दम तोड़ती फसलों को फिर से हरा-भरा कर देगा यह घोल, जानें घर पर बनाने का सबसे आसान तरीका

पाली. आज के दौर में खेती में रसायनों का बढ़ता उपयोग न केवल मिट्टी को बंजर बना रहा है, बल्कि हमारी सेहत के लिए भी बड़ा खतरा है. इसी समस्या को देखते हुए पाली काजरी के वैज्ञानिक अब किसानों को ‘प्राकृतिक खेती’ की ओर बढ़ने की सलाह दे रहे हैं. प्राकृतिक खेती, सामान्य जैविक खेती से बिल्कुल अलग है क्योंकि इसमें आपको बाजार से कुछ भी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती. काजरी के वैज्ञानिक डॉ. अरविंद सिंह तेतरवाल, जो पौध संरक्षण और प्राकृतिक खेती इकाई का काम देखते हैं, उन्होंने बताया कि कैसे किसान अपनी देसी गाय के गोबर और गौमूत्र से ‘जीवामृत’ जैसी शक्तिशाली दवा और खाद घर पर ही तैयार कर सकते हैं.
काजरी वैज्ञानिक डॉ. अरविंद सिंह तेतरवाल के अनुसार, अक्सर लोग जैविक और प्राकृतिक खेती को एक ही समझते हैं, लेकिन इनमें बड़ा अंतर है. जैविक खेती (Organic Farming) में किसान बाजार से महंगे जैविक उत्पाद खरीदकर इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन प्राकृतिक खेती का मूल मंत्र है ‘बाजार से कुछ नहीं खरीदना’. इसमें जो भी लिक्विड खाद या कीटनाशक चाहिए, वह खेत की वनस्पति और संसाधनों से ही तैयार किया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य खेती की लागत को शून्य करना है.
देसी गाय है प्राकृतिक खेती की संजीवनी
डॉ. तेतरवाल बताते हैं कि प्राकृतिक खेती पूरी तरह से ‘गाय आधारित’ है. इसके लिए देसी गाय का होना अनिवार्य है, क्योंकि गौमूत्र और गोबर के बिना यह खेती संभव नहीं है. देशी गाय के गोबर और मूत्र में करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु होते हैं जो मिट्टी की उर्वरता को चमत्कारिक रूप से बढ़ा देते हैं. इसी के आधार पर ‘जीवामृत’ तैयार किया जाता है, जो पौधों के लिए अमृत के समान है.
ऐसे तैयार होता है ‘जीवामृत’ का घोल
खेत में ही लिक्विड खाद यानी जीवामृत बनाना बेहद आसान है. इसके लिए देसी गाय का गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन और खेत की मिट्टी का मिश्रण तैयार किया जाता है. डॉ. तेतरवाल के अनुसार, गुड़ जीवाणुओं के भोजन का काम करता है और बेसन उनकी संख्या को करोड़ों में बढ़ा देता है. जब यह मिश्रण खेत में डाला जाता है, तो यह मिट्टी को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाता है और फसलों को कीटों से भी बचाता है.
मिशन मोड में है केंद्र सरकार और काजरी का प्रोजेक्ट
प्राकृतिक खेती के महत्व को देखते हुए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे मिशन मोड में लिया है. डॉ. तेतरवाल ने बताया कि काजरी में पिछले तीन साल से प्राकृतिक खेती का प्रोजेक्ट चल रहा है. देशभर में किसानों को इसके प्रति जागरूक किया जा रहा है ताकि वे रासायनिक खेती के जाल से बाहर निकल सकें और शुद्ध अनाज पैदा कर सकें.
गेहूं की खेत में मिला सफल परिणाम
काजरी के वैज्ञानिकों ने केवल कागजों पर ही नहीं, बल्कि जमीन पर भी इसे सच कर दिखाया है. डॉ. तेतरवाल ने बताया कि उन्होंने डेमो के तौर पर गेहूं की फसल लगाकर रखी है. इस फसल में बाजार का कोई भी यूरिया या डीएपी इस्तेमाल नहीं किया गया है. केवल समय-समय पर ‘जीवामृत’ का छिड़काव किया जा रहा है और परिणाम बेहद उत्साहजनक हैं.
किसानों को दिया जा रहा है प्रशिक्षण
काजरी की टीम समय-समय पर किसानों को प्रशिक्षण दे रही है. प्रोजेक्ट के तहत किसानों के खेतों पर ही ‘डेमोंस्ट्रेशन’ (प्रदर्शन) किए जाते हैं ताकि वे खुद अपनी आंखों से प्राकृतिक खेती का असर देख सकें. वैज्ञानिक का मानना है कि यदि किसान इस पद्धति को अपना ले, तो वह कर्ज के बोझ से मुक्त होकर एक स्वस्थ और समृद्ध भविष्य की ओर बढ़ सकता है.



