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तेल-गैस की छोड़ो टेंशन, सोलर पैनल की चिकचिक भी खत्म, ये एक बैटरी 433 साल तक देती रहेगी बिजली

ईरान और अमेरिका के बीच जंग और इस कारण होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी से भारत सहित दुनियाभर के देश तेल-गैस की किल्लत से जूझ रहे हैं. रसोई गैस सिलेंडर की सप्लाई बाधित होने पर कई लोग जहां इनडक्शन चूल्हे से काम चलाने लगे. इस बीच वैज्ञानिक एक ऐसी नई बैटरी बनाने में जुटे हैं, जो लगभग 433 साल तक लगातार बिजली देती रहेगी. दरअसल लंबे अंतरिक्ष मिशनों की राह में बिजली की समस्या सबसे बड़ी रोड़ा रहती है. सूरज की रोशनी से दूर गहरे अंतरिक्ष में जहां सोलर पैनल फेल हो जाते हैं और ईंधन की कमी से मिशन रुक जाते हैं. ऐसे में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लेस्टर मिलकर न्यूक्लियर बैटरी बनाने में जुटे हैं. यह बैटरी अमेरिशियम-241 (Americium-241) पर आधारित है, जिसकी आधी उम्र (हाफ-लाइफ) करीब 433 साल है.

यह उन सभी लोगों के लिए राहत की खबर है जो तेल-गैस या पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की बढ़ती कीमत और सोलर पैनलों की सीमाओं से परेशान हैं. अंतरिक्ष में तो यह क्रांति ला रही है, लेकिन भविष्य में यह पृथ्वी पर भी लंबे समय तक बिजली देने वाले उपकरणों, दूरदराज के इलाकों या आपातकालीन पावर सिस्टम के लिए उपयोगी साबित हो सकती है.

लंबे अंतरिक्ष मिशनों की सबसे बड़ी चुनौती होगी दूर

अंतरिक्ष यान जब सूर्य से बहुत दूर स्थित बृहस्पति, शनि या उससे आगे चले जाते हैं तो सोलर पैनलों की दक्षता तेजी से घट जाती है. प्रकाश की तीव्रता दूरी के वर्ग के अनुपात में कम होती जाती है. वहां सूरज की रोशनी इतनी कमजोर हो जाती है कि सोलर पैनल पर्याप्त बिजली नहीं दे पाते. ठंडे वातावरण, धूल और रखरखाव की असंभवता ने एजेंसियों को दशकों से रेडियोआइसोटोप पावर सिस्टम (RPS) या न्यूक्लियर बैटरी की ओर मोड़ा है.

ये बैटरियां रेडियोएक्टिव पदार्थों के प्राकृतिक क्षय (decay) से पैदा होने वाली गर्मी को बिजली में बदलती हैं. कोई सूरज नहीं, कोई चार्जिंग नहीं, कोई मेंटेनेंस नहीं—बस लगातार बिजली.

प्लूटोनियम-238: दशकों तक का भरोसा

पिछले कई दशकों से प्लूटोनियम-238 (Pu-238) इन न्यूक्लियर बैटरियों का मुख्य ईंधन रहा है. इसकी हाफ-लाइफ करीब 88 साल है, यानी समय के साथ इसकी ऊर्जा धीरे-धीरे कम होती है, लेकिन काफी स्थिर रहती है.

वॉयेजर-1 और वॉयेजर-2 जैसे मिशन आज भी Pu-238 से चल रहे हैं, जो 1977 में लॉन्च हुए थे. मंगल ग्रह पर क्यूरियोसिटी और पर्सिवियरेंस रोवर भी इसी तकनीक पर निर्भर हैं. अमेरिका में ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी और आइडाहो नेशनल लेबोरेटरी Pu-238 का उत्पादन संभालते हैं. उत्पादन में दशकों का अंतराल पड़ा था, लेकिन अब इसे फिर से शुरू किया गया है.

Pu-238 का क्षय गर्मी पैदा करता है, जिसे थर्मोइलेक्ट्रिक कन्वर्टर या अन्य सिस्टम बिजली में बदलते हैं. यह छोटी, विश्वसनीय और लंबे समय तक चलने वाली होती है, लेकिन 88 साल की हाफ-लाइफ के कारण बहुत लंबे मिशनों (सैकड़ों साल) में पावर धीरे-धीरे कम होती जाती है.

अमेरिशियम-241: 433 साल की क्रांति

अब ध्यान अमेरिशियम-241 (Am-241) की ओर शिफ्ट हो रहा है. इसकी हाफ-लाइफ लगभग 433 साल है-Pu-238 से करीब पांच गुना ज्यादा. इसका मतलब है कि यह बहुत धीरे क्षय होता है, इसलिए लंबे समय तक लगभग स्थिर पावर देता रहता है.

NASA के ग्लेन रिसर्च सेंटर और यूनिवर्सिटी ऑफ लेस्टर के वैज्ञानिकों ने जनवरी 2025 में मिलकर Am-241 पर आधारित हीट सोर्स का परीक्षण शुरू किया. उन्होंने इलेक्ट्रिकली हीटेड सिमुलेटर का इस्तेमाल कर फ्री-पिस्टन स्टर्लिंग कन्वर्टर के साथ सिस्टम टेस्ट किया. परिणाम उत्साहजनक रहे—सिस्टम दशकों तक बिना रखरखाव के चल सकता है.

Am-241 न्यूक्लियर वेस्ट से प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए सप्लाई भी 상대 में आसान और सस्ती हो सकती है. Pu-238 की कमी एक समस्या रही है, लेकिन Am-241 इससे निपटने का बेहतर विकल्प साबित हो सकता है.

न्यूक्लियर बैटरी कैसे काम करती है?

रेडियोआइसोटोप पावर सिस्टम (RPS) में रेडियोआइसोटोप को सिरेमिक फॉर्म में रखा जाता है, जो सुरक्षित और स्थिर रहता है. इसका क्षय गर्मी पैदा करता है. यह गर्मी कन्वर्टर तक पहुंचती है, जो उसे बिजली में बदलता है.

पारंपरिक RTG (रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर) में थर्मोकपल्स का इस्तेमाल होता है, लेकिन नई पीढ़ी में फ्री-पिस्टन स्टर्लिंग कन्वर्टर बेहतर दक्षता देते हैं.

फ्री-पिस्टन स्टर्लिंग कन्वर्टर में पिस्टन माइक्रोग्रेविटी में तैरते रहते हैं. तापमान के अंतर से वे हिलते हैं और यह गति बिजली में बदल जाती है. इसमें कम घिसाव होता है और NASA के परीक्षणों में एक कन्वर्टर 14 साल से ज्यादा बिना मेंटेनेंस के चल चुका है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह दशकों तक लगातार काम कर सकता है.

Am-241 आधारित सिस्टम में स्टर्लिंग कन्वर्टर के साथ मिलाकर दक्षता और विश्वसनीयता दोनों बढ़ाई जा रही है. परीक्षणों में एक कन्वर्टर फेल होने पर भी पावर लॉस नहीं होता—यह रॉबस्टनेस का बड़ा प्रमाण है.

भविष्य की संभावनाएं

Am-241 अभी परीक्षण चरण में है. यह Pu-238 की जगह ले चुका नहीं है, लेकिन बाहरी सौर मंडल, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव या बर्फीले उपग्रहों पर जाने वाले लंबे मिशनों के लिए आदर्श माना जा रहा है. यूनिवर्सिटी ऑफ लेस्टर के स्पेस पार्क और पेरपेचुअल एटॉमिक्स जैसी कंपनियां भी Am-241 पर काम कर रही हैं. हाई वेलोसिटी इम्पैक्ट टेस्ट जैसे सुरक्षा परीक्षण सफल रहे हैं.

यह तकनीक सिर्फ अंतरिक्ष तक सीमित नहीं रहेगी. भविष्य में यह दूरदराज के इलाकों, आपदा प्रबंधन या लंबे समय तक बिना चार्ज किए चलने वाले उपकरणों में उपयोगी हो सकती है. हालांकि, सुरक्षा, रेडिएशन शील्डिंग और मास प्रोडक्शन चुनौतियां अभी बाकी हैं.

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