जंगल का असली ‘माली’ बना भालू! बीज फैलाकर बढ़ा रहा हरियाली, रिसर्च में मिले चौंकाने वाले नतीजे

Last Updated:June 16, 2026, 08:42 IST
Kumbhalgarh Wildlife Sanctuary Sloth Bear Study: उदयपुर संभाग के कुंभलगढ़ और टोडगढ़-रावली वन्यजीव अभयारण्यों में किए गए वैज्ञानिक अध्ययन में भालुओं की एक अहम पारिस्थितिक भूमिका सामने आई है. अंतरराष्ट्रीय पत्रिका Biotropica में प्रकाशित शोध के अनुसार स्लॉथ भालू केवल वन्यजीव नहीं, बल्कि जंगलों के महत्वपूर्ण ‘सीड डिस्पर्सर’ हैं. वे फलों का सेवन कर उनके बीजों को मल के माध्यम से दूर-दूर तक फैलाते हैं, जिससे नए पौधों का विकास होता है. अध्ययन में यह भी पाया गया कि कई बीज पाचन के बाद भी अंकुरण योग्य रहते हैं, जिससे जंगलों के प्राकृतिक विस्तार में मदद मिलती है.
आमतौर पर भालू को एक जंगली जानवर के रूप में देखा जाता है, लेकिन उदयपुर संभाग के कुंभलगढ़ और टोडगढ़-रावली वन्यजीव अभयारण्यों में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने उनकी ऐसी भूमिका उजागर की है, जो भविष्य के जंगलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका Biotropica में प्रकाशित शोध के अनुसार, स्लॉथ भालू केवल वन्यजीव नहीं हैं, बल्कि वे जंगलों में बीजों का प्रसार कर नए पौधों और वनों के विकास में अहम योगदान दे रहे हैं. इस अध्ययन ने वन संरक्षण के क्षेत्र में एक नई सोच को जन्म दिया है.
शोध में सामने आया कि भालू जंगलों में मिलने वाले विभिन्न फलों का सेवन करते हैं और बाद में उनके बीज मल के माध्यम से दूर-दूर तक फैल जाते हैं. लंबे समय से भालुओं पर अध्ययन कर रहे युवा शोधकर्ता डॉ. उत्कर्ष प्रजापति ने भालुओं के भोजन और बीज प्रसार की प्रक्रिया को समझने के लिए उनके मल का वैज्ञानिक विश्लेषण किया. अध्ययन के दौरान यह जानने का प्रयास किया गया कि भालू किन फलों को खाते हैं और उनके जरिए बीजों के प्रसार का जंगलों पर क्या प्रभाव पड़ता है.
अध्ययन में यह भी सामने आया कि भालुओं का भोजन मौसम के अनुसार बदलता रहता है. सर्दियों के दौरान उनके भोजन में जंगली फलों की मात्रा अधिक पाई गई, जबकि गर्मियों में वे मुख्य रूप से दीमक और चींटियों पर निर्भर रहते हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार यह उनकी अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है, जिससे वे अलग-अलग परिस्थितियों में भी अपने भोजन की जरूरत पूरी कर लेते हैं. यह व्यवहार भालुओं को पर्यावरण के अनुसार ढलने में मदद करता है और उनके जीवित रहने की संभावना बढ़ाता है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भालुओं का पारिस्थितिक तंत्र में महत्वपूर्ण योगदान होता है और वे प्रकृति संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं.
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सबसे रोचक तथ्य यह रहा कि कई पौधों के बीज भालुओं के पाचन तंत्र से गुजरने के बाद भी सुरक्षित रहे और उनमें अंकुरण की क्षमता बनी रही. कुछ मामलों में तो बीज सामान्य परिस्थितियों की तुलना में अधिक तेजी से अंकुरित हुए. शोध में फ़रागान, बेर, अमलतास, तेंदू और जंगली खजूर जैसी देशी वनस्पतियों के बीज भालुओं के मल से सफलतापूर्वक अंकुरित पाए गए. इससे स्पष्ट हुआ कि भालू इन पौधों के बीजों को लंबी दूरी तक पहुंचाकर जंगलों के प्राकृतिक विस्तार में मदद कर रहे हैं.
डॉ. उत्कर्ष प्रजापति का कहना है कि स्लॉथ भालू केवल सर्वाहारी वन्यजीव नहीं हैं, बल्कि वे जंगलों के महत्वपूर्ण ‘सीड डिस्पर्सर’ यानी बीज-वितरक हैं.उनके माध्यम से बीज विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचते हैं, जिससे वनस्पति विविधता बढ़ती है और जंगलों का प्राकृतिक पुनर्जनन होता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और जैव विविधता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
अध्ययन में एक चिंता भी सामने आई है. शोधकर्ताओं ने पाया कि लैंटाना कैमारा नामक विदेशी और आक्रामक पौधे के बीज भी भालुओं के मल के जरिए अंकुरित हो रहे हैं. वन विशेषज्ञों के अनुसार, लैंटाना कई वन क्षेत्रों में देसी वनस्पतियों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है. यदि इसके प्रसार पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह स्थानीय पौधों की वृद्धि और वन पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है.
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