चटकीले रंग और पारदर्शी वेशभूषा, नागौर की चित्रकला में दिखता है राजसी जीवन का वैभव, इतिहास भी है रोचक

Last Updated:April 20, 2026, 09:48 IST
Nagaur Painting Style: राजस्थान की कला परंपरा में नागौर की चित्रकला अपनी विशिष्ट पहचान रखती है. 18वीं सदी के बाद, खासकर 1750 के आस-पास जोधपुर रियासत में शामिल होने के बाद, इस शैली पर मारवाड़ का गहरा प्रभाव पड़ा. चित्रों में राजसी जीवन, दरबारी संस्कृति, शिकार और सामाजिक जीवन के दृश्य प्रमुखता से उभरे. भारी आकृतियां, बड़ी आंखें, पारदर्शी वेशभूषा और चटकीले रंग इसकी खास पहचान बने. नागौर किले और हवेलियों के भित्ति चित्र इस कला के जीवंत उदाहरण हैं, जो उस दौर की संस्कृति और जीवनशैली को दर्शाते हैं.
राजस्थान की समृद्ध कला परंपरा में नागौर की चित्रकला एक विशिष्ट स्थान रखती है. खासतौर पर 18वीं सदी के बाद इसमें बड़ा बदलाव देखने को मिला. लगभग 1750 ईस्वी के बाद नागौर, जोधपुर रियासत का हिस्सा बना, जिससे यहां की कला पर मारवाड़ दरबार का गहरा प्रभाव पड़ा. इसके परिणामस्वरूप चित्रों में राजसी जीवन, दरबारी ठाठ-बाट और सामंती संस्कृति के दृश्य प्रमुखता से उभरने लगे. रंगों की गहराई, सूक्ष्म रेखांकन और विषयों की विविधता ने नागौर शैली को अलग पहचान दी. यह शैली आज भी राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है
मारवाड़ शैली के प्रभाव से नागौर की चित्रकला में आकृतियों का स्वरूप अधिक प्रभावशाली हो गया. चित्रों में भारी-भरकम शरीर, मांसल चेहरे, बड़ी आंखें और घनी गलमुच्छों वाले पात्र प्रमुखता से नजर आने लगे. साथ ही राजस्थानी परंपरा के गहरे रंग, ऊंची पगड़ी और विशिष्ट वेशभूषा को भी खास स्थान मिला. इन चित्रों में दरबारी जीवन, शौर्य और सांस्कृतिक झलक साफ दिखाई देती है. नागौर किले और उसके महलों की दीवारों पर बने भित्ति चित्र इस शैली की बेहतरीन मिसाल हैं, जो उस दौर की कला और जीवन शैली को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं.
चित्रकला के व्याख्याता रहे प्रेमचंद सांखला के अनुसार नागौर की चित्रकला पर जोधपुर, बीकानेर और मुगल शैलियों का सम्मिलित प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. उन्होंने बताया कि इस शैली की खास पहचान बुझे हुए रंगों का प्रयोग और पारदर्शी वेशभूषा का चित्रण है. विशेष रूप से 18वीं सदी के बाद मारवाड़ शैली का प्रभाव अधिक स्पष्ट हो गया. इसके चलते चित्रों में भारी आकृतियां, मांसल चेहरे और बड़ी आंखों वाले पात्र प्रमुखता से उभरने लगे. ये विशेषताएं नागौर शैली को अन्य क्षेत्रीय शैलियों से अलग पहचान देती हैं और इसकी कलात्मक समृद्धि को दर्शाती हैं.
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नागौर की चित्रकला में महिलाओं की पारदर्शी पोशाक और ओढ़ने का चित्रण इसकी खास पहचान माना जाता है. मुगल और बीकानेरी शैलियों के प्रभाव के साथ स्थानीय रंगों का सुंदर समन्वय भी देखने को मिलता है. प्रेमचंद सांखला के अनुसार, 18वीं सदी के मध्य में जब बख्त सिंह को नागौर का शासन मिला, तब जोधपुर की दरबारी कला का सीधा प्रभाव यहां की चित्रकला पर पड़ा. इसके बाद चित्रों में राजसी जीवन और सौंदर्य का चित्रण अधिक निखरकर सामने आया. महिलाओं की पारदर्शी वेशभूषा का बारीक चित्रण इस शैली की विशिष्ट कलात्मक पहचान बन गया.
नागौर के किलों और हवेलियों में बने भित्ति चित्र केवल सजावट नहीं, बल्कि उस समय के सामाजिक जीवन, संस्कृति और राजसी परंपराओं का जीवंत दस्तावेज हैं. डीडवाना क्षेत्र के बांसा गढ़ और धनकोली गांव की हवेलियों में बने चित्र मारवाड़ शैली की प्रभावशाली झलक पेश करते हैं. इन भित्ति चित्रों में राजाओं-महाराजाओं, राजकुमारों और दरबारी जीवन से जुड़े प्रसंगों को विस्तार से दर्शाया गया है. साथ ही शिकार के दृश्य भी प्रमुखता से अंकित किए गए हैं. ये चित्र उस दौर की जीवनशैली, परंपराओं और कला कौशल को बेहद जीवंत और आकर्षक रूप में प्रस्तुत करते हैं.
नागौर की भित्ति चित्र शैली में घोड़े, हाथी और ऊंटों पर सवार योद्धाओं तथा व्यापारिक काफिलों के दृश्य उस समय के सामंती और सामाजिक जीवन को जीवंत रूप में दर्शाते हैं. आज भी कई स्थानों पर ये भित्ति चित्र आसानी से देखे जा सकते हैं. प्रेमचंद सांखला के अनुसार, नागौर की शैली में विभिन्न रियासतों की छाप स्पष्ट नजर आती है. यहां के भित्ति चित्रों में आकर्षक और चटकीले रंगों का भरपूर उपयोग किया गया है, जो इन्हें और भी प्रभावशाली बनाता है. ये चित्र उस दौर की कला, संस्कृति और जीवनशैली की अनमोल झलक प्रस्तुत करते हैं.
First Published :
April 20, 2026, 09:48 IST



