Rajasthan

800 साल पुरानी कला का रहस्य… हैदराबाद के पास छिपा ये गांव दुनिया को कर रहा है हैरान

Last Updated:April 25, 2026, 15:30 IST

Telangana Metal Craft: तेलंगाना के जंगांव जिले का पेम्बार्थी गांव 800 साल पुरानी धातु शिल्प परंपरा बचा रहा है, 2010 में इसे GI टैग मिला, कारीगर अब भी यह विरासत नई पीढ़ी तक पहुँचा रहे हैं. इतिहासकार ज़ाहिद सरकार के मुताबिक पेम्बार्थी की यह कला करीब 800 साल पुरानी है. काकतीय काल में विश्वकर्मा समाज के कुशल कारीगरों ने मंदिरों के विशाल द्वार, देवी-देवताओं की मूर्तियां, दीपक और राजसी रथों पर बारीक नक्काशी कर इस शिल्प को खास पहचान दी थी.

हैदराबाद. आधुनिकता और मशीनों से बने उत्पादों की चकाचौंध के बीच तेलंगाना का एक छोटा सा गांव आज भी अपनी सदियों पुरानी विरासत को पूरी लगन के साथ सहेज रहा है. हैदराबाद से करीब 80 किलोमीटर दूर जंगांव जिले का पेम्बार्थी गांव अपनी हस्तनिर्मित धातु शिल्प कला के लिए देश ही नहीं, दुनिया भर में पहचान बनाए हुए है. यह कला केवल तेलंगाना की सांस्कृतिक धरोहर नहीं है, बल्कि काकतीय राजवंश के वैभवशाली इतिहास की भी एक जीवंत मिसाल मानी जाती है.

इतिहासकार ज़ाहिद सरकार के मुताबिक पेम्बार्थी की यह कला करीब 800 साल पुरानी है. काकतीय काल में विश्वकर्मा समाज के कुशल कारीगरों ने मंदिरों के विशाल द्वार, देवी-देवताओं की मूर्तियां, दीपक और राजसी रथों पर बारीक नक्काशी कर इस शिल्प को खास पहचान दी थी. समय के साथ निजाम काल में इस कला का स्वरूप और विकसित हुआ, जहां पीतल, तांबा, चांदी और सोने से पानदान, सजावटी बक्से और घरेलू उपयोग की वस्तुएं तैयार की जाने लगीं. एक दौर ऐसा भी था जब इस गांव के 600 से अधिक परिवार इसी पुश्तैनी काम पर निर्भर थे.

बारीक नक्काशी की अनोखी प्रक्रियास्थानीय कारीगर बताते हैं कि इस शिल्प को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद कठिन और धैर्य मांगने वाली होती है. सबसे पहले पीतल या तांबे की सपाट शीट को गर्म लाख की मदद से लकड़ी की मेज पर स्थिर किया जाता है. इसके बाद कागज पर बने डिजाइन को धातु पर उकेरा जाता है. फिर छोटे हथौड़ों और बारीक छेनी से पीछे की ओर से नक्काशी की जाती है, जिससे डिजाइन उभरकर थ्री-डी प्रभाव में दिखाई देता है. अंत में इमली के पानी और राख के पाउडर से इसे घिसकर पॉलिश किया जाता है, जिससे इसमें सोने जैसी चमक आ जाती है.

जीआई टैग से मिली पहचानइस पारंपरिक कला को संरक्षण देने और कारीगरों की मेहनत को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए वर्ष 2010 में पेम्बार्थी धातु शिल्प को जीआई टैग प्रदान किया गया. यह मान्यता इस शिल्प की मौलिकता को सुरक्षित रखने के साथ ही इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाती है. आज भी पेम्बार्थी के कारीगर अपनी छेनी और हथौड़ी की आवाज के साथ इस विरासत को जिंदा रखे हुए हैं और नई पीढ़ी तक इसे पहुंचाने का काम कर रहे हैं, ताकि यह कला आने वाले समय में भी इसी तरह जीवंत बनी रहे.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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Location :

Hyderabad,Hyderabad,Telangana

First Published :

April 25, 2026, 15:30 IST

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