60 साल से अभ्रक की राखी बना रहा चांद मोहम्मद का परिवार, 3 पीढ़ियों से भीलवाड़ा में कायम है परंपरा

भीलवाड़ा. भाई-बहन के अटूट रिश्ते का प्रतीक रक्षाबंधन का त्योहार भीलवाड़ा में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द की अनोखी मिसाल पेश करता है. शहर की आरके कॉलोनी में रहने वाला चांद मोहम्मद का परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से अभ्रक की पारंपरिक राखियां बनाने का काम कर रहा है. चांद मोहम्मद और उनकी पत्नी करीब 50 से 60 वर्षों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. वे आज भी राखी के मौसम से कई महीने पहले अभ्रक की राखियां बनाना शुरू कर देते हैं और रक्षाबंधन तक इन्हें तैयार करते हैं.
खास बात यह है कि चांद मोहम्मद इन राखियों को भीलवाड़ा जिले के ग्रामीण इलाकों में घर-घर जाकर हिंदू परिवारों की बहनों तक पहुंचाते हैं. वह राखियों के साथ श्रवण कुमार का चित्र भी देते हैं. बदले में कोई परिवार पैसे देता है तो वह स्वीकार कर लेते हैं, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से गेहूं या अनाज ले लेते हैं. इस तरह तीन पीढ़ियों से चली आ रही यह कला अब केवल रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और भाईचारे का संदेश भी बन चुकी है.
तीन पीढ़ियों से जारी है राखी बनाने की परंपरा
चांद मोहम्मद ने लोकल18 से बातचीत में बताया कि उनका परिवार करीब तीन पीढ़ियों से भोड़ल यानी अभ्रक की राखियां बनाता आ रहा है. उन्होंने कहा कि यह उनका पारंपरिक काम है, जिसे उनके माता-पिता भी करते थे. इसके बाद उन्होंने इस कला को आगे बढ़ाया. चांद मोहम्मद और उनकी पत्नी करीब 50 से 60 वर्षों से राखियां बना रहे हैं. रक्षाबंधन से कुछ महीने पहले ही राखियां तैयार करने का काम शुरू हो जाता है और त्योहार आने तक यह सिलसिला चलता रहता है.
एक दर्जन से ज्यादा गांवों में पहुंचाते हैं राखियां
चांद मोहम्मद भीलवाड़ा जिले के ग्रामीण इलाकों में घर-घर जाकर राखियां पहुंचाते हैं. वे करीब एक दर्जन से ज्यादा गांवों में जाकर हिंदू परिवारों की बहनों को राखियां देते हैं. राखी के साथ श्रवण कुमार का चित्र भी दिया जाता है. उनका कहना है कि यह काम केवल कमाई के लिए नहीं है, बल्कि वर्षों से चली आ रही परंपरा और लोगों से जुड़े रिश्ते का हिस्सा है. वे बताते हैं कि राखी लेने के बाद यदि कोई परिवार अपनी इच्छा से पैसे देता है तो वे पैसे स्वीकार कर लेते हैं. वहीं, जिन परिवारों के लिए पैसे देना संभव नहीं होता, उनसे गेहूं या अन्य अनाज ले लिया जाता है. इस तरह बिना किसी भेदभाव के हर घर तक राखी पहुंचाने की परंपरा वर्षों से जारी है.
अभ्रक और रेशम के धागे से बनती है राखी
चांद मोहम्मद ने बताया कि अभ्रक की राखी बनाने के लिए सबसे पहले अभ्रक और रेशम का धागा लिया जाता है. अभ्रक को तोड़कर उसे पीटकर बेहद पतला किया जाता है. इसे इतना पतला किया जाता है कि यह कांच की तरह दिखाई देने लगता है. इसके बाद अभ्रक को काटकर राखी का आकार दिया जाता है और रेशम के धागे से जोड़कर इसे तैयार किया जाता है. इस पारंपरिक तरीके से तैयार की गई राखियों में मेहनत के साथ कई दशक पुरानी कला भी जुड़ी है. चांद मोहम्मद के मुताबिक, उनके माता-पिता भी इसी तरह राखियां बनाया करते थे. उन्होंने अपने परिवार की इस कला को आगे बढ़ाते हुए आज भी इसे जीवित रखा है.
राखी में पिरोते हैं मोहब्बत का संदेश
चांद मोहम्मद कहते हैं कि राखी बनाते समय उनके मन में प्रेम और भाईचारे की भावना रहती है. उनका मानना है कि राखी केवल एक धागा नहीं, बल्कि रिश्तों और भावनाओं को जोड़ने का प्रतीक है. यही वजह है कि वह वर्षों से हिंदू परिवारों के बीच जाकर राखियां पहुंचाते आ रहे हैं. चांद मोहम्मद का परिवार आज भी अपनी तीन पीढ़ियों पुरानी परंपरा को उसी भावना के साथ निभा रहा है. धर्म से अलग होकर रिश्तों और प्रेम को महत्व देने वाली यह कहानी भीलवाड़ा में हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक सद्भाव का खूबसूरत संदेश देती है.



