Rajasthan

Heat Waves: जब AC फेल, तब देसी कमाल… भरतपुर की झोपड़ियां कैसे हर गर्मी को मात दे रही हैं

Last Updated:April 23, 2026, 15:43 IST

Garmi Me Loo Se Bachne Ka Tareeka: राजस्थान में इन दिनों भीषण गर्मी और लू का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसे में जहां शहरों में लोग कूलर और एसी का सहारा ले रहे हैं. वहीं भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में आज भी पारंपरिक देसी उपाय लोगों को राहत दे रहे हैं. गांवों में घास-फूस और खरपतवार से बनी झोपड़ियां आज भी गर्मी से बचने का कारगर साधन बनी हुई हैं.

राजस्थान में इन दिनों भीषण गर्मी और लू का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसे में जहां शहरों में लोग कूलर और एसी का सहारा ले रहे हैं. वहीं भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में आज भी पारंपरिक देसी उपाय लोगों को राहत दे रहे हैं. गांवों में घास-फूस और खरपतवार से बनी झोपड़ियां आज भी गर्मी से बचने का कारगर साधन बनी हुई हैं.

भरतपुर के कई गांवों में गर्मियों की शुरुआत होते ही किसान और ग्रामीण परिवार अपने खेतों या घरों के पास इन झोपड़ियों का निर्माण करते हैं. स्थानीय भाषा में इन्हें झोंपड़ी या छप्पर भी कहा जाता है. इन झोपड़ियों को बनाने में सूखी घास, फूस, पेड़ों की टहनियां और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता है. जो आसानी से उपलब्ध होती है. और कम खर्च में तैयार हो जाती है.

इन झोपड़ियों की खास बात यह है.कि ये प्राकृतिक रूप से ठंडी रहती हैं.जब तेज गर्म हवाएं यानी लू इन झोपड़ियों से टकराती हैं.तो घास-फूस की मोटी परत उन्हें अंदर आने से रोकती है. भीतर का तापमान अपेक्षाकृत कम बना रहता है.यही वजह है कि दोपहर की तपती धूप में भी इनके अंदर ठंडक का अहसास होता है.

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ग्रामीण बताते हैं कि खेतों में काम करने के दौरान दिन के समय वे इन झोपड़ियों में आराम करते हैं. जिससे उन्हें लू लगने का खतरा कम हो जाता है. इतना ही नहीं पशुओं को भी इन झोपड़ियों में रखा जाता है. जिससे वे भी गर्मी और धूप से सुरक्षित रहते हैं. खासकर दुधारू पशुओं के लिए यह व्यवस्था काफी फायदेमंद मानी जाती है.

आधुनिक दौर में जहां तकनीकी साधनों का उपयोग बढ़ा है. वहीं भरतपुर के गांवों में यह पारंपरिक तरीका आज भी अपनी उपयोगिता साबित कर रहा है. कम लागत पर्यावरण के अनुकूल और असरदार होने के कारण ये देसी झोपड़ियां ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा बनी हुई हैं.

भीषण गर्मी के इस दौर में भरतपुर के गांवों की ये घास-फूस की झोपड़ियां न सिर्फ परंपरा को जीवित रखे हुए हैं. बल्कि इंसान और पशुओं दोनों के लिए एक सुरक्षित और ठंडी शरणस्थली भी साबित हो रही हैं. आज भी गर्मियों के दिनों में लोग भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में इस देसी झोपड़ी को बनाते हैं. गर्मियों के दिनों में इसमें अपने पशुओं को और खुद भी रहते हैं.

First Published :

April 23, 2026, 15:43 IST

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