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लू में भी हो सकती है हरी फसल! भरतपुर के किसानों का देसी जुगाड़, बांस-पॉलिथीन शेड से बचा रहे हैं पौध

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लू में भी हरी फसल! भरतपुर किसानों का जुगाड़, बांस-पॉलिथीन शेड से बच रहे पौध

Last Updated:April 24, 2026, 17:33 IST

Agriculture News Hindi : भरतपुर जिले में पड़ रही भीषण गर्मी और तेज लू के बीच जहां आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है.वहीं किसानों के सामने अपनी फसलों और खासकर सब्जियों की नाजुक पौध को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है.तेज धूप, गर्म हवाएं और बढ़ता तापमान पौधों को झुलसा देता है.जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है.

भरतपुर जिले में पड़ रही भीषण गर्मी और तेज लू के बीच जहां आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है. वहीं किसानों के सामने अपनी फसलों और खासकर सब्जियों की नाजुक पौध को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है. तेज धूप, गर्म हवाएं और बढ़ता तापमान पौधों को झुलसा देता है. जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है. ऐसे कठिन हालात में भरतपुर के किसानों ने एक सस्ता और प्रभावी देसी जुगाड़ अपनाकर अपनी फसलों को सुरक्षित रखने का अनोखा तरीका खोज लिया है.

ग्रामीण इलाकों में किसान अब बांस और पालोथीन प्लास्टिक शीट का उपयोग कर पौधों के ऊपर अस्थायी शेड तैयार कर रहे हैं. इस तकनीक में सबसे पहले खेत में जहां पौध तैयार की जाती है. वहां चारों तरफ बांस के डंडे गाड़े जाते हैं.इसके बाद इन बांसों के ऊपर सावधानीपूर्वक पालोथीन की चादर को ढक दिया जाता है. जिससे एक छायादार संरचना तैयार हो जाती है. किसान इस पालोथीन को इस तरह लगाते हैं कि धूप सीधे पौधों पर न पड़े, लेकिन हवा का हल्का संचार बना रहे.

इस देसी जुगाड़ का सबसे बड़ा फायदा यह है, कि यह पौधों को सीधे तेज सूरज की किरणों और लू के थपेड़ों से बचाता है. पालोथीन की परत धूप की तीव्रता को कम कर देती है. जिससे पौधों का तापमान नियंत्रित रहता है. साथ ही गर्म हवा का असर भी कम हो जाता है. जिससे पौध सूखने या झुलसने से बच जाती है. परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और किसानों को नुकसान से राहत मिलती है.

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किसानों का कहना है कि यह तरीका बेहद किफायती है.और आसानी से उपलब्ध संसाधनों से तैयार किया जा सकता है. बांस गांवों में आसानी से मिल जाता है और पालोथीन भी कम कीमत में उपलब्ध होती है. महंगे शेड नेट या आधुनिक तकनीकों के मुकाबले यह जुगाड़ छोटे और सीमांत किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा है. भरतपुर के कई किसान इस तकनीक को अपनाकर अपनी सब्जियों जैसे टमाटर, मिर्च, बैंगन और अन्य पौधों को सुरक्षित रख रहे हैं.

खास बात यह है कि इस देसी उपाय से पौधों की जीवित रहने की दर भी बढ़ी है. जिससे किसानों को दोबारा पौध तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ती और लागत भी कम हो जाती है. इस तरह के स्थानीय और पारंपरिक उपायों को उपयोगी मानते हैं. किसानों का कहना है कि बदलते मौसम और बढ़ती गर्मी के दौर में इस तरह के नवाचार खेती के लिए जरूरी हो गए हैं. <span style=”color: currentcolor;”>भरतपुर के किसानों का यह देसी जुगाड़ न केवल उनकी समझदारी और अनुभव को दर्शाता है. बल्कि यह भी साबित करता है कि सीमित संसाधनों में भी बेहतर खेती संभव है. गर्मियों की मार के बीच यह उपाय किसानों के लिए किसी राहत से कम नहीं है और आने वाले समय में अन्य क्षेत्रों के किसान भी इसे अपनाकर लाभ उठा सकते हैं.</span>

First Published :

April 24, 2026, 17:33 IST

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