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एविएशन में ‘ब्लैक डे’ की तरह है 30 जून, 6 प्‍लेन हादसों से कांप उठा था आसमान, बदल गए थे सारे नियम!

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एविएशन में ‘ब्लैक डे’ की तरह है 30 जून, 6 प्‍लेन हादसों से कांप उठा था आसमान

Last Updated:June 30, 2026, 19:54 IST

30 June Plane Crash: 30 जून एविएशन हिस्ट्री की ऐसी तारीख है, जिसने दुनिया को कई दर्दनाक प्लेन क्रैश और बड़े सबक दिए. 1951 से 2009 के बीच इसी दिन हुए छह बड़े हादसों में सैकड़ों लोगों की जान गई. कहीं पायलट एरर, कहीं टेक्निकल फेल्योर, कहीं खराब वेदर तो कहीं मिलिट्री और सिविल एविएशन के बीच कोऑर्डिनेशन की कमी हादसों की वजह बनी. इन घटनाओं के बाद नेविगेशन सिस्टम, एयर ट्रैफिक कंट्रोल, एफएए, वेदर ट्रेनिंग, फटीग मैनेजमेंट और फ्लाइट सेफ्टी रूल्स में बड़े बदलाव किए गए. आइए विस्‍तार से जानते हैं इन एयरक्रैश के बारे में और ऐसी बातें जिसने एविएशन को पूरी तरह से बदल दिया.

एविएशन वर्ल्‍ड में 30 जून को हादसों और सबक की तारीख के तौर पर पहचाना जाता है. 1951 से 2009 के बीच इसी तारीख में छह बड़े प्लेन क्रैश हुए. इन क्रैश में सैकड़ो पैसेंजर्स और प्‍लेन में तैनात क्रू मेंबर्स की जान चली गई. इन हादसों के पीछे वजह कहीं पायलट की गलती, कहीं टेक्निकल प्रॉब्लम, तो कहीं मिलिट्री और सिविल एविएशन के बीच कोऑर्डिनेशन की कमी थी. हर एक्सीडेंट के बाद एयर ट्रैवल को सेफ बनाने के लिए कई नए सेफ्टी रूल्स बनाए गए थे.

30 जून 1951 को यूनाइटेड एयर लाइंस की फ्लाइट 610 अमेरिका के कोलोराडो राज्य में लारिमर काउंटी की पहाड़ियों से टकराकर क्रैश हो गई. जांच में सामने आया कि पायलट ने नेविगेशन के दौरान गलत रूट पकड़ लिया था. प्लेन में मौजूद सभी 50 लोगों की मौत हो गई थी. इस क्रैश ने पूरे एविएशन सेक्टर को झकझोर दिया था.

इस हादसे की जांच में प्‍लेन के रेडियो नेविगेशन सिस्टम की खामियों के बारे में पता चला था. नेविगेशन सिस्टम की खामियों के चलते पहाड़ी इलाके में पायलट सही लोकेशन और ऊंचाई का सटीक अंदाजा नहीं लगा पाए. इसके बाद एविएशन इंडस्ट्री ने नेविगेशन ट्रेनिंग को बेहतर बनाया और ग्राउंड-बेस्ड नेविगेशन सिस्टम को अपग्रेड करने पर काम शुरू कर दिया. इस बदलाव ने आगे चलकर कई संभावित हादसों को रोकने में अहम भूमिका निभाई.

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30 जून 1956 को अमेरिका के ग्रैंड कैन्यन के ऊपर दो पैसेंजर प्लेन हवा में ही आपस में टकरा गए. यूनाइटेड एयरलाइंस फ्लाइट 718 और ट्रांस वर्ल्‍ड एयरवेज की फ्लाइट 2 दोनों विजुअल फ्लाइट रूल्स के तहत उड़ रही थीं. खराब मौसम और एक-दूसरे को समय पर नहीं देख पाने की वजह से दोनों प्‍लेन आपस में भिड़ गए थे. इस दर्दनाक हादसे में कुल 128 लोगों की जान चली गई थी.

इस हादसे के बाद अमेरिका ने अपने एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम में बड़े बदलाव किए थे. 1958 में फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफएए बनाया गया. इसके साथ ही रडार मॉनिटरिंग, एयर ट्रैफिक कंट्रोल और बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम को अनिवार्य बनाया गया. इस घटना से यह बात भी सामने आ गई थी कि केवल विजुअल फ्लाइंग पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है और टेक्नोलॉजी की मदद बेहद जरूरी है.

30 जून 1962 को सोवियत संघ की एअरोफ्लोट फ्लाइट 902 अचानक एक मिसाइल का निशाना बन गई. टुपोलेव TU-104 प्‍लेन में सवार सभी 84 लोगों की मौत हो गई. यह उस समय रूस की सबसे बड़ी एविएशन ट्रैजेडी थी.

जांच में माना गया कि प्‍लेन को गलती से दुश्मन का एयरक्राफ्ट समझ लिया गया था. इस हादसे के बाद मिलिट्री और सिविल एविएशन के बीच बेहतर कोऑर्डिनेशन पर काम शुरू किया गया. नागरिक विमानों के लिए अलग एयर कॉरिडोर तय किए गए और मिलिट्री एक्सरसाइज एरिया की स्पष्ट सीमाएं बनाई गईं.

30 जून 1967 को थाई एयरवेज की फ्लाइट 601 खराब मौसम के बीच हांगकांग के काई ताक एयरपोर्ट पर लैंडिंग की कोशिश कर रही थी. तेज हवा, भारी बारिश और मुश्किल हालात के बीच पायलट ने प्लेन को सुरक्षित उतारने की कोशिश की, लेकिन प्‍लेन समुद्र में गिर गया. प्लेन में सवार 80 लोगों में से 24 की मौत हो गई, जबकि बाकी यात्रियों को रेस्क्यू टीम ने बचा लिया.

इस एक्सीडेंट की जांच में पता चला कि पायलट ने मौसम की गंभीर स्थिति का सही आकलन नहीं किया और समय रहते गो-अराउंड करने का फैसला नहीं लिया. इसके बाद एयरलाइंस ने खराब मौसम में लैंडिंग से जुड़े ट्रेनिंग प्रोग्राम को बेहतर बनाया गया.

30 जून 1994 को एयरबस इंडस्ट्री की टेस्ट फ्लाइट 129 टेकऑफ के कुछ ही मिनट बाद क्रैश हो गई. यह एयरबस A330-321 की पहली घातक दुर्घटना थी. प्‍लेन में मौजूद सभी सात क्रू मेंबर्स की मौत हो गई. चूंकि यह एक टेस्ट फ्लाइट थी, इसलिए इस हादसे ने एयरबस के नए एयरक्राफ्ट मॉडल और उसकी टेस्टिंग प्रोसेस पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए थे.

जांच में सामने आया कि पायलट ने थकान की स्थिति में प्‍लेन को जरूरत से ज्यादा ऊंचे एंगल पर और कम स्पीड में चढ़ाने की कोशिश की. इससे प्‍लेन स्टॉल हो गया और हादसा हो गया. इस घटना के बाद पायलट फटीग मैनेजमेंट पर सख्त नियम बनाए गए. एयरबस ने भी अपने ट्रेनिंग मैनुअल में फटीग अवेयरनेस और फ्लाइट डिसीजन मेकिंग से जुड़े नए मॉड्यूल शामिल किए गए.

30 जून 2009 को यमेनिया एयरलाइंस की फ्लाइट 626 कोमोरोस में लैंडिंग के दौरान हिंद महासागर में गिर गई. एयरबस A310 में कुल 153 लोग सवार थे. इस दर्दनाक हादसे में सिर्फ 12 साल की एक बच्ची जिंदा बच सकी, जो कई घंटों तक समुद्र में मलबे के सहारे तैरती रही. उसकी जीवित बचने की कहानी आज भी एविएशन हिस्ट्री की सबसे चमत्कारी घटनाओं में गिनी जाती है.

जांच में पता चला कि तेज हवा और खराब मौसम के बावजूद पायलट ने सही लैंडिंग प्रोसीजर का पालन नहीं किया. इससे प्‍लेन का कंट्रोल बिगड़ गया और वह समुद्र में गिर गया. इस हादसे के बाद यमेनिया एयरलाइंस ने अपने पायलटों की दोबारा ट्रेनिंग शुरू की. साथ ही इंटरनेशनल एविएशन रेगुलेटर्स ने हिंद महासागर क्षेत्र में फ्लाइट ऑपरेशन और सेफ्टी ऑडिट को सख्त किया गया.

30 जून को हुई इन छह बड़ी प्लेन क्रैश के बाद एविएशन इंडस्‍ट्री में बड़े बदलाव देखे गए. हर हादसे के बाद नए रूल्स बने, नई टेक्नोलॉजी आई और पायलट ट्रेनिंग को पहले से बेहतर बनाया गया. चाहे एफएए की स्थापना हो, फटीग मैनेजमेंट हो, वेदर ट्रेनिंग हो या मिलिट्री-सिविल कोऑर्डिनेशन हो.

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