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राजस्थान का वह गांव जहां नहीं पड़ती सिलेंडर की जरूरत, बिना LPG के चल रही 120 रसोइयां, 4 साल से नहीं खरीदी एक भी गैस की टंकी

Last Updated:May 14, 2026, 09:19 IST

Bhilawar News: भीलवाड़ा का मोतीपुर गांव बायोगैस के सफल उपयोग से देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है. यहाँ के 120 परिवार पिछले 4 सालों से बिना एलपीजी सिलेंडर के गोबर से बनी गैस पर खाना बना रहे हैं. सरकारी सब्सिडी की मदद से मात्र 10 हजार रुपये के निवेश में लगे इन प्लांटों ने ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बना दिया है. इससे न केवल रसोई के खर्च में बचत हो रही है, बल्कि जैविक खाद की बिक्री से अतिरिक्त आय भी हो रही है. यह सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल मॉडल ग्रामीण भारत के लिए प्रेरणा है.

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Biogas Plant in Rajasthan Village: आमतौर पर देखा जाता है कि घर में अगर गैस खत्म हो जाए और समय पर सिलेंडर नहीं मिले तो लोग चिंतित हो जाते हैं. लेकिन भीलवाड़ा का एक ऐसा गांव है जो ऐसी परेशानियों से मीलों दूर है. भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील का मोतीपुर गांव इस मामले में मिसाल बनकर उभरा है. यहाँ करीब 120 परिवार पिछले कई वर्षों से बिना गैस सिलेंडर के अपना जीवन सुचारू रूप से चला रहे हैं. गांव में बायोगैस प्लांट की सफल पहल ने न केवल रसोई गैस की निर्भरता खत्म कर दी है, बल्कि ग्रामीणों को पूरी तरह आत्मनिर्भर भी बना दिया है. गोबर से बनने वाली गैस से खाना पकाने के साथ-साथ जैविक खाद तैयार कर अतिरिक्त आय भी अर्जित की जा रही है.

गाँव के ही रहने वाले ओमप्रकाश जाट ने बताया कि हमारे गांव में करीब 4 साल पहले पूर्व राजस्व मंत्री रामलाल जाट की पहल से बायोगैस की शुरुआत की गई. उनकी पहल और भीलवाड़ा डेयरी के प्रबंध संचालक द्वारा गांव में कई बैठकें की गईं. लोगों को जागरूक करने के बाद तय हुआ कि काश्तकार को केवल 10 हजार रुपये लगाने होंगे. बाकी 30 हजार रुपये की राशि एनडीबीटी के माध्यम से सब्सिडी के रूप में दिलाई गई. आज मोतीपुर, बडला और जबरिया मोतीपुर में करीब 120 प्लांट सफलतापूर्वक चल रहे हैं. इन प्लांटों में प्रतिदिन 8-10 किलो गोबर लगता है, जिससे लगभग 4 किलो गैस बन जाती है.

सुरक्षा और आर्थिक लाभ का दोहरा संगमग्रामीण रतन सिंह राठौड़ ने बताया कि यह 45 हजार रुपये का प्लांट है. हमने करीब 4 साल पहले इसे लगाया था. तब से आज तक हमने एक भी गैस टंकी नहीं खरीदी है. हमारे घर में 8 सदस्य हैं और सभी का खाना इसी से बन जाता है. यहाँ 24 घंटे गैस उपलब्ध रहती है. हमारे पास 8-10 मवेशी हैं जिनका गोबर हम इसमें उपयोग करते हैं. इस गैस प्लांट में किसी तरह के विस्फोट का कोई खतरा नहीं है. छोटा बच्चा भी इसे आसानी से चालू कर सकता है. अगर बटन चालू रह जाए, तो भी कोई खतरा नहीं होता. इसमें से किसी तरह की बदबू भी नहीं आती है.

जैविक खाद से फसलों की बढ़ी पैदावारबायोगैस प्लांट का लाभ केवल ईंधन तक सीमित नहीं है. इससे निकलने वाला लिक्विड वेस्ट (स्लरी) खेतों के लिए बेहतरीन खाद है. रतन सिंह के अनुसार, इस खाद को खेत में डालने से फसल की उपज दोगुनी हो जाती है. इसके अलावा, भीलवाड़ा डेयरी द्वारा 75 पैसे प्रति किलो के हिसाब से यह लिक्विड खरीदा जाता है, जिसका पैसा सीधे किसानों के खाते में आता है. डेयरी इस वेस्टेज से ऑर्गेनिक खाद तैयार करती है, जिसका 25 किलो का कट्टा किसानों को 375 रुपये में मिल जाता है. यह मॉडल पर्यावरण के अनुकूल है और आर्थिक रूप से भी सुदृढ़ है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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