शादी के बाद बेटी के मायके आने पर पूरे गांव में बंटती थी ये खास मिठाई, पर अंदर क्यों छिपाई जाती थी मिर्च और चूड़ियां? जानें

Last Updated:May 17, 2026, 08:30 IST
Mewati culture: अलवर के मेवात क्षेत्र में वर्षों पुरानी एक अनूठी परंपरा अब आधुनिकता के कारण लुप्त होने की कगार पर है. पहले शादी के 8-10 दिन बाद जब बेटी पहली बार ससुराल से मायके आती थी, तो पूरे गांव में आटे से बने पारंपरिक मीठे ‘खीजूरा’ बांटे जाते थे. हंसी-मजाक के लिए महिलाएं इसमें मिर्च या चूड़ियां छिपा देती थीं, जिसे लोग बड़े चाव से खाते थे. स्थानीय महिला रसमीना खान के अनुसार, अब लोग घर पर खीजूरा बनाने के बजाय बाजार से रेडीमेड लड्डू खरीदकर औपचारिकता निभा रहे हैं, जिससे आपसी भाईचारे की यह रस्म सिमटती जा रही है.
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Mewati culture: राजस्थान के अलवर जिले सहित पूरे मेवात क्षेत्र में इन दिनों शादियों का सीजन बड़े ही धूमधाम से चल रहा है. इस दौरान अलग-अलग समाजों और गांवों में विवाह से जुड़ी कई तरह की अनूठी परंपराएं और रस्में निभाई जा रही हैं. हालांकि, बदलते दौर और आधुनिकता के असर के कारण ग्रामीण अंचलों की वर्षों पुरानी कई खूबसूरत परंपराएं अब धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं. कुछ गांवों को छोड़ दिया जाए, तो भाईचारे और आपसी जुड़ाव की ये रस्में अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होने की कगार पर हैं. इन्हीं में से एक बेहद दिलचस्प रिवाज मेवात क्षेत्र में आज भी कुछ बुजुर्गों और चुनिंदा परिवारों द्वारा जिंदा रखा गया है.
मेवात क्षेत्र की वर्षों पुरानी और ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, जब किसी नवविवाहित लड़की की शादी संपन्न हो जाती थी और वह विवाह के करीब 8 या 10 दिन बाद पहली बार अपने ससुराल से मायके (अपने जन्म के गांव) लौटती थी, तो पूरे गांव में जश्न का माहौल बन जाता था. बेटी अपने ससुराल से पूरे गांव के लिए एक खास सौगात लेकर आती थी. पहले के समय में इस सौगात के रूप में आटे, चीनी या गुड़ से विशेष तौर पर तैयार किए गए मीठे ‘खीजूरा’ (एक प्रकार का पारंपरिक पकवान) लाए जाते थे. बेटी के मायके पहुंचते ही इन मीठे खीजूरों को गांव के हर एक घर में आदर के साथ बांटा जाता था, जिससे पूरे गांव का मुंह मीठा होता था.
मिर्च, चूड़ियां और किशमिश का वो मजेदार और अनोखा सस्पेंसमेवात की स्थानीय महिला रसमीना खान ने इस रिवाज के बेहद दिलचस्प और मजाकिया पहलू को साझा किया. उन्होंने बताया कि पहले के समय में जब लड़की के ससुराल में ये खीजूरे बनाए जाते थे, तो आसपास की महिलाएं आपस में हंसी-मजाक और ठिठोली करने के लिए खीजूरा बनाते समय उसके आटे के अंदर तेज लाल मिर्च, कांच की चूड़ियां या किशमिश जैसी चीजें गुपचुप तरीके से छिपा देती थीं. जब ये खीजूरे मायके के गांव में बंटते थे, तो ग्रामीणों के बीच एक मजेदार सस्पेंस और डर रहता था कि ससुराल से आए इन खीजूरों में जरूर कुछ न कुछ छिपा होगा. इसलिए लोग बेहद सावधानी और हंसते-मुस्कुराते हुए इसे खाते थे. सबसे खूबसूरत बात यह थी कि इस हंसी-मजाक का कोई भी व्यक्ति कभी बुरा नहीं मानता था, बल्कि इससे आपसी प्यार और बढ़ता था.
तीन दिन तक जुटती थीं औरतें, अब बाजार के रेडीमेड लड्डुओं ने ली जगहरसमीना खान बताती हैं कि बदलते वक्त के साथ अब यह अनोखा रिवाज और इसमें छिपा अपनापन धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है. पहले के दौर में जब बेटी के मायके आने का समय होता था, तो आसपास की औरतों का पूरा समूह इकट्ठा होकर लगातार तीन दिनों तक बड़े चाव से आटे के खीजूरे तैयार करता था. लेकिन आज के इस भागदौड़ भरे जीवन में घर पर खीजूरा कोई नहीं बनाता. अब जब भी बेटी मायके लौटती है, तो लड़की का पिता अपनी सहूलियत और सामर्थ्य के अनुसार बाजार से रेडीमेड लड्डू खरीद लेता है और वही बांटे जाते हैं. आधुनिकता के इस दौर में अब यह रिवाज भी सिमटता जा रहा है. लोग अब केवल अपने घरों तक ही सीमित रहने लगे हैं और पूरे गांव के हर घर में मिठाई पहुंचाने की यह खूबसूरत सामाजिक परंपरा अब लगभग बंद होने की कगार पर पहुंच गई है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें
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