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महंगी केमिकल खादों को मारा लात! भेड़-बकरी की ‘मींगणी’ से अलवर के किसान कैसे उगा रहे हैं देश की सबसे मशहूर लाल प्याज?

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प्याज की खेती में अलवर के किसानों का बड़ा कमाल! दूसरे राज्यों पर निर्भरता खत्म

Last Updated:May 17, 2026, 10:09 IST

Alwar Onion Seed Production Organic Farming: राजस्थान के अलवर और खैरथल-तिजारा जिले के किसान अब दूसरे राज्यों के महंगे बीजों पर निर्भर रहने के बजाय खुद प्याज के ‘कण’ से क्विंटलों में उत्तम क्वालिटी का बीज तैयार कर रहे हैं. 1 किलो कण से 5-6 क्विंटल बीज तैयार हो रहा है, जिसे सुखाकर जुलाई में बाजार में बेचा जाएगा. इसके साथ ही, खेती की लागत घटाने के लिए किसान रासायनिक खादों को छोड़कर गाय, भैंस और भेड़-बकरी के मल-मूत्र (मिगन) से बनी पारंपरिक जैविक खाद अपना रहे हैं, जिससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ रही है और किसानों का मुनाफा भी दोगुना हो रहा है.

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Alwar News: राजस्थान का अलवर और नवगठित खैरथल-तिजारा जिला अपनी खास लाल प्याज (Red Onion) के लिए पूरे देश में एक अलग पहचान रखता है. यहाँ की मिट्टी में उगने वाली तीखी और स्वादिष्ट लाल प्याज की मांग देशभर की मंडियों में सालभर बनी रहती है. लेकिन अब यहाँ के किसानों ने प्याज उगाने के पारंपरिक तौर-तरीकों को बदलते हुए एक नया ट्रेंड शुरू किया है. अपनी लागत को कम करने और मुनाफे को दोगुना करने के लिए यहाँ के प्रगतिशील किसान अब प्याज का ‘कण’ तैयार कर खुद ही क्विंटलों में उत्तम क्वालिटी का बीज तैयार कर रहे हैं. इसके साथ ही खेती की बढ़ती लागत से परेशान होकर अब किसान तेजी से ऑर्गेनिक फार्मिंग (Organic Farming) की तरफ रुख कर रहे हैं.

पहले अलवर के प्याज उत्पादक किसानों को बीज के लिए दूसरे राज्यों से आने वाले महंगे बीजों पर निर्भर रहना पड़ता था. इससे न सिर्फ खेती की लागत बढ़ती थी, बल्कि कई बार नकली बीज मिलने से पूरी फसल भी बर्बाद हो जाती थी. इस समस्या का समाधान ढूंढते हुए किसानों ने स्वयं बीज तैयार करना शुरू किया है. क्षेत्र के एक प्रगतिशील किसान ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने फरवरी के पहले हफ्ते में प्याज का कण खेतों में जमाया था. अब मई के महीने तक यह बीज पूरी तरह पककर तैयार हो चुका है, जिसे खेतों से निकाला जा रहा है.

बीज सुखाने और सुरक्षित रखने का तरीका

किसान ने बीज को सुरक्षित रखने का तरीका बताते हुए कहा कि खेत से बीज निकालने के बाद उसके छोटे-छोटे गुच्छे बनाकर दो से तीन दिन तक धूप में सुखाया जाता है ताकि उसकी पूरी नमी (Moisture) खत्म हो जाए. इसके बाद इस बीज को घर के ऐसे सुरक्षित और हवादार स्थान पर रखा जाता है जहाँ हवा का वेंटिलेशन अच्छा हो. जुलाई का महीना आते ही इस देसी और उच्च गुणवत्ता वाले बीज को मार्केट में बेचना शुरू कर दिया जाएगा. इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मात्र 1 किलोग्राम प्याज का कण खेत में जमाने से करीब 5 से 6 क्विंटल तक शुद्ध बीज आसानी से तैयार हो जाता है. इस बार खुद का बीज होने के कारण कई किसान अपने खेतों में प्याज का रकबा बढ़ा रहे हैं. हालांकि, पिछले साल प्याज के सही दाम न मिलने और कम बारिश की आशंका के चलते कुछ इलाकों में इस बार प्याज का कुल रकबा थोड़ा घट भी सकता है.

रासायनिक खादों को छोड़ भेड़-बकरी की ‘मिगन’ अपना रहे किसानमहंगे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल के कारण जब खेती घाटे का सौदा बनने लगी और खेतों की मिट्टी बंजर होने लगी, तो अलवर के किसानों ने इसका तोड़ अपने पारंपरिक ज्ञान में निकाला. जिले के किसानों ने रासायनिक खादों से पूरी तरह किनारा करना शुरू कर दिया है. अब वे खेतों में गाय और भैंस के गोबर के अलावा भेड़ और बकरियों के मल-मूत्र से तैयार होने वाली बेहद शक्तिशाली जैविक खाद (जिसे स्थानीय भाषा में ‘मिगन’ कहा जाता है) का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं. किसानों का मानना है कि यदि सभी किसान अब भी सचेत होकर ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत कर दें, तो आने वाले समय में फसलों की क्वालिटी बेहद शानदार होगी, जिससे बाजार में उनके उत्पाद के बहुत ऊंचे दाम मिलेंगे और किसानों की शुद्ध आय में बंपर इजाफा होगा.

कृषि अधिकारियों ने लगाई मुहर: मिट्टी के लिए अमृत है पशुओं का मल-मूत्रअलवर के कृषि विशेषज्ञों और अधिकारियों ने भी किसानों के इस ऑर्गेनिक ट्रेंड की सराहना की है. कृषि अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि बाजार में मिलने वाली महंगी रासायनिक खादों की तुलना में प्राकृतिक रूप से तैयार पशुओं के मल-मूत्र में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे आवश्यक पोषक तत्व कहीं अधिक मात्रा में पाए जाते हैं. यह जैविक खाद मिट्टी की उर्वरा शक्ति (Soil Fertility) को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती है, जिससे फसल का उत्पादन न सिर्फ बढ़ता है बल्कि वह पूरी तरह केमिकल-फ्री और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है. सबसे बड़ी बात यह है कि रासायनिक खाद का भारी-भरकम खर्च बचने से किसानों की जेब पर पड़ने वाला बोझ कम होता है और उनकी शुद्ध बचत बढ़ जाती है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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