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कभी पिपरमिंट खेती की पहचान थे ये टैंकर, आज खेतों में बनकर रह गए हैं बीते दौर की निशानी

Last Updated:June 25, 2026, 11:34 IST

महराजगंज जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों के पास खड़े पुराने टैंकर कभी पिपरमिंट खेती की पहचान माने जाते थे. करीब आठ-दस वर्ष पहले जिले में बड़े पैमाने पर पिपरमिंट की खेती होती थी और तेल निकालने के लिए इन टैंकरों का व्यापक उपयोग किया जाता था. समय के साथ खेती का रकबा घट गया, लेकिन आज भी खेतों में खड़े ये टैंकर उस दौर की याद ताजा करते हैं.

महराजगंज: हिमालय के तराई क्षेत्र में मौजूद उत्तर प्रदेश का महराजगंज जिला एक कृषि प्रधान जिला है जहां पर अलग-अलग प्रकार की खेती की जाती है. महराजगंज जिले की बात करें तो कृषि के दृष्टिकोण से यहां की भूमि बहुत ही उर्वर है. यहां के ज्यादातर किसान पारंपरिक खेती जैसे धान, गेहूं और गन्ने की खेती करते हैं लेकिन वहीं कुछ किसान पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर प्रगतिशील खेती कर रहे हैं.

महराजगंज जिले के ग्रामीण इलाकों में आज के समय में भी खेतों के किनारे खड़े पुराने लोहे के टैंकर देखने को मिलते हैं जो किसी भी व्यक्ति को एक बार सोचने पर मजबूर करते हैं. आज के समय में भले ही यह टैंकर सिर्फ लोहे के बने ढांचे हैं लेकिन यह टैंकर एक ऐसे दौर की कहानी बयां करते हैं जब यहां के किसानों के बीच पिपरमेंट की खेती तेजी से लोकप्रिय हो रहा था. वह दौर ऐसा था जब किसानों को पिपरमेंट की खेती में अच्छी आमदनी दिख रही थी. आठ से दस साल पहले जिले के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर पिपरमेंट की खेती की जा रही थी और इसका तेल निकालने के लिए इन टैंकरों का इस्तेमाल किया जाता था. यह वही टैंकर हैं जो आज के समय में खेतों के आसपास देखने को मिलते हैं.

तेल निकालने के लिए इन टैंकर का होता था इस्तेमाल

एक समय ऐसा था जब महराजगंज जिले के निचलौल, सिसवा, घुघली, फरेंदा और दूसरे ग्रामीण इलाकों में एक बड़ी संख्या में किसान पिपरमिंट की खेती कर रहे थे. यह दौर ऐसा था जब यह खेती किसानों को काफी आकर्षित करती थी लेकिन आज के समय में स्थिति ऐसी नहीं है बल्कि बहुत ही कम ऐसे किसान हैं जो पिपरमिंट की खेती कर रहे हैं. उस समय में पिपरमेंट की तेल की अच्छी मांग थी और उसकी वजह से उसकी कीमत भी ज्यादा हुआ करती थी जिसकी वजह से किसानों को इसमें एक अच्छा मुनाफा दिख रहा था. शुरुआती समय में तो एक लीटर तेल की कीमत तीन पांच हजार तक थी लेकिन बाद में स्थिति ऐसी हुई कि किसानों को सात सौ, आठ सौ रुपए प्रति लीटर की कीमत से पिपरमेंट के तेल को बेचना पड़ा. इसके बाद से यहां के किसान पिपरमेंट की खेती से दूर होने लगे लेकिन यह टैंकर जो तेल निकालने के काम में आते थे वह आज भी इन क्षेत्रों में पड़े हुए हैं. भले ही आज इन टैंकर का कोई इस्तेमाल ना हो लेकिन यह उस दौर की एक कहानी सुनाते हैं जब यहां एक बड़े पैमाने पर पिपरमेंट की खेती होती थी और यह किसानों के बीच बहुत लोकप्रिय था.

किसानों ने क्यों बनाई पिपरमेंट की खेती से दूरी

पिपरमेंट की खेती की बात करें तो इसमें सबसे खास होता है इसकी पत्ती और उसके पौधे जिससे पिपरमेंट का तेल निकलता है. इससे तेल निकालने के लिए एक विशेष टैंकर में उन्हें भर दिया जाता है और भाप की प्रक्रिया से उसमें से तेल निकाला जाता है. तेल निकालने के बाद इन्हें बाजारों में बेचा जाता है. उस समय में कुछ किसानों ने इस टैंकर को अपने खेतों या खाली जमीनों में स्थापित किया तो वहीं कुछ किसान उन्हें किराए पर इस्तेमाल करते थे.

कुछ समय तक यहां के किसानों को पिपरमेंट की खेती ने अच्छा मुनाफा दिया, लेकिन समय के साथ स्थिति बदलती गई और इससे किसानों का मोह भंग होने लगा. परिणाम यह हुआ कि आज के समय में स्थिति ऐसी है कि बहुत ही कम ऐसे किसान दिखते हैं जो पिपरमेंट की खेती कर रहे हैं. पिपरमेंट की खेती की बात करें तो यह एक बहुत ही मेहनत वाली खेती है जिसमें रखरखाव और तेल निकालने की प्रक्रिया में काफी मेहनत लगती है. जब किसानों को अपनी मेहनत के अनुसार पैसा नहीं मिल पाया तब से किसानों ने इसकी खेती से दूरी बना ली.

About the AuthorVivek Kumar

विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें

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