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Last Updated:December 03, 2025, 12:53 IST

Sirohi Documentary News: सिरोही, राजस्थान का वह गौरवशाली शहर है जो अपने शौर्यपूर्ण इतिहास, देवनगरी शैली और मशहूर तलवारों के लिए देशभर में पहचाना जाता है. राजपूताना वीरता की मिट्टी में पला-बढ़ा सिरोही सदियों से शिल्प, युद्धकला और संस्कृति का केंद्र रहा है. यहां की तलवारें न सिर्फ राजस्थान बल्कि पूरे देश में अपनी मजबूती और खास डिजाइन की वजह से प्रसिद्ध हैं. यह डॉक्यूमेंट्री सिरोही की ऐतिहासिक विरासत, वीर योद्धाओं, स्थापत्य कला और पारंपरिक हथियारों की अद्भुत कहानी को गहराई से बताती है.

सिरोही: मैं हूं सिरोही. राजस्थान के गुजरात सीमा से सटे सिरणवा पहाड़ी की तलहटी में बसा शहर. मैं एक समय में सिरोही देवड़ा चौहान शासकों की राजधानी हुआ करता था, आज सिरोही नामक जिले का मुख्यालय हूं. मेरी पहचान यहां की प्रसिद्ध तलवारों से बनी जो कई युद्ध में भी काम में आई है. देवनगरी के रूप में विख्यात इस शहर की पहचान यहां के ऐतिहासिक मंदिरों और किले से होती है.

सिरोही शहर की स्थापना आखातीज की बीज को गुरुवार के दिन 1425 ईस्वी में राव सैंसमल (सहस्त्रमल) ने सिरनवा की पहाड़ियों की तलहटी वाले क्षेत्र में इस शहर की नींव रखी थी. सिरोही राज्य की स्थापना 1311 से पहले देवड़ा राजपूतों के शासकों ने की थी और इस क्षेत्र को एक राज्य के रूप में स्थापित किया था.1405 में तत्कालीन शासक शिवभान ने अभी के सिरोही शहर से 3 किलोमीटर पूर्व की ओर शिवपुरी को अपनी राजधानी बनाया था. इसके बाद 1425 में राव सैंसमल ने वर्तमान के सिरोही शहर और किले का निर्माण करवाया और इसे अपनी राजधानी बनाया. सिरोही का ये नाम सि-रोही यानी सिर कटने वाली यानी तलवार से पड़ा. यहां की तलवारों की देश विदेश में डिमांड होती है.

जहां खरगोश ने दिखाई थी बहादुरी वहां पड़ी शहर की नींव सिरोही शहर की स्थापना को लेकर एक कहानी प्रसिद्ध है. सिरोही के पूर्व राज परिवार के सदस्य महाराव रघुवीर सिंह देवड़ा के अनुसार राजपूतों में आखातीज पर शिकार से वर्षभर का शकुन देखा जाता था. इसमें खरगोश का शिकार किया जाता था. महाराव सहस्त्रमल ने भी ये परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आखातीज की दूज को सारणेश्वर मार्ग के बिजोला की तरफ घुड़सवारों और 25 लाउजी श्वानों के साथ शिकार पर निकल गए. इसी दौरान एक खरगोश झाड़ियों निकला और आबू की पहाड़ियों की तरफ दौड़ने लगा.

करीब एक किलोमीटर दौड़ने के बाद एक जगह पर खरगोश आक्रमण की मुद्रा में खड़ा हो गया. जिसे देखकर महाराज सहस्त्रमल भी अचंभित हो गए थे. तब वहां मौजूद सरदार ने कहा की यह वीर भूमि है. इस वजह से यह खरगोश शेर हो गया है. राजा ने इस स्थान पर एक पीले पत्थर को स्थापित किया. जिससे यहां सिरोही शहर की स्थापना हुई.

ऐस बना सिरोही का किलासिरणवा पहाड़ियों की तलहटी पर देवड़ा शाखा के राव शिवभान के पुत्र सेंसमल ने 15 शताब्दी में यहां किले का निर्माण करवाया था. बाद में लाखा अखेराज द्वितीय और anu शासकों ने इसमें निर्माण करवाए. अब ये किला इस शहर की पहचान बना हुआ है. ये ऐतिहासिक किला सिरोही राजपरिवार के अधीन है. साल में एक दिन देवझूलनी एकादशी को आमजन के लिए इस किले के द्वार खुलते है. दो परकोटा से घिरा ये किला निर्माण शैली का बेजोड़ नमूना है. यहां बने मंदिर में देवझूलनी एकादशी को विशेष पूजा अर्चना होती है.

मुगल आक्रांताओं से शिवलिंग को छुड़वाकर सारणेश्वर में किया था स्थापितसिरोही शहर के इतिहास की बात की जाती है तब सारणेश्वर महादेव की शौर्य पूर्ण गाथा का जिक्र जरूर होता है. 1298 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात के सोलंकी सम्राटों द्वारा बनाए गए विशाल रूद्रमाल के शिवालय को ध्वस्त कर उसके शिवलिंग को निकालकर घसीटते हुए दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे. आबू की चन्द्रावती नगरी पहुंचते ही इसकी सूचना सिरोही के महाराव विजयराज को मिली , तो उन्होंने अपने भतीजे जालोर के कान्हडदेव सोनीगरा मेवाड के महाराणा रतन सिंह को पत्र भेजकर सूचना दी. सिरोही, जालोर एवं मेवाड की राजपूत सेनाओं ने मिलकर सुल्तान का पीछा किया और सिरणवा तलेटी में हुए भीषण युद्ध में राजपूत सेनाएं विजयी हुई और रूद्रमाल के शिव लिंग को प्राप्त कर उसे सिरणवा पहाड के पवित्र शुक्ल तीर्थ के सामने स्थापित किया. तब इस मंदिर का नाम क्षारणेश्वर’ रखा गया था. जिसे आज सारणेश्वर के नाम से जाना जाता है.

About the AuthorJagriti Dubey

With more than 6 years above of experience in Digital Media Journalism. Currently I am working as a Content Editor at News 18. Here, I am covering lifestyle, health, beauty, fashion, religion, career, politica…और पढ़ें

Location :

Sirohi,Rajasthan

First Published :

December 03, 2025, 12:53 IST

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राजपूताना की शान ‘सिरोही’, यहां की तलवारें क्यों बन गई राष्ट्रीय पहचान?

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