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Bharatpur News | भरतपुर की चीते वाली गली, राजघराने के शाही शिकार की अनोखी कहानी

Last Updated:June 23, 2026, 15:30 IST

Bharatpur Cheetewali Gali : भरतपुर की चीते वाली गली में कभी राजघराने के लिए पाले गए चीते और शेर रहते थे, सुल्तान खान का परिवार इन्हें पालकर महाराजा किशन सिंह के साथ शिकार पर जाता था. परिवार के सदस्य सुल्तान खान ने बताया कि उनके बाबा और पिता विशेष तौर पर भरतपुर राजपरिवार के लिए चीते पाला करते थे. उन्होंने कहा कि उनका परिवार जिस गली में रहता है, उसी वजह से इस जगह का नाम चीते वाली गली पड़ा.

भरतपुर. भरतपुर शहर की एक पुरानी गली आज भी अपने भीतर राजघराने के दौर की ऐसी कहानी समेटे हुए है, जिसे सुनकर लोग हैरान रह जाते हैं. इस गली का नाम आज भी सरकारी रिकॉर्ड में चीते वाली गली दर्ज है. कभी यहां आम गलियों जैसा सन्नाटा नहीं होता था, बल्कि शाही शिकार के लिए पाले गए चीते और शेरों की दहाड़ सुनाई देती थी. इस गली में रहने वाला एक परिवार भरतपुर राजघराने के लिए चीते और शेर पालने का काम करता था और शिकार अभियानों में भी उनकी खास भूमिका रहती थी.

समय बदला, राजघरानों का दौर खत्म हुआ और जंगली जानवर पालने की परंपरा भी इतिहास बन गई. लेकिन इस परिवार की यादें और गली का नाम आज भी उस बीते दौर की कहानी सुनाते हैं. आसपास रहने वाले लोग भी इस गली को चीते वाली गली के नाम से ही जानते हैं. परिवार के सदस्य बताते हैं कि कभी उनके घर के बाहर बंधे चीते और शेर लोगों के आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे.

दादा और पिता पालते थे चीतेपरिवार के सदस्य सुल्तान खान ने बताया कि उनके बाबा और पिता विशेष तौर पर भरतपुर राजपरिवार के लिए चीते पाला करते थे. उन्होंने कहा कि उनका परिवार जिस गली में रहता है, उसी वजह से इस जगह का नाम चीते वाली गली पड़ा. उन्होंने बताया कि उन्होंने खुद अपनी आंखों से घर और गली में चीते और शेर पलते हुए देखे हैं. सुल्तान खान ने बताया कि उनके दादाजी और पिताजी राजपरिवार के दरवाजे के बाहर चीतों और शेरों को रस्सी से बांधकर रखते थे. वे खुद भी बचपन में चीतों को रबड़ी खिलाया करते थे. उनका कहना है कि इन जानवरों को इस तरह प्रशिक्षित किया जाता था कि वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते थे.

महाराजा के साथ शिकार पर जाते थे परिवार के लोगसुल्तान खान के अनुसार भरतपुर के महाराजा किशन सिंह उनके दादा को अपने साथ शिकार पर लेकर जाया करते थे. जंगल से लाए जाने के समय चीते काफी उग्र स्वभाव के होते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें सिखाया जाता था. समय के साथ वे इंसानों के बीच रहने के आदी हो जाते थे. उन्होंने बताया कि उनके दादा और पिता कई बार राजपरिवार के साथ बाजारों में भी चीतों को लेकर जाते थे. यह परिवार सिर्फ जानवरों की देखभाल ही नहीं करता था, बल्कि राजघराने के शाही शिकार अभियानों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था. यही वजह है कि आज भी भरतपुर की यह गली एक अनोखी पहचान बनाए हुए है और बीते समय की यादों को अपने नाम में संजोए खड़ी है.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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