अजमेर की इस रहस्यमयी धरोहर में आज भी जिंदा हैं 250 साल पुराने रंग, देखकर लोग रह जाते हैं दंग

Last Updated:May 13, 2026, 17:40 IST
Ajmer Famous Heritage: अजमेर की ऐतिहासिक धरोहर सोनी जी की नसियां सोनी परिवार की निजी संपत्ति, पारंपरिक तकनीक और प्राकृतिक रंगों से हुई मरम्मत के बाद फिर से चमक उठी. खास बात यह रही कि मरम्मत और रंगों के पुनर्निर्माण में आधुनिक रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया गया. इसकी जगह सदियों पुरानी पारंपरिक विधियों को अपनाया गया, ताकि इसकी मूल पहचान बरकरार रह सके.
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अजमेर. अजमेर की ऐतिहासिक धरोहर सोनी जी की नसियां अपनी भव्यता, स्थापत्य कला और अनोखी कलाकृतियों के कारण देशभर में खास पहचान रखती है. इस ऐतिहासिक धरोहर का निर्माण नगर सेठ रायबहादुर सेठ मूलचंद जी सोनी ने करवाया था, जिन्हें ब्रिटिश शासनकाल में ‘सर सेठ रायबहादुर’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था. वर्ष 1864 में इस भव्य निर्माण की नींव रखी गई और 1865 में इसे आमजन के लिए खोल दिया गया. आज भी यह पूरा परिसर सोनी परिवार की निजी संपत्ति है और उनके वंशज इसकी देखरेख और संरक्षण का कार्य संभाल रहे हैं.
सेठ मूलचंद जी सोनी के बाद उनके पुत्र नेमीचंद जी, फिर टीकमचंद जी और उसके बाद सेठ भागचंद जी ने इस ऐतिहासिक धरोहर को आगे बढ़ाया. वर्तमान में सेठ प्रमोदचंद जी सोनी सहित परिवार के सदस्य इस विरासत के संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. समय के साथ भवन की कई दीवारों, रंगों और कलात्मक डिजाइनों को नुकसान पहुंचा, जिसके बाद बीकानेर के पुरस्कार प्राप्त कलाकारों को बुलाकर इसे प्राचीन तकनीकों से दोबारा संवारा गया.
केमिकल वाले रंगों का नहीं होता है इस्तेमालखास बात यह रही कि मरम्मत और रंगों के पुनर्निर्माण में आधुनिक रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया गया. इसकी जगह सदियों पुरानी पारंपरिक विधियों को अपनाया गया, ताकि इसकी मूल पहचान बरकरार रह सके. यही वजह है कि आज भी यह धरोहर अपने पुराने वैभव और कलात्मक सुंदरता के साथ लोगों को आकर्षित करती है.
प्राकृतिक रंगों से जीवंत हुई कलाकृतियांसोनी जी की नसियां की सबसे बड़ी खासियत इसकी अद्भुत कलाकृतियां और प्राकृतिक रंगों से सजी भित्ति चित्रकारी है. यहां इस्तेमाल किए गए रंग दही, हल्दी, विशेष पत्थरों, वनस्पतियों और फलों से तैयार किए गए हैं. पीले रंग को दही और हल्दी से बनाया गया, जबकि नीले रंग के लिए लैपिस नामक पत्थर का उपयोग किया गया.
कलाकारों ने स्टोन कलर की उस प्राचीन तकनीक को फिर से जीवंत किया, जो करीब 250 वर्ष पहले प्रचलित थी. मंदिर और संग्रहालय परिसर में इतनी अधिक कलाकृतियां मौजूद हैं कि उन्हें एक बार में पूरी तरह समझ पाना आसान नहीं है. यही कारण है कि यहां आने वाला हर पर्यटक इसकी भव्यता, कला और इतिहास को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता है.
About the AuthorAnand Pandey
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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Ajmer,Ajmer,Rajasthan



