सिरोही की चाय थड़ी पर खुला वोटर का मूड, बोले- चाय नहीं काम चाहिए; BJP-कांग्रेस के बीच निर्दलीयों की बढ़ी टेंशन

सिरोही: चुनावी सरगर्मी जब अपने चरम पर होती है, तो बड़े-बड़े सम्मेलनों और रैलियों से ज्यादा फैसले उन छोटी जगहों पर होते हैं जहाँ आम जनता सुकून के दो पल बिताती है. राजस्थान के सिरोही जिले में इन दिनों चुनावी बयार कुछ ऐसी ही है. न्यूज18 की विशेष चुनावी श्रृंखला ‘चाय पर चर्चा’ के तहत जब हमारी टीम शहर के एक स्थानीय चौराहे की नुक्कड़ वाली चाय की थड़ी पर पहुँची, तो वहाँ का माहौल देखकर साफ अंदाजा हो गया कि इस बार का चुनाव केवल पार्टियों के बीच का मुकाबला नहीं, बल्कि आम जनमानस के भीतर सुलगते सवालों की एक लंबी फेहरिस्त है. यहाँ कुल्हड़ में गर्म चाय की चुस्कियों के साथ सिरोही की सियासत की ठंडी और गहरी गणित पर खुलकर चर्चा हो रही थी.
चर्चा की शुरुआत करते हुए थड़ी चलाने वाले स्थानीय चाय विक्रेता ने बड़े ही सधे और तंजभरे अंदाज में राजनीतिक दलों पर निशाना साधा. उन्होंने कुल्हड़ में चाय डालते हुए कहा, “साहब, हमारे यहाँ चाय तो आज भी 10 रुपए की ही मिलती है, लेकिन चुनावी मौसम में नेताजी जो वादे करके जाते हैं, उनकी कीमत लाखों-करोड़ों की होती है. चुनाव के बाद न वो वादे दिखते हैं और न ही वे नेता.” उनकी इस बात पर थड़ी पर मौजूद सभी लोगों ने सहमति जताई. यह एक लाइन पूरे सिरोही के उस दर्द को बयां कर रही थी, जहाँ जनता विकास के दावों और हकीकत के बीच का अंतर पिछले कई चुनावों से महसूस करती आ रही है.
युवाओं की दो टूक: ‘फ्री का ज्ञान नहीं, रोजगार और विकास चाहिए’चर्चा जब आगे बढ़ी तो युवाओं ने अपनी बेबाक राय रखी. पढ़ाई पूरी कर चुके एक युवा ने सख्त लहजे में कहा कि अब युवाओं को मुफ्त की रेवड़ियों या खोखले आश्वासनों की जरूरत नहीं है. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, “हमें न तो फ्री की चाय चाहिए और न ही नेताओं का मुफ्त का ज्ञान चाहिए. हमें सिर्फ और सिर्फ रोजगार और बुनियादी सुविधाएं चाहिए. हमारे मोहल्लों में आज भी नाली और सड़क का झंझट खत्म नहीं हुआ है. जलभराव और टूटी सड़कें हमारी रोज की मुसीबत बन चुकी हैं, जिनका समाधान कोई नहीं करना चाहता.” युवाओं का यह गुस्सा इस बात का संकेत दे रहा है कि इस बार नई पीढ़ी मुद्दों पर मतदान करने के पूरे मूड में है.
बुजुर्गों का तजुर्बा: ‘जो थड़ी पर बैठेगा, वही सत्ता की कुर्सी पर बैठेगा’थड़ी के एक कोने में बैठे उम्रदराज बुजुर्ग ने अपनी चाय की चुस्की ली और बड़े ही तजुर्बे के साथ भविष्यवाणी करते हुए कहा, “बेटा, सियासत की चाल को समझना है तो इन एसी कमरों से बाहर निकलो. जो नेता इस थड़ी पर बैठकर आम आदमी के साथ चाय पी ले, जनता का असली मूड वही समझ पाता है. इस बार जनता वादों के जाल में फंसने वाली नहीं है. जो नेता जमीन से जुड़ा होगा और जनता के सुख-दुख में साझीदार बनेगा, सिरोही की गद्दी उसी के हाथ जाएगी. जो लोग सिर्फ वातानुकूलित कमरों में बैठकर रणनीति बनाते हैं, उन्हें इस बार जनता सबक सिखाते हुए सत्ता से बाहर बैठा देगी.”
दिग्गजों के बीच निर्दलियों की उबाल और ऊंट का रुखसिरोही की इस सियासी जमीन पर इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प हो चला है. पारंपरिक रूप से बीजेपी और कांग्रेस के बीच होने वाली टक्कर में इस बार निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी पानी में उबाल ला दिया है. दोनों प्रमुख दलों के बागी और स्थानीय समीकरणों को बिगाड़ने वाले निर्दलीय प्रत्याशी चाय की पत्ती की तरह इस चुनाव में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए राजनीतिक माहौल को गर्मा रहे हैं. यहाँ किसी एक पार्टी की एकतरफा लहर नहीं है, बल्कि हर चेहरे और उसकी साख पर कड़ी जंग छिड़ी हुई है.
जनता ने किसके सिर पर ताज सजाने का मन बनायाअब देखना यह दिलचस्प होगा कि सिरोही का यह चुनावी ऊंट किस करवट बैठता है. फिलहाल, कयासों का बाजार गर्म है और अंतिम फैसला तो मतदान के दिन कुल्हड़ वाली इस चाय की आखिरी चुस्की के साथ ही साफ हो पाएगा कि सिरोही की जनता ने किसके सिर पर ताज सजाने का मन बनाया है.



