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पत्नी ने गिरवी रख दिए गहने, दादासाहेब फाल्के ने खुद दांव पर लगा दी जिंदगी, ऐसे शुरू हुआ भारतीय सिनेमा का सफर

Last Updated:April 30, 2026, 05:01 IST

आज भारतीय सिनेमा दुनिया के सबसे बड़े फिल्म इंडस्ट्रीज में गिना जाता है. हर साल हजारों फिल्में बनती हैं और करोड़ों लोग उन्हें देखते हैं. लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब भारत में फिल्मों का कोई अस्तित्व नहीं था. उस समय एक शख्स ने सपना देखा कि भारत की अपनी फिल्में हों, अपनी कहानियां हों और अपने कलाकार हों. ये शख्स थे दादासाहेब फाल्के.

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पत्नी ने गिरवी रख दिए गहने, दादासाहेब फाल्के ने खुद दांव पर लगा दी जिंदगीZoom हैरान करने वाला है योगदान

नई दिल्ली. दादासाहेब फाल्के का असली नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के था. उन्हें भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है. फिल्मों के लिए उनका जुनून इतना ज्यादा था कि उन्होंने इस सपने को पूरा करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी.

दादासाहेब फाल्के का जन्म 30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र में हुआ था. उनके पिता संस्कृत के बड़े विद्वान थे. बचपन से ही फाल्के की रुचि कला और रचनात्मक चीजों में थी. उन्होंने मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़ाई की. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने फोटोग्राफी और प्रिंटिंग के क्षेत्र में काम शुरू किया.

आसान नहीं थी असल जिंदगी

दादा फालके की जिंदगी आसान नहीं रही. कारोबार में नुकसान हुआ और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा. लेकिन इसी बीच एक घटना ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी.कहा जाता है कि जब उन्होंने विदेशी फिल्म द लाइफ ऑफ क्राइस्ट देखी, तो उनके मन में एक सवाल आया. अगर विदेशी लोग अपने धार्मिक किरदारों पर फिल्म बना सकते हैं, तो भारत में रामायण और महाभारत जैसी कहानियों पर फिल्म क्यों नहीं बन सकती.

बीमा पॉलिसी तक रख दी थी गिरवी

बस यहीं से उन्होंने फिल्म बनाने का फैसला कर लिया. उस दौर में भारत में फिल्म बनाना लगभग नामुमकिन माना जाता था. न किसी को कैमरे की जानकारी थी और न फिल्म बनाने की तकनीक का अनुभव.फाल्के ने ठान लिया कि वह खुद यह कला सीखेंगे. इसके लिए उन्होंने अपनी बीमा पॉलिसी तक गिरवी रख दी और लंदन चले गए. वहां जाकर उन्होंने फिल्ममेकिंग की बारीकियां सीखीं और जरूरी उपकरण खरीदकर भारत लौट आए.

पत्नी ने दिया था साथ

बता दें कि भारत वापस आने के बाद उन्होंने अपनी पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाने की तैयारी शुरू की. लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत पैसों की थी. ऐसे मुश्किल वक्त में उनकी पत्नी सरस्वती फाल्के उनके साथ मजबूती से खड़ी रहीं. सरस्वती फाल्के ने अपने गहने तक गिरवी रख दिए ताकि फिल्म पूरी हो सके. सिर्फ इतना ही नहीं, वह फिल्म की टीम के लिए खाना बनाती थीं, कलाकारों के कपड़े संभालती थीं और शूटिंग के दौरान हर जरूरी काम में हाथ बंटाती थीं.

बता दें कि साल 1913 में राजा हरिश्चंद्र रिलीज हुई और यही भारत की पहली फीचर फिल्म बनी. फिल्म को लोगों ने काफी पसंद किया और यहीं से भारतीय सिनेमा की नींव रखी गई. इसके बाद दादासाहेब फाल्के ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने मोहिनी भस्मासुर, सत्यवान सावित्री, लंका दहन, श्रीकृष्ण जन्म और कालिया मर्दन जैसी कई सफल फिल्में बनाईं. अपने करीब 19 साल के करियर में उन्होंने 95 फीचर फिल्में और 26 शॉर्ट फिल्में बनाई थीं. समय के साथ सिनेमा बदलने लगा और मूक फिल्मों की जगह बोलती फिल्मों ने ले ली. हालांकि फाल्के इस बदलाव के साथ ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए. उनकी आखिरी फिल्म गंगावतरण थी, जो 1937 में रिलीज हुई थी. 16 फरवरी 1944 को दादासाहेब फाल्के ने दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन भारतीय सिनेमा में उनका योगदान हमेशा अमर रहेगा. उनके सम्मान में भारत सरकार ने 1969 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार शुरू किया, जिसे भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है.

About the AuthorMunish KumarSenior sub editor

न्यूज 18 हिंदी में एंटरटेनमेंट सेक्शन में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार दिल्ली के रहने वाले हैं. डिजिटल मीडिया में उन्हें 10 साल का अनुभव है.राजधानी कॉलेज (DU) से पॉलिटिकल साइंस (ऑनर्स) की पढ…और पढ़ें

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First Published :

April 30, 2026, 05:01 IST

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