जिस दिन राखी नहीं, मनाया जाता है मातम, जानें श्रावणी पूर्णिमा की वो खौफनाक घटना जिसने बना दिया ‘शोक दिवस’

पाली. जहाँ पूरा देश रक्षाबंधन के दिन खुशियों में सराबोर होता है, वहीं श्री आदि गौड़ वंशीय पालीवाल ब्राह्मण समाज के लिए यह दिन एक ऐतिहासिक त्रासदी और अभूतपूर्व बलिदान की याद दिलाता है. राजस्थान के पाली मारवाड़ से शुरू हुई यह गाथा जातीय स्वाभिमान और धर्म की रक्षा के लिए दिए गए महान त्याग की प्रतीक है. 6वीं सदी से पाली मारवाड़ में बसने वाला यह ब्राह्मण समाज बेहद समृद्ध और दूरदर्शी था.
समाज में भाईचारे की मिसाल ऐसी थी कि बाहर से आने वाले हर नए ब्राह्मण परिवार को ‘एक ईंट और एक रुपया’ देकर रातों-रात सक्षम बना दिया जाता था. जब स्थानीय लुटेरों से सुरक्षा की बात आई, तो पालीवालों ने राठौड़ वंश के राजा सीहा को शासन और सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी.
एक ईंट और एक रुपये से बसा था समृद्ध नगरइतिहासकारों और समाज के वरिष्ठजनों के अनुसार, श्री आदि गौड़ वंशीय पालीवाल ब्राह्मण विक्रम संवत 534 में पाली में आकर बसे थे. उस समय पाली में इस समाज की आबादी करीब एक लाख से अधिक थी. समाज में सहकार की भावना इतनी मजबूत थी कि बाहर से आने वाले हर नए ब्राह्मण परिवार को बसाने के लिए नगर का प्रत्येक घर एक ईंट और एक रुपया सहयोग में देता था. ब्राह्मण होने के साथ-साथ यह समाज व्यापार में भी बेहद दक्ष था.
खिलजी के आक्रमण से रक्तांचल हुई पालीविक्रम संवत 1347-48 (सन 1291-92) के दौरान दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी (फिरोजशाह द्वितीय) ने पाली की संपन्नता की खबरें सुनकर शहर पर भीषण आक्रमण कर दिया. उस समय पाली के रक्षक राठौड़ वंश के शासक आस्थान भी वीरों की तरह लड़ते हुए शहीद हो गए. खिलजी की सेना ने जीत हासिल करने के लिए पाली के एकमात्र पेयजल स्रोत लोहड़िया तालाब में गोवंश काटकर फेंक दिया, जिससे पेयजल अपवित्र हो गया.
धौला चौतरा: 9 मण जनेऊ और 84 मण चूड़े का साक्षीश्रावणी पूर्णिमा के दिन जब समाज के लोग तालाबों पर तर्पण और धार्मिक उपाकर्म कर रहे थे, तब खिलजी की सेना के सामने अपने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए हजारों पालीवाल ब्राह्मणों ने केसरिया बाना पहनकर युद्ध में छलांग लगा दी.
इस भीषण नरसंहार में हजारों ब्राह्मण शहीद हुए और अनगिनत महिलाएं विधवा हुईं.
युद्ध के बाद शहीदों के शरीर से उतारी गई जनेऊ का वजन 9 मण था.
विधवा हुई माताओं और बहनों के हाथीदांत के उतारे गए चूड़ों का वजन 84 मण था.
इन पवित्र अवशेषों को अपवित्र होने से बचाने के लिए पाली के ‘धौला चौतरा’ स्थित कुएं में दफना दिया गया, जो आज भी इस बलिदान का मूक साक्षी है.
एक ही दिन में पाली का सामूहिक त्यागइस भीषण घटना और भारी विध्वंस के बाद, जीवित बचे पालीवाल ब्राह्मणों ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए उसी रक्षाबंधन के दिन पाली नगर का सामूहिक परित्याग कर दिया. यहां से निकलकर यह समाज देश के अलग-अलग हिस्सों में फैल गया, जिनमें से एक बड़े हिस्से ने जैसलमेर रियासत में जाकर कुलधरा और खाभा सहित 84 नए गांव बसाए.
आज भी कायम है परंपराराजस्थान पालीवाल समाज के अनुसार, समाज का हर व्यक्ति आज भी इस ऐतिहासिक परंपरा को निभा रहा है. रक्षाबंधन पर पालीवाल धाम और धौला चौतरा पर देशभर से समाज के लोग एकत्रित होते हैं, जहां करोड़ों की लागत से स्मारक विकसित किया गया है. आज के दिन बहनें भाइयों को राखी नहीं बांधतीं, बल्कि पूरा समाज एकजुट होकर अपने उन वीर पूर्वजों को नमन करता है जिन्होंने धर्म और स्वाभिमान के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे.
जलालुद्दीन खिलजी ने उजाड़ दिया था ब्राह्मणों का संसारविक्रम संवत 1347, सन 1291 में दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने पाली की समृद्धि देखकर आक्रमण किया. उस समय पालीवाल ब्राह्मण परम्परा के अनुसार लाखोटिया और लोहड़िया तालाब पर श्रावणी उपाकर्म और तर्पण कर रहे थे. आक्रमण के दौरान हजारों ब्राह्मण वीरगति को प्राप्त हुए. तालाबों का पानी गोवंश की हत्या से अपवित्र किया गया. राठौड़ शासक राव सीहा के पुत्र आस्थान भी इन्हीं की रक्षा करते हुए शहीद हुए, जिसका साक्षी पाली आज भी है.
इस दिन श्रद्धांजलि करते है अर्पितराजस्थान पालीवाल समाज के उपाध्यक्ष ऋषिदत्त पालीवाल के अनुसार श्रावणी पूर्णिमा पर पालीवाल समाज रक्षाबंधन नहीं मनाता, बल्कि तालाबों पर तर्पण कर पूर्वजों को स्मरण करता है. पाली में करोड़ों की लागत से विकसित पालीवाल धाम पर देशभर से समाजजन आकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जो इस बार भी करेंगे.



