रेगिस्तान में प्रकृति का चमत्कार! नागौर के वेटलैंड्स बने हजारों पक्षियों का नया आशियाना, देखकर रह जाएंगे हैरान

Last Updated:July 06, 2026, 14:41 IST
Nagaur Hindi News: नागौर जिला जिसकी पहचान कभी केवल रेत और शुष्क भूभाग से होती थी, आज अपने वेटलैंड्स के कारण प्रकृति प्रेमियों और पक्षी प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बन रहा है. इन आर्द्रभूमियों में स्थानीय ही नहीं, बल्कि प्रवासी पक्षियों की भी बड़ी संख्या देखने को मिल रही है. जलभराव और अनुकूल वातावरण ने इन वेटलैंड्स को पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय बना दिया है. यहां सुबह और शाम का प्राकृतिक नजारा पर्यटकों, फोटोग्राफरों और बर्ड वॉचर्स को खासा आकर्षित कर रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि वेटलैंड्स का संरक्षण जैव विविधता बनाए रखने के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है. नागौर के ये प्राकृतिक स्थल अब इको-टूरिज्म की नई पहचान बनते जा रहे हैं.
राजस्थान को अक्सर रेगिस्तान और सूखे प्रदेश के रूप में देखा जाता है, लेकिन यही धरती अब लाखों प्रवासी जलपक्षियों की सबसे सुरक्षित शरणस्थली भी बन रही है. राज्य के 117 आर्द्र क्षेत्रों (वेटलैंड्स) में इस वर्ष 3.11 लाख से अधिक जलपक्षियों की मौजूदगी दर्ज हुई है. यहां की झीलें और जलाशय वैश्विक जैव विविधता के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. यह आंकड़ा संरक्षण प्रयासों की सफलता का भी संकेत है.
राजस्थान के वेटलैंड्स दुनिया के प्रमुख प्रवासी पक्षी मार्ग सेंट्रल एशियन फ्लाईवे का अहम हिस्सा हैं. मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप से हजारों किलोमीटर की कठिन उड़ान भरकर पक्षी हर सर्दी में यहां पहुंचते हैं. भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, सांभर झील, डीडवाना, पचपदरा, जवाई बांध, मानसागर और उदयपुर की झीलें इन मेहमान पक्षियों के लिए सुरक्षित पड़ाव साबित हो रही हैं.
इस बार की गणना में सबसे बड़ा आकर्षण लेसर फ्लेमिंगो रहे, जिनकी संख्या करीब 1.47 लाख दर्ज की गई. इसके अलावा ग्रेटर फ्लेमिंगो, कॉमन कूट, कैटल एग्रेट, ग्रेट कॉर्मोरेंट, नॉर्दर्न शोवेलर, लिटिल कॉर्मोरेंट, ब्लैक-विंग्ड स्टिल्ट, कॉमन टील और पाइड एवोसेट जैसी प्रमुख प्रजातियां भी बड़ी संख्या में दिखाई दी. कुल 112 प्रजातियों की उपस्थिति ने राजस्थान के वेटलैंड्स की समृद्ध जैव विविधता को और मजबूत किया है.
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यह पक्षी गणना केवल संख्या जुटाने का अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति के स्वास्थ्य का वैज्ञानिक आकलन भी है. एशियन वॉटरबर्ड सेंसस के तहत वन विभाग, वैज्ञानिक संस्थान, पक्षी विशेषज्ञ और बड़ी संख्या में स्वयंसेवक मिलकर जलपक्षियों की गणना करते हैं. इसे एशिया का सबसे बड़ा सिटीजन साइंस कार्यक्रम माना जाता है, जिसमें आम लोगों की भागीदारी भी संरक्षण को नई ताकत देती है.
इस सर्वे से मिलने वाले आंकड़े भविष्य की संरक्षण योजनाओं की दिशा तय करते हैं. इन्हीं के आधार पर रामसर साइट के चयन, वेटलैंड संरक्षण, जल प्रबंधन और जैव विविधता से जुड़ी नीतियां तैयार की जाती हैं. साथ ही प्रदूषण, जल संकट, अतिक्रमण और अवैध खनन जैसे खतरों की पहचान कर समय रहते आवश्यक कदम उठाने में भी यह सर्वे बेहद उपयोगी साबित हो रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वेटलैंड्स सुरक्षित रहेंगे तो प्रवासी पक्षियों की संख्या आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है. बदलती जलवायु, घटते जल स्रोत और मानव गतिविधियों का असर पक्षियों के प्रवास पर भी पड़ता है. ऐसे में राजस्थान के आर्द्र क्षेत्रों का संरक्षण केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि वैश्विक पारिस्थितिकी संतुलन के लिए भी आवश्यक माना जा रहा है.
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