कोटा के इस पैलेस में आज भी जिंदा है इतिहास, प्राचीन हथियारों से शाही ठाठ तक हर चीज करती है आकर्षित

कोटा. चंबल नदी के शांत किनारों पर खड़ा ‘गढ़ पैलेस’ (सिटी पैलेस) महज ईंट-पत्थरों की कोई निर्जीव इमारत नहीं है, बल्कि यह हाड़ौती के शौर्य, बलिदान और कला का एक जीवंत दस्तावेज है. यहां की हवाओं में आज भी राजा-महाराजाओं की शानो-शौकत घुली हुई है, जिसे महसूस करने के लिए सात समंदर पार से विदेशी पर्यटक और देश के कोने-कोने से सैलानी खिंचे चले आते हैं.
इस भव्य गढ़ की कहानी 17वीं शताब्दी में शुरू हुई थी, जिसकी स्थापना भीम सिंह जी द्वितीय द्वारा की गई थी. समय के थपेड़ों के बीच इस विरासत को सहेजने का बीड़ा राव माधव राज ट्रस्ट ने उठाया, जिसकी स्थापना 1970-71 में हुई थी. वर्तमान में ट्रस्ट के अध्यक्ष विजयराज सिंह के कुशल मार्गदर्शन में यह किला अपने पुराने वैभव को आधुनिकता के साथ सहेजकर नई पीढ़ी के सामने पेश कर रहा है.
ऐतिहासिक धरोहर को संजोना एक बड़ी जिम्मेदारी
राव माधोसिंह म्यूजियम ट्रस्ट के क्यूरेटर आशुतोष दाधीच बताते हैं कि इस ऐतिहासिक धरोहर को संजोना एक बड़ी जिम्मेदारी है. उनके अनुसार, हमारा प्रयास है कि कोटा की इस पुरानी धरोहर को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखा जाए. यहां समय-समय पर साफ-सफाई और बारीक कलमकारी व चित्रकारी का संरक्षण कार्य किया जाता है, ताकि नई पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास को देख सके. यह मात्र एक संग्रहालय नहीं, बल्कि संस्कृति की पाठशाला है.
शस्त्रागार में कैद है पराक्रम की गूंज
जब आप गढ़ पैलेस की ‘शस्त्र गैलरी’ में कदम रखते हैं, तो इतिहास जीवंत हो उठता है. यहां 18वीं शताब्दी की वे बंदूकें मौजूद हैं, जो महाराव उम्मेद सिंह प्रथम के समय ‘गनफाउंड्री’ में बनाई गई थीं. प्रथम विश्व युद्ध की याद दिलाती वे बंदूकें भी यहां का गौरव बढ़ा रही हैं, जिन्हें आर्मी हेड पृथ्वी सिंह अपने साथ लाए थे. लेकिन पर्यटकों के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र वह तलवार है, जिसे सम्राट पृथ्वीराज चौहान की वीरता का प्रतीक माना जाता है. यहाँ रखी गुप्ती, ढाल और कटारें बीते दौर के युद्धों की मूक गवाह हैं.
कला के संरक्षक थे कोटा के शासक
गढ़ पैलेस केवल युद्धों की नहीं, बल्कि कला और विलासिता की भी कहानी कहता है. कांच के फ्रेम में सजे राजाओं के मुकुट, राजसी वस्त्र, भारी-भरकम छत्र और वे झूले, जिन पर कभी राजपरिवार का बचपन बीतता था, आज भी वैसे ही सुरक्षित हैं. यहा वीणा, हारमोनियम और गिटार जैसे वाद्य यंत्रों का अनूठा संग्रह है, जो दर्शाता है कि कोटा के शासक कला के कितने बड़े संरक्षक थे.
विरासत से रूबरू हो रही नई पीढ़ी
यहां हाथी के दांत से बने बॉक्स और बारां के डॉक्टर मेट्जगर द्वारा भेंट किया गया था, वह खास हाथी भी है, जो कोटा राजवंश के प्रति जनमानस के जुड़ाव को दर्शाता है. साथ ही यहां प्राचीन जल-घड़ी (गोल यंत्र) और पुराने समय के वजन करने वाले ‘कांटे-बांट’ भी सुरक्षित हैं. गढ़ पैलेस की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह अपनी जड़ों से कट नहीं गया है. ट्रस्ट द्वारा स्कूली बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. बहुत ही मामूली शुल्क पर बच्चों को यह किला दिखाया जाता है, ताकि वे किताबी ज्ञान से बाहर निकलकर अपनी संस्कृति को देख और समझ सकें.
देसी-विदेशी सैलानियों का लगता है जमावड़ा
कोटा की यह पहचान विश्व विख्यात है. अक्टूबर से मार्च तक विदेशी मेहमान यहां की बारीक नक्काशी और कलमकारी को निहारने आते हैं, वहीं अप्रैल से गर्मियों की छुट्टियों में देसी पर्यटकों और बच्चों का यहां तांता लगा रहता है.



