हजारों सुरक्षित प्रसव, लाखों दुआएं! पलामू के डॉ. होरो की कहानी हर बेटी को करेगी प्रेरित

Last Updated:August 04, 2026, 18:48 IST
पलामू में पिछले 26 वर्षों से गायनी विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं दे रहीं डॉ. एस. एस. होरो आज हजारों महिलाओं के लिए भरोसे का नाम हैं. गुमला की रहने वाली डॉ. होरो ने अपनी मां से सेवा की प्रेरणा लेकर पटना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और गायनी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. बीपीएससी के माध्यम से उनकी नियुक्ति पलामू में हुई, जहां उन्होंने सीमित संसाधनों के बीच भी महिलाओं की बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निरंतर काम किया. परिवार की पहली डॉक्टर बनीं डॉ. होरो आज आदिवासी समाज की बेटियों को शिक्षा, मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर अपने सपने पूरे करने की प्रेरणा दे रही हैं.
झारखण्ड राज्य जो कि आदिवासी बाहुल्य है. यहां की बेटियां आज हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं. कभी जंगल-पहाड़ और सीमित संसाधनों के बीच जीवन बिताने वाले समाज से निकलकर कई महिलाओं ने अपनी मेहनत और लगन से नई पहचान बनाई है. ऐसी ही प्रेरणादायी शख्सियत हैं पलामू में पिछले 26 वर्षों से मेडिकल ऑफिसर एवं गायनी स्पेशलिस्ट के रूप में सेवाएं दे रहीं डॉ. एस. एस. होरो. हजारों महिलाओं के सुरक्षित मातृत्व और बेहतर स्वास्थ्य के लिए समर्पित डॉ. होरो आज क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं. मां से मिली सेवा की सीख, डॉक्टर बनने का संकल्प डॉ. एस. एस. होरो ने लोकल18 को बताया कि बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना था. हालांकि उस दौर में महिलाओं का घर से बाहर निकलकर उच्च शिक्षा हासिल करना आसान नहीं था. लेकिन उनकी मां मनोनीत होरो, जो रांची के एचईसी अस्पताल में नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट थीं, उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बनीं. मां को मरीजों की सेवा करते देख उनके मन में भी चिकित्सा के क्षेत्र में आने की इच्छा जागी. गुमला जिले के कामडारा की रहने वाली डॉ. होरो ने रांची के निर्मला कॉलेज से आईएससी की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद मेडिकल शिक्षा के लिए पटना का रुख किया. पटना से मेडिकल की पढ़ाई, बीपीएससी से मिली पलामू में नियुक्ति उन्होंने बताया कि वो पटना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की. इसी दौरान उनका चयन स्त्री एवं प्रसूति रोग (गायनी) में पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए हो गया. उन्होंने पीएमसीएच, पटना से गायनी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. पढ़ाई पूरी होने के बाद बीपीएससी के माध्यम से उनकी नियुक्ति पलामू में मेडिकल ऑफिसर के रूप में हुई. उनके लिए पलामू पूरी तरह अनजाना जिला था, जहां न कोई परिचित था और न ही कोई पारिवारिक सहयोग. बावजूद इसके उन्होंने अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए सेवा की शुरुआत की. वरिष्ठों के सहयोग से मिली नई पहचान डॉ. होरो ने आगे बताया कि शुरुआती दिनों में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन वरिष्ठ चिकित्सकों और तत्कालीन सिविल सर्जन का भरपूर सहयोग मिला. उन्होंने कहा कि मेडिकल की डिग्री हासिल करना जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक जरूरी उसे व्यवहारिक रूप से मरीजों की सेवा में उतारना है. संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने हजारों महिलाओं का इलाज किया और हर दिन कुछ नया सीखने का अवसर मिला. उनका मानना है कि पलामू में सेवा करने का अवसर उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य रहा है. परिवार की पहली डॉक्टर, युवाओं के लिए बनीं प्रेरणा डॉ. एस. एस. होरो ने बताया कि उनके पति जयवंत लकड़ा और वह अपने परिवार के पहले डॉक्टर हैं. उन्होंने कहा कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता. कठिन परिस्थितियों के बावजूद यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत ईमानदारी से की जाए और परिवार का सहयोग मिले, तो कोई भी सपना साकार किया जा सकता है. आज वे विशेष रूप से आदिवासी समाज की बेटियों से शिक्षा को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाने और अपने सपनों को पूरा करने का संदेश देती हैं.
About the AuthorAmit Singh
8 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. क्राइम, खेल, …
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August 04, 2026, 18:45 IST



