374वें पाटोत्सव पर सजा उदयपुर का जगदीश मंदिर, आस्था और इतिहास का है संगम, जुड़ी है ये खास मान्यताएं

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374वें पाटोत्सव पर सजा उदयपुर का जगदीश मंदिर, आस्था और इतिहास का है संगम
Last Updated:May 01, 2026, 07:04 IST
Udaipur Jagdish Temple Patotsav: उदयपुर का प्रसिद्ध जगदीश मंदिर 374वें पाटोत्सव पर भक्ति और उत्साह से सराबोर है. वैशाख पूर्णिमा पर आयोजित इस दो दिवसीय उत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं. 1651 में महाराणा जगत सिंह प्रथम द्वारा बनवाए गए इस मंदिर की स्थापना भगवान जगन्नाथ के स्वप्न दर्शन से जुड़ी मानी जाती है. मंदिर की भव्य नक्काशी और स्थापत्य कला इसे खास बनाती है. विशेष श्रृंगार, अभिषेक और 56 भोग जैसे धार्मिक आयोजनों से पूरा परिसर भक्तिमय माहौल में डूबा हुआ है.
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उदयपुर. लेकसिटी उदयपुर शहर के मध्य स्थित जगदीश मंदिर एक बार फिर भक्ति और परंपरा के रंग में रंगा नजर आ रहा है. 374वें पाटोत्सव के मौके पर यहां दो दिवसीय विशेष धार्मिक आयोजन शुरू हुए हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं. हर साल वैशाख शुक्ल पूर्णिमा पर होने वाला यह उत्सव मंदिर की स्थापना, इतिहास और आस्था की गहराई को एक साथ सामने लाता है. इस मंदिर की स्थापना की कहानी जितनी ऐतिहासिक है, उतनी ही रोचक भी.कहा जाता है कि मेवाड़ के शासक महाराणा जगत सिंह प्रथम को भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में दर्शन देकर उदयपुर में अपनी प्रतिमा स्थापित करने को कहा था.
इस दिव्य अनुभव के बाद उन्होंने 1651 ईस्वी में इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया. वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान की मूर्ति की विधिवत प्रतिष्ठा की गई, जो आज तक आस्था का केंद्र बनी हुई है. मंदिर की बनावट इसे खास पहचान देती है. ऊंचे चबूतरे पर बने इस मंदिर के करीब 50 से अधिक स्तंभ हैं, जिन पर की गई बारीक नक्काशी आज भी लोगों को आकर्षित करती है. हाथी-घोड़े, नृत्य मुद्राएं और पौराणिक कथाओं के दृश्य इन दीवारों पर ऐसे उकेरे गए हैं, मानो इतिहास खुद बोल रहा हो.
मंदिर से जुड़ी है चमत्कारी मान्यताएं
इंडो-आर्यन और मारू-गुर्जर शैली का मेल इसे स्थापत्य कला का शानदार नमूना बनाता है. इतिहास में दर्ज एक चमत्कारी घटना भी इस मंदिर की पहचान से जुड़ी है. मान्यता के अनुसार, जगन्नाथ पुरी मंदिर में भगवान को चढ़ाए गए चार सोने के कड़े नई प्रतिमा में अपने आप धारण हो गए थे. इसे इस बात का संकेत माना गया कि भगवान स्वयं मेवाड़ पधारे हैं. इस घटना ने उस समय महाराणा की आस्था को और मजबूत कर दिया. इतिहास के कठिन दौर में भी मंदिर ने अपनी गरिमा बनाए रखी. मुगल शासक औरंगजेब के समय हुए आक्रमण में मंदिर की रक्षा करते हुए नरू बारहठ और उनके 21 साथियों ने अपने प्राणों की आहुति दी. यह घटना मंदिर को केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वीरता और बलिदान के प्रतीक के रूप में भी स्थापित करती है. समय के साथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी हुआ.
महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय ने दिया था भव्य स्वरूप
महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय ने लगभग 9 लाख रुपए खर्च कर मंदिर को फिर से भव्य स्वरूप दिया. आज यह मंदिर उसी ऐतिहासिक गरिमा के साथ खड़ा है और हर दिन हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. पाटोत्सव के दौरान यहां भगवान का विशेष श्रृंगार, अभिषेक, 56 भोग और ध्वजारोहण जैसे धार्मिक आयोजन किए जाते हैं. पूरा मंदिर परिसर भक्ति, उत्साह और परंपरा के रंग में डूबा रहता है. उदयपुर का जगदीश मंदिर सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, इतिहास और कला का जीवंत संगम है.About the Authordeep ranjan
दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें
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Location :
Udaipur,Rajasthan
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Local-18 व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.



