तीन चौक, विशाल दरवाजे और शाही नक्काशी… जयपुर की इस हवेली का इतिहास सुनकर रह जाएंगे दंग

Last Updated:May 12, 2026, 22:44 IST
Jaipur famous Haveli Near Hawamahal: जयपुर की हवामहल बाजार स्थित करीब 200 साल पुरानी भट्ट राजा की हवेली, राजगुरु सदाशिव पट्टराजम् को मिली थी, आज भी वंशज रहते हैं, अनोखी तीन चौक वाली वास्तुकला है. विष्णु कुमार भार्गव बताते हैं कि राजगुरु सदाशिव का पूरा नाम राजगुरु सदाशिव पट्टराजम् महाराज था. जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने उन्हें गुजरात से जयपुर बुलवाया था और राजगुरु के रूप में सम्मान देते हुए यह हवेली भेंट की थी.
जयपुर. जयपुर अपने ऐतिहासिक किलों और महलों के लिए जितना प्रसिद्ध है, उतना ही अपनी प्राचीन और ऐतिहासिक हवेलियों के लिए भी जाना जाता है. जयपुर की चारदीवारी में आज भी कई ऐसी हवेलियां मौजूद हैं, जो वर्षों बाद भी अपने बेजोड़ स्थापत्य और शाही विरासत के साथ मजबूती से खड़ी हैं. चारदीवारी क्षेत्र में ख्वास जी की हवेली, लाल हाथियों की हवेली, बुलियन हवेली और धाभाई की हवेली जैसी कई ऐतिहासिक इमारतें हैं, जहां आज भी लोग अपने पूर्वजों की विरासत के बीच रह रहे हैं.
इन्हीं में से एक हवामहल बाजार में स्थित राजा भट्ट की हवेली भी है, जो करीब 200 साल पुरानी मानी जाती है. इस हवेली की वास्तुकला और स्थापत्य कला इस बात की गवाही देती है कि इसे उस दौर में कितनी बारीकी और मेहनत से तैयार किया गया होगा. लोकल-18 ने भट्ट राजा की हवेली पहुंचकर यहां रहने वाले लोगों से इसके इतिहास को लेकर बातचीत की. इस दौरान विष्णु कुमार भार्गव ने बताया कि जयपुर में कई हवेलियां ऐसी हैं, जो उस समय राजा-महाराजाओं द्वारा राजदरबार से जुड़े विद्वानों और खास लोगों को भेंट की गई थीं. राजा भट्ट की यह हवेली भी करीब 175 वर्ष पहले राजगुरु सदाशिव को भेंट की गई थी.
राजगुरु सदाशिव को मिली थी यह हवेलीविष्णु कुमार भार्गव बताते हैं कि राजगुरु सदाशिव का पूरा नाम राजगुरु सदाशिव पट्टराजम् महाराज था. जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने उन्हें गुजरात से जयपुर बुलवाया था और राजगुरु के रूप में सम्मान देते हुए यह हवेली भेंट की थी. यही कारण है कि यह हवेली केवल एक प्राचीन इमारत नहीं, बल्कि भट्ट ब्राह्मणों की विद्वता, राजगुरु परंपरा और धार्मिक प्रतिष्ठा का जीवंत प्रमाण मानी जाती है.
उन्होंने बताया कि राजगुरु सदाशिव पट्टराजम् महाराज अपने उत्कृष्ट ज्ञान, धार्मिक आचरण और गुरु स्वरूप व्यक्तित्व के कारण काफी सम्मानित थे. इसी वजह से उन्हें न केवल राजगुरु की पदवी मिली, बल्कि सम्मानस्वरूप ‘राजा’ की उपाधि भी दी गई. तभी से वे भट्ट राजा के नाम से प्रसिद्ध हुए. आज भी हवेली में उनके वंशज निवास करते हैं. हवेली के अंदर भगवान श्रीगोपाल जी का मंदिर भी स्थित है, जो उस समय की वैष्णव भक्ति परंपरा और गहरी धार्मिक आस्था को दर्शाता है.
तीन चौक वाली अनोखी हवेलीविष्णु कुमार भार्गव बताते हैं कि भट्ट राजा की हवेली जयपुर की अन्य हवेलियों से काफी अलग है. इसे खास तौर पर तीन चौक की वास्तुकला शैली में बनाया गया था. हवेली का मुख्य दरवाजा और बाहरी हिस्सा किसी छोटे किले जैसा दिखाई देता है, जो पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचता है.
हवेली के अंदर एक भव्य चौक बना हुआ है, जिसके चारों तरफ अलग-अलग कमरे तैयार किए गए हैं. इन कमरों में सुंदर जालियां, झरोखे और पारंपरिक नक्काशी देखने को मिलती है, जिनमें जयपुर की स्थापत्य कला की साफ झलक दिखाई देती है. हालांकि समय के साथ हवेली के कुछ हिस्सों में हल्की टूट-फूट नजर आने लगी है, लेकिन करीब 175 साल बाद भी यह हवेली मजबूती के साथ खड़ी है और जयपुर की शाही विरासत की कहानी बयां कर रही है.
About the AuthorAnand Pandey
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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