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कम लागत में ज्यादा उत्पादन का फॉर्मूला! नागौर के किसान ऐसे कर रहे कपास की स्मार्ट खेती और दोगुनी कर रहे कमाई

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नहीं होगा घाटा! जानिए नागौर में कैसे की जा रही स्मार्ट कपास खेती

Last Updated:April 18, 2026, 18:06 IST

Nagaur Agriculture News: नागौर जिले में कपास की उन्नत खेती किसानों के लिए मुनाफे का बड़ा जरिया बन रही है. वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर किसान कम लागत में अधिक उत्पादन हासिल कर रहे हैं. ड्रिप इरिगेशन, उन्नत बीज, संतुलित खाद और कीट नियंत्रण तकनीकों का सही उपयोग करने से फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बढ़ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि सही समय पर बुवाई और नियमित निगरानी से नुकसान कम होता है. इससे किसानों की आय दोगुनी करने में मदद मिल रही है. नई तकनीकों को अपनाकर किसान आधुनिक खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं.

राजस्थान के नागौर जिले में कपास की खेती बहुतायत मात्रा में होती है. किसान अगर उन्नत तरीके से ये खेती करते हैं तो उन्हें अधिक मुनाफा मिलता है. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट रमेश चौधरी ने बताया कि अभी बदलते मौसम के कारण और रोगों के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए वैज्ञानिक पद्धति से खेती करना जरूरी है. यदि किसान सही किस्मों का चयन करें और बुवाई से पहले जरूरी सावधानियां बरतें, तो उत्पादन में वृद्धि होती है. इसके अलावा लागत भी कम होती है.

उन्होंने बताया कि किसान अगर कपास की उन्नत करना चाहते हैं तो वे प्रमाणित किस्मों को अपने खेत में लगाए. किसान आरजी-8, आरजी-18, एच.डी. 123, आरजी-542, एफ.डी.के. 124, राज और डी.एच. 1 जैसे कुछ प्रमाणित किस्मों का उपयोग कर सकते हैं. ये किस्में न केवल अधिक उत्पादन देती हैं, बल्कि स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुसार बेहतर अनुकूलन क्षमता भी रखती हैं. इन किस्मों को अपनाने से किसानों को गुणवत्ता वाली फसल मिलने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे बाजार में अच्छे दाम भी मिल सकते हैं.

बुवाई के समय बीज की सही मात्रा का उपयोग करना भी बहुत जरूरी होता है. किसान प्रति बीघा लगभग 3 किलोग्राम बीज का उपयोग करें, जिससे खेत में पौधों की उचित संख्या बनी रहे और पौधों के बीच संतुलित दूरी बनी रहे. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट के मुताबिक इससे पौधों को पर्याप्त पोषण और स्थान मिलता है और उनकी वृद्धि बेहतर होती है. वहीं, उत्पादन में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

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नागौर के कुछ क्षेत्रों में कपास की खेती में जड़ गलन रोग की समस्या अधिक देखने को मिलती है, जिससे फसल को काफी नुकसान हो सकता है. इस समस्या से बचाव के लिए किसानों को 2.5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा हरजेनियम को 50 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर खेत में डाल सकते हैं. यह जैविक उपाय मिट्टी में रोगजनक तत्वों को नियंत्रित करने में मदद करता है और पौधों की जड़ों को मजबूत बनाता है.

इसके अलावा बीज उपचार को भी कपास की सफल खेती के लिए बहुत फायदेमंद होता है. किसान बुवाई से पहले बीज को ट्राइकोडर्मा हरजेनियम या स्यूडोमोनास फ्लुओरेसेन्स से 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. इससे बीजजनित और मृदाजनित रोगों का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है, जिससे पौधों की शुरुआती वृद्धि स्वस्थ रहती है और फसल मजबूत बनती है.

कृषि विभाग ने नागौर के किसानों से अपील की है कि वे पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाएं और समय-समय पर विशेषज्ञों की सलाह लेते रहें. इन उपायों को अपनाने से न केवल फसल की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होगी और वे खेती को अधिक लाभकारी बना सकेंगे.

First Published :

April 18, 2026, 18:06 IST

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