Jodhpur Dhani Anushthan 2026 Predictions

Last Updated:April 17, 2026, 10:08 IST
Jodhpur Dhani Anushthan 2026 Predictions: जोधपुर में 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर 890 साल पुरानी “धणी” परंपरा का आयोजन होगा. घांची समाज द्वारा आयोजित इस अनुष्ठान में दो अबोध बालक बांस की पट्टियों के माध्यम से आने वाले वर्ष में वर्षा, अकाल और राजनीतिक स्थितियों की भविष्यवाणी करेंगे. कुमकुम और काजल लगी पट्टियों के हिलने और बबूल के कांटे को छूने की प्रक्रिया से भविष्य के हालात तय किए जाते हैं. यह प्राचीन रस्म मारवाड़ के कृषि प्रधान समाज के लिए आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है.
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जोधपुर. राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी जोधपुर अपनी अनूठी परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए विश्व भर में विख्यात है. इसी कड़ी में आगामी 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया (आखा तीज) के पावन अवसर पर शहर के बाईजी का तालाब स्थित घांची समाज की बगीची में एक अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन आयोजन होने जा रहा है. घांची समाज द्वारा आयोजित होने वाले इस पारंपरिक “धणी” कार्यक्रम में करीब 890 वर्षों से चली आ रही एक अनोखी रस्म निभाई जाएगी. इस अनुष्ठान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें छोटे बच्चों के माध्यम से आने वाले वर्ष के लिए अकाल-सुकाल, वर्षा की स्थिति और यहाँ तक कि देश के राजनीतिक माहौल के बारे में भविष्यवाणियां की जाती हैं. यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि मारवाड़ की उस सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जो सदियों से प्रकृति और जीवन के बीच तालमेल बनाए हुए है.
इस प्राचीन परंपरा को निभाने की प्रक्रिया अत्यंत कठिन और विधि-विधान से परिपूर्ण होती है. अनुष्ठान के दौरान यज्ञ वेदी के पास दो विशाल खंभे लगाए जाते हैं. दो अबोध बालकों को गीले वस्त्र पहनाकर और मंत्रोच्चार के साथ पवित्र कर यज्ञ शाला में खड़ा किया जाता है. इन बच्चों के हाथों में बांस की दो विशेष पट्टिकाएं (खपचियां) दी जाती हैं. इनमें से एक पट्टिका पर सौभाग्य के प्रतीक कुमकुम का तिलक लगाया जाता है, जो ‘सुकाल’ यानी अच्छी वर्षा और समृद्धि का संकेत होती है. वहीं दूसरी पट्टिका पर काजल का लेप किया जाता है, जो ‘काल’ या आपदाओं का प्रतीक मानी जाती है. मंत्रों की गूंज के बीच ये पट्टिकाएं स्वतः ही ऊपर-नीचे हिलने लगती हैं, जो उपस्थित जनसमूह के लिए कौतूहल और श्रद्धा का विषय होता है.
बबूल का कांटा और भविष्य के संकेतभविष्यवाणी का मुख्य आधार खंभे पर लगा बबूल का कांटा (सूल) होता है. यदि मंत्रोच्चार के दौरान बच्चों के हाथ में थमी कुमकुम लगी पट्टी इस कांटे को छू लेती है, तो इसे आगामी वर्ष में भरपूर वर्षा, शांति और खुशहाली का शुभ संकेत माना जाता है. इसके विपरीत, यदि काजल लगी पट्टी कांटे को छूती या तोड़ती है, तो इसे प्राकृतिक विपदाओं, अकाल और राजनीतिक संकट की आशंका के रूप में देखा जाता है. वेदी के नीचे मिट्टी पर सात प्रकार के अनाज, गुड़ और पताशे भी रखे जाते हैं, जो कृषि और अर्थव्यवस्था से जुड़े संकेतों को पुख्ता करते हैं. शहर के बुजुर्गों का मानना है कि यह विधि सटीक होती है और लोग इसी के आधार पर अपनी भविष्य की योजनाएं तैयार करते हैं.
890 साल पुरानी परंपरा का महत्वघांची समाज के बुजुर्गों के अनुसार, यह परंपरा उस दौर में शुरू हुई थी जब जीवन पूरी तरह से वर्षा और कृषि पर निर्भर था. उस समय “धणी” अनुष्ठान से मिलने वाले संकेतों के आधार पर किसान यह तय करते थे कि उन्हें किस फसल की बुवाई करनी है, बरसात का पानी कैसे सहेजना है और पशुओं के लिए चारे का प्रबंध कहाँ से होगा. आज के आधुनिक युग में भी इस परंपरा की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है. मारवाड़ की मिट्टी से जुड़ी यह विरासत आज भी ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पूरी शिद्दत के साथ निभाई जाती है. 19 अप्रैल को होने वाले इस भव्य आयोजन में न केवल जोधपुर, बल्कि आस-पास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु और जिज्ञासु लोग भविष्य के संकेतों को जानने के लिए जुटेंगे.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें
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Location :
Jodhpur,Jodhpur,Rajasthan
First Published :
April 17, 2026, 10:08 IST



