॉनिक फिल्म राम लखन का लोकप्रिय गाना है. यह फिल्म सुभाष घई के निर्देशन में बनी थी, जिसमें डिंपल कपाड़िया और माधुरी दीक्षित समेत कई बड़े कलाकार शामिल थे. फिल्म अपने यादगार संगीत और संवादों के लिए जानी जाती है और एक क्लासिक एक्शन-ड्रामा के रूप में अपनी जगह बना चुकी है.

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बता दें कि फिल्म में सनी देओल ने फिल्म के सेकेंड हाफ में एंट्री कर ऐसे-ऐसे डायलॉग बोले कि लगा कि फिल्म का असली हीरो, न ऋषि कपूर और न सनी देओल, न मीनाक्षी और न अमरीश पुरी हैं, बल्कि फिल्म के डायलॉग ही हैं. फिल्म में सनी देओल को अपनी धांसू एक्टिंग के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था.

अमरीश पुरी ने 1971 में फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की. शुरुआती दौर में उन्होंने छोटे-छोटे किरदार निभाए, लेकिन उनकी प्रतिभा जल्द ही लोगों की नजर में आ गई. ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘अर्ध सत्य’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को खूब सराहना मिली.

साल 1980 में आई फिल्म ‘हम पांच’ के बाद उनकी पहचान एक मजबूत खलनायक के रूप में बनने लगी. इसके बाद उन्होंने ‘विधाता’, ‘हीरो’, ‘मेरी जंग’, ‘नगीना’, ‘फूल और कांटे’, ‘दामिनी’ और कई सुपरहिट फिल्मों में विलेन का किरदार निभाया.

फिर आया साल 1987, जब फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ में उन्होंने ‘मोगैम्बो’ का किरदार निभाया. यह किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि अमरीश पुरी हमेशा के लिए हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर हो गए. उनका मशहूर डायलॉग ‘मोगैम्बो खुश हुआ’ आज भी लोगों की जुबान पर है.

हालांकि अमरीश पुरी सिर्फ विलेन बनकर ही सीमित नहीं रहे. सूर्या, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘विरासत’ और ‘परदेस’ जैसी फिल्मों में उन्होंने सख्त लेकिन भावुक पिता के किरदार भी निभाए, जिन्हें दर्शकों ने खूब पसंद किया. उन्होंने हॉलीवुड फिल्म ‘इंडियाना जोन्स एंड द टेम्पल ऑफ डूम’ में भी काम किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. अपने लंबे करियर में अमरीश पुरी ने 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया.

थिएटर में योगदान के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला. वहीं ‘मेरी जंग’, ‘घातक’ और ‘विरासत’ जैसी फिल्मों के लिए उन्होंने कई फिल्मफेयर अवॉर्ड भी जीते.12 जनवरी 2005 को अमरीश पुरी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन उनकी दमदार आवाज, शानदार अभिनय और यादगार किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं. हिंदी सिनेमा में उनके जैसा कलाकार शायद ही दोबारा देखने को मिले.

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