3500000 की नौकरी छोड़ी, गांव लौटकर खड़ा किया 35 करोड़ का कारोबार, अब ब्रिटेन से फंडिंग

पाली. राजस्थान का पाली जिला अब तक रंग-बिरंगे कपड़ों और अपने विशाल टेक्सटाइल उद्योग के लिए जाना जाता रहा है. लेकिन अब इसी पाली की माटी से एक ऐसी ‘सफेद क्रांति’ की कहानी सामने आ रही है, जिसकी गूंज भारत ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार ब्रिटेन तक सुनाई दे रही है. अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह ‘सफेद सोना’ क्या है? दरअसल, डेयरी सेक्टर में दूध और उससे तैयार होने वाले प्रीमियम ‘वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स’, जैसे ऊंटनी या गाय के दूध से बने विशेष उत्पादों को आज के समय में ‘सफेद सोना’ कहा जाता है. यह पशुपालकों और उद्यमियों के लिए सोने की तरह कीमती साबित हो रहा है.
कहानी की शुरुआत होती है 35 लाख रुपये के सालाना पैकेज, आरामदायक जिंदगी और सुरक्षित भविष्य को छोड़कर अपने गांव लौटे पाली के एक जुनूनी युवा से. जब इस युवा ने कॉरपोरेट जॉब छोड़ी, तो शायद अपनों ने भी इसे एक जोखिम भरा कदम माना. लेकिन जिसे लोग एक सामान्य व्यवसाय समझते थे, उसी दूध के ‘वैल्यू एडिशन’ और ‘मिल्क स्टेशन’ के जरिए इस युवा ने 35 करोड़ रुपये का विशाल कारोबार खड़ा कर दिया.
ऊंटनी के दूध से भी किया कमाल
कई बार इंसान का अपनी जड़ों की ओर लौटना और एक नया विचार चुनना ही उसकी सबसे बड़ी सफलता की वजह बन जाता है. राजस्थान के पाली जिले के निर्मल चौधरी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. कॉरपोरेट दुनिया में सालाना 35 लाख रुपये का आकर्षक पैकेज मिलने के बावजूद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और मारवाड़ की मिट्टी में लौटकर कुछ नया करने का फैसला किया. उन्होंने रेगिस्तान की उस अनमोल विरासत ‘ऊंटनी के दूध’ को चुना, जिसे लोग लंबे समय तक नजरअंदाज करते रहे थे.
टेक्सटाइल नगरी के रूप में पाली की पहचानअब तक पाली जिले को देशभर में सूती वस्त्र उद्योग, रंगाई-छपाई और टेक्सटाइल मिलों के कारण ‘टेक्सटाइल नगरी’ के रूप में जाना जाता है. लेकिन निर्मल चौधरी की इस अनूठी पहल से पाली की पहचान का दायरा और बढ़ रहा है. आने वाले समय में पाली केवल कपड़ों के उत्पादन के लिए ही नहीं, बल्कि देशभर में दूध उत्पादन और डेयरी प्रोसेसिंग के एक बड़े केंद्र के रूप में भी तेजी से उभरकर सामने आ सकता है.
35 लाख की नौकरी छोड़ 2.5 करोड़ से शुरू किया सफरकॉरपोरेट सेक्टर में सफल करियर के बावजूद निर्मल ने अपनी ऊर्जा को उद्यमिता और एग्री-बिजनेस में लगाने का फैसला किया. बेंगलुरु में एलन करियर इंस्टीट्यूट की नौकरी छोड़कर उन्होंने 2021 में 2.5 करोड़ रुपये के बैंक लोन से ‘मिल्क स्टेशन’ की नींव रखी. किसान परिवार से जुड़े निर्मल ने स्थानीय ऊंट प्रजनकों को साथ जोड़कर ऊंटनी के दूध से घी, छाछ, पनीर, कुकीज और साबुन जैसे वैल्यू-ऐडेड प्रोडक्ट्स बाजार में उतारे.
ब्रिटेन की कंपनी से मिली 22.5 करोड़ रुपये की फंडिंग
वित्त वर्ष 2024 में 35 करोड़ रुपये का राजस्व दर्ज करने वाले इस स्टार्टअप की सफलता की गूंज विदेशों तक पहुंची. निर्मल के इनोवेशन और तेजी से बढ़ते कारोबार को देखते हुए हाल ही में ब्रिटेन यानी UK की एक बड़ी डेयरी कंपनी ने उन्हें 22.5 करोड़ रुपये की फंडिंग दी है. इस फंड का इस्तेमाल प्लांट को पूरी तरह ऑटोमैटिक और अत्याधुनिक बनाने में किया जाएगा. निर्मल का लक्ष्य अगले 5 वर्षों में 100 करोड़ रुपये के राजस्व के आंकड़े को छूना है.
सूखा बेल्ट बना ‘वाइट गोल्ड’ का गढ़
निर्मल बताते हैं कि आमतौर पर लोग पश्चिमी राजस्थान को सूखा क्षेत्र मानकर कतराते हैं, लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. बीकानेर के बाद पाली में दूध उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं. सूखे चारे की उपलब्धता के कारण यहां के मवेशियों के दूध की गुणवत्ता अन्य क्षेत्रों से काफी बेहतर होती है. निर्मल का मानना है कि जिस तरह पाली ने टेक्सटाइल के क्षेत्र में देश-दुनिया में अपनी धाक जमाई है, उसी तरह आने वाले समय में यह क्षेत्र गुणवत्तापूर्ण दूध और एग्री-बिजनेस का सिरमौर बन सकता है.



