PSA जांच में अगर बढ़ा आए एंटीजन, तो क्या हो गया प्रोस्टेट कैंसर? डॉ. राजीव सूद ने दी जरूरी सलाह

आजकल पुरुषों में प्रोस्टेट और प्रोस्टेट कैंसर की समस्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उससे भी ज्यादा इस बीमारी को लेकर उनका डर बढ़ रहा है. डॉक्टरों का कहना है कि उनके पास कई ऐसे मरीज आते हैं जो खुद ही अपने लक्षणों को देखकर पीएसए जांच करा लेते हैं, और उसमें बढ़े एंटीजन को देखकर कैंसर के खतरे से डरते हुए डॉक्टरों के पास आते हैं. मरीज ये समझ लेते हैं कि उन्हें बीमारी हो चुकी है, जबकि ऐसा नहीं होता.
पैसिफिक वन हेल्थ अस्पताल में यूरोलॉजी साइंस एंड एंड्रोलॉजी के प्रिंसिपल डायरेक्टर डॉ. राजीव सूद कहते हैं कि प्रोस्टेट कैंसर को लेकर सबसे बड़ी चुनौती केवल बीमारी नहीं, बल्कि इसके शुरुआती संकेतों को लेकर जागरूकता की कमी है. कई पुरुष पेशाब से जुड़ी परेशानियों को उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मानकर महीनों या वर्षों तक नजरअंदाज करते रहते हैं. वहीं कुछ पुरुष प्रोस्टेट कैंसर का नाम सुनते ही हर यूरिनरी लक्षण को कैंसर से जोड़कर घबरा जाते हैं. दोनों स्थितियां सही नहीं हैं.
‘मेरे क्लिनिकल अनुभव में सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हर यूरिनरी सिम्टम कैंसर नहीं होता, लेकिन लगातार बने रहने वाले बदलावों को बिना जांच के छोड़ना भी उचित नहीं है.
पेशाब की समस्या हमेशा प्रोस्टेट कैंसर नहीं होतीवे कहते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ प्रोस्टेट ग्लैंड का आकार बढ़ना (Benign Prostatic Hyperplasia) यानि BPH बहुत आम है. इससे पेशाब की धार कमजोर होना, पेशाब शुरू करने में समय लगना, बार-बार पेशाब आना, रात में कई बार उठना या पेशाब के बाद भी ब्लैडर पूरी तरह खाली न होने जैसा महसूस होना हो सकता है.
इसी तरह यूरिनरी इन्फेक्शन, प्रोस्टेटाइटिस, ओवरएक्टिव ब्लैडर, और डायबिटीज भी यूरिनरी फ्रीक्वेंसी या अर्जेंसी का कारण बन सकते हैं. इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर प्रोस्टेट कैंसर का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है.
फिर प्रोस्टेट कैंसर को लेकर चिंता कब करनी चाहिए?प्रोस्टेट कैंसर की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि शुरुआती चरण में कई पुरुषों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते. इसलिए केवल पेशाब में परेशानी शुरू होने का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है.
जब बीमारी आगे बढ़ती है, तब पेशाब करने में कठिनाई, कमजोर धार, बार-बार या तुरंत और अचानक पेशाब आना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. कुछ मामलों में पेशाब या सीमेन में खून भी आ सकता है. लगातार लोवर बैक, हिप या पेल्विक एरिया में दर्द एडवांस्ड डिजीज में दिखाई दे सकता है. हालांकि ये लक्षण दूसरी बीमारियों में भी हो सकते हैं और इनका मतलब अपने आप कैंसर नहीं है. उम्र और फैमिली हिस्ट्री को नजरअंदाज न करें.
पेशाब की समस्या हमेशा प्रोस्टेट कैंसर नहीं होतीवे कहते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ प्रोस्टेट ग्लैंड का आकार बढ़ना (Benign Prostatic Hyperplasia) यानि BPH बहुत आम है. इससे पेशाब की धार कमजोर होना, पेशाब शुरू करने में समय लगना, बार-बार पेशाब आना, रात में कई बार उठना या पेशाब के बाद भी ब्लैडर पूरी तरह खाली न होने जैसा महसूस होना हो सकता है.
इसी तरह यूरिनरी इन्फेक्शन, प्रोस्टेटाइटिस, ओवरएक्टिव ब्लैडर, और डायबिटीज भी यूरिनरी फ्रीक्वेंसी या अर्जेंसी का कारण बन सकते हैं. इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर प्रोस्टेट कैंसर का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है.
फिर प्रोस्टेट कैंसर को लेकर चिंता कब करनी चाहिए?प्रोस्टेट कैंसर की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि शुरुआती चरण में कई पुरुषों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते. इसलिए केवल पेशाब में परेशानी शुरू होने का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है.
जब बीमारी आगे बढ़ती है, तब पेशाब करने में कठिनाई, कमजोर धार, बार-बार या तुरंत और अचानक पेशाब आना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. कुछ मामलों में पेशाब या सीमेन में खून भी आ सकता है. लगातार लोवर बैक, हिप या पेल्विक एरिया में दर्द एडवांस्ड डिजीज में दिखाई दे सकता है. हालांकि ये लक्षण दूसरी बीमारियों में भी हो सकते हैं और इनका मतलब अपने आप कैंसर नहीं है. उम्र और फैमिली हिस्ट्री को नजरअंदाज न करें.
प्रोस्टेट कैंसर का रिस्क उम्र के साथ बढ़ता है. इसके अलावा जिन पुरुषों के पिता या भाई को प्रोस्टेट कैंसर रहा है, उनमें जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में अधिक हो सकता है. इसलिए पारिवारिक इतिहास वाले पुरुषों को अपने डॉक्टर से प्रोस्टेट कैंसर स्क्रीनिंग के बारे में अपेक्षाकृत पहले बातचीत करनी चाहिए.
PSA टेस्ट में बढ़ जाएं एंटीजन, तो क्या कैंसर का संकेत है? यह भी समझना जरूरी है कि PSA जांच कोई कैंसर की जानकारी देने वाला (cancer confirmation test) टेस्ट नहीं है. PSA बढ़ना एन्लार्ज्ड प्रोस्टेट या प्रोस्टेटाइटिस जैसी स्थितियों में भी हो सकता है. वहीं केवल एक सामान्य पीएसए रिजल्ट के आधार पर हर व्यक्ति में कैंसर कर जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता. स्क्रीनिंग का फैसला उम्र, फैमिली हिस्ट्री, लक्षण, पूरे स्वास्थ्य और व्यक्तिगत खतरों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए.
पुरुषों को कब यूरोलॉजिस्ट से मिलना चाहिए?यदि पेशाब से जुड़ी समस्या नई है, लगातार बनी हुई है या धीरे-धीरे बढ़ रही है, तो इसे केवल एजिंग मानकर टालना नहीं चाहिए. खासकर रात में बार-बार उठना, पेशाब की धार में लगातार बदलाव, पेशाब शुरू करने में कठिनाई, पेशाब में खून, अचानक वजन घटना, या लगातार कमर और पेल्विक एरिया में दर्द जैसे संकेतों पर मेडिकल इवेल्यूएशन जरूरी है.
जांच के दौरान डॉक्टर लक्षणों, मेडिकल हिस्ट्री, और फैमिली हिस्ट्री समझने के बाद जरूरत के अनुसार यूरिन टेस्ट, प्रोस्टेट एक्जामिनेशन, PSA और आगे MRI जैसी जांच की सलाह दे सकते हैं. अगर कैंसर का शक बना रहता है, तो बायोप्सी की जांच बीमारी की पुष्टि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
डॉक्टर सूद कहते हैं कि प्रोस्टेट हेल्थ को लेकर डर नहीं बल्कि जागरूकता की जरूरत है. हर यूरिनरी संकेत को कैंसर समझना गलत है, लेकिन उसे उम्र का असर मानकर नजरअंदाज करना भी जोखिम भरा हो सकता है. समय पर यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेना समस्या का सही कारण समझने और जरूरत पड़ने पर उपचार जल्द शुरू करने की दिशा में पहला कदम है.
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