1942 की वो बांगड़ मिल, जिसने मारवाड़ की किस्मत बदल दी; जानें कैसे पाली बना राजस्थान का टेक्सटाइल हब?

Last Updated:May 10, 2026, 16:13 IST
Pali Textile Industry: पाली ने राजस्थान को औद्योगिक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है. वर्ष 1942 में स्थापित उम्मेद मिल, जिसे बाद में बांगड़ मिल के नाम से जाना गया, ने यहां टेक्सटाइल उद्योग की नींव रखी. मलमल और साफों से शुरू हुआ यह सफर आज आधुनिक ड्रेस मटेरियल और देशभर में लोकप्रिय कपड़ों तक पहुंच चुका है. पाली के उद्यमियों ने सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद देशभर में बाजार तैयार किया. मुंबई और सूरत जैसी बड़ी टेक्सटाइल मंडियों से मुकाबला करते हुए पाली आज भी राजस्थान के प्रमुख टेक्सटाइल हब के रूप में पहचान बनाए हुए है.
आज हम बात कर रहे हैं उस शहर की जिसने राजस्थान को औद्योगिक पहचान दिलाई. जब जोधपुर में मूलभूत सुविधाओं का अभाव था, तब पाली में राजस्थान की सबसे बड़ी ‘बांगड़ मिल’ की गूंज सुनाई देती थी. मलमल के थानों से शुरू हुआ यह सफर आज करोड़ों के टेक्सटाइल कारोबार और देशभर में पहचान तक पहुंच चुका है. राजस्थान में टेक्सटाइल उद्योग की नींव वर्ष 1942 में रखी गई थी. उस समय जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह ने टेक्सटाइल की संभावनाओं को देखते हुए पाली को चुना. जवाई बांध से पानी की उपलब्धता ने पाली को उद्योग के लिए उपयुक्त बनाया. यहीं स्थापित हुई ‘उम्मेद मिल’, जिसे बाद में बांगड़ मिल के नाम से पहचान मिली. इस मिल ने पाली में रंगाई-छपाई और कपड़ा कारोबार की नई संस्कृति विकसित की.
पाली के उद्यमियों की सबसे बड़ी ताकत उनका विश्वास और व्यापारिक ईमानदारी रही है. करीब 40 साल पहले जब बैंकों से आसानी से फाइनेंस नहीं मिलता था, तब कारोबारियों ने अपनी जमा-पूंजी से टेक्सटाइल व्यापार शुरू किया. बिना बड़ी पहचान और सुरक्षा के बाहरी व्यापारियों को करोड़ों रुपए का माल उधारी पर दिया और खुद देशभर में घूम-घूमकर बाजार तैयार किए. पाली के कपड़ा उद्योग को आगे बढ़ाने में बाड़मेर, बालोतरा, बीकानेर और मेवाड़ से आए उद्यमियों का भी अहम योगदान रहा. यहां के कारोबार और संभावनाओं को देखकर कई व्यापारी स्थायी रूप से पाली में बस गए और उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.
पाली के टेक्सटाइल उद्योग का इतिहास राजस्थानी संस्कृति और पारंपरिक कारीगरी से गहराई से जुड़ा है. शुरुआत में यहां मलमल के कपड़े और पारंपरिक साफे तैयार किए जाते थे. अनुभवी उद्यमियों के अनुसार उस समय हाथ की बारीक कारीगरी और रंगों का अनोखा मेल पाली की खास पहचान था. दूर-दराज के लोग यहां से साफे खरीदने आते थे. समय के साथ तकनीक और बाजार की मांग बदली तो पाली का कपड़ा उद्योग भी आधुनिक होता गया. मलमल और साफों से शुरू हुआ यह सफर अब सलवार सूट, ड्रेस मटेरियल और आधुनिक परिधानों तक पहुंच चुका है. आज पाली का कपड़ा देशभर में लोकप्रिय है.
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एक दौर ऐसा भी था जब पाली के कच्चे रंगों और पारंपरिक छपाई को मुंबई की मशीन प्रिंटिंग से कड़ी चुनौती मिली. केंद्रीय राजनीति में प्रभाव रखने वाले मुंबई के पावर प्रोसेस उद्योग ने कई बार पाली के व्यापार को प्रभावित करने की कोशिश की. इसके बावजूद पाली के उद्यमियों ने हार नहीं मानी. स्थानीय रंगरेजों के सहयोग से यहां 80 प्रतिशत रंग स्थानीय स्तर पर तैयार किए जाने लगे, जिससे लागत घटी और बाजार में प्रतिस्पर्धा मजबूत हुई. समय के साथ पाली का टेक्सटाइल उद्योग तकनीकी रूप से और अधिक विकसित हुआ. आज यहां सूरत जैसी वैरायटी का कपड़ा तैयार हो रहा है, जिसकी देशभर में मांग बढ़ रही है.
आज पाली का टेक्सटाइल उद्योग कई चुनौतियों से जूझ रहा है. प्रदूषण और नदी में रंगीन पानी छोड़ने की घटनाओं के कारण उद्योगों पर लगातार दबाव बढ़ा है. वहीं कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और तकनीकी विशेषज्ञों की कमी भी कारोबारियों के लिए बड़ी परेशानी बनी हुई है. इसके बावजूद पाली के उद्यमी उद्योग को बचाए रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. अब उद्योग जगत और व्यापारियों की मांग है कि जनप्रतिनिधि और उद्यमी एक मंच पर आएं और पाली में आधुनिक टेक्सटाइल पार्क स्थापित किया जाए. इससे प्रदूषण नियंत्रण को मजबूती मिलेगी, रोजगार बढ़ेगा और पाली को फिर से राजस्थान के प्रमुख औद्योगिक केंद्र के रूप में नई पहचान मिल सकेगी.
देश की आजादी के दौर में ही पाली में टेक्सटाइल उद्योग की नई शुरुआत हो चुकी थी. वर्ष 1947 में पाली के प्यारा चौक में छीपा अल्लाबख्श थुली वाला ने महज 5 मीटर की टेबल पर घाघरापाट की छपाई शुरू की, जिसे यहां टेबल प्रिंटिंग की पहली पहल माना जाता है. इसके बाद वर्ष 1964 में समीरमल लोढ़ा जैसे दूरदर्शी उद्यमियों ने अहमदाबाद और मुंबई की आधुनिक तकनीक पाली तक पहुंचाई और ‘जी-गर’ स्थापित किए. धीरे-धीरे मदनलाल धोका, बाबूलाल कोठारी और भंवरलाल संचेती जैसे उद्योगपतियों ने बड़े कारखाने शुरू किए. लगातार बढ़ते निवेश और तकनीक के दम पर पाली जल्द ही राजस्थान का प्रमुख टेक्सटाइल हब बन गया.
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