Indian army| Success Story: 11 साल की उम्र में खोया पिता, AIR-1 हासिल की, फिर दुनिया के सबसे ऊंचे सियाचीन में रचा इतिहास

Success Story, Indian army: भारतीय सेना में महिलाओं की बढ़ती भूमिका की जब भी बात होगी कैप्टन शिवा चौहान का नाम सबसे पहले लिया जाएगा.राजस्थान के उदयपुर की रहने वाली कैप्टन शिवा चौहान ने जनवरी 2023 में इतिहास रच दिया जब उन्हें दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर के पोस्ट पर ऑपरेशनल ड्यूटी के लिए तैनात किया गया. यह उपलब्धि हासिल करने वाली वह भारतीय सेना की पहली महिला अधिकारी बनीं. उनकी यह सफलता सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं बल्कि उन लाखों युवतियों के लिए प्रेरणा है जो वर्दी पहनकर देश की सेवा करने का सपना देखती हैं.
11 साल की उम्र में छूट गया पिता का साथ
कैप्टन शिवा चौहान राजस्थान के उदयपुर की रहने वाली हैं. उनका बचपन आसान नहीं रहा. जब वह केवल 11 साल की थीं तभी उनके पिता का निधन हो गया. इसके बाद उनकी मां ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाली.उनकी बड़ी बहन ने भी हमेशा उनका हौसला बढ़ाया और आत्मविश्वास विकसित करने में अहम भूमिका निभाई.बचपन से ही शिवा का सपना भारतीय सेना में अधिकारी बनने का था. परिवार ने हर मुश्किल के बावजूद उनके इस सपने का पूरा साथ दिया.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद चुना सेना का रास्ता
शिवा चौहान ने अपनी शुरुआती पढ़ाई उदयपुर में पूरी की. इसके बाद उन्होंने टेक्नो एनजेआर इंजीनियरिंग कॉलेज (एनजेआर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) उदयपुर से वर्ष 2020 में सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की.इंजीनियरिंग की पढ़ाई ने आगे चलकर उन्हें भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में अपनी जिम्मेदारियां निभाने में काफी मदद की. यह सेना की सबसे तकनीकी शाखाओं में से एक मानी जाती है जो पुल निर्माण, सैन्य ढांचा तैयार करने, माइंस हटाने और दुर्गम इलाकों में सैनिकों को तकनीकी सहायता देने का काम करती है.
पहले ही प्रयास में SSB पास, हासिल की ऑल इंडिया रैंक-1
शिवा चौहान ने शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC-Tech) एंट्री के जरिए सेना में जाने की तैयारी शुरू की. उन्होंने मार्च 2020 में 19 SSB इलाहाबाद से इंटरव्यू पास किया और पूरे देश में ऑल इंडिया रैंक-1 हासिल की.यह उपलब्धि बताती है कि उनके अंदर आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और सेना के लिए जरूरी सभी गुण मौजूद थे.
OTA चेन्नई से बनीं सेना की अधिकारी
SSB में सफलता के बाद शिवा चौहान ने चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA)में प्रशिक्षण लिया. यहां उन्होंने कठिन सैन्य प्रशिक्षण, फिजिकल फिटनेस, नेतृत्व और अनुशासन की परीक्षा सफलतापूर्वक पूरी की.मई 2021 में उन्हें भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन मिला.इसके बाद उनकी पोस्टिंग उत्तरी भारत के सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में काम करने वाली फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स में हुई.
कठिन पहाड़ी इलाकों में सेवा
सेना में शुरुआती पोस्टिंग के दौरान शिवा चौहान ने लद्दाख और ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में काम किया. यहां उन्होंने बेहद कठिन मौसम और सीमावर्ती परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं.इसी दौरान उनके नेतृत्व और कार्यशैली ने वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान खींचा और उन्हें आगे बड़ी जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया गया.
508 किलोमीटर की साइकिल यात्रा
जुलाई 2022 में कारगिल विजय दिवस के मौके पर शिवा चौहान ने सुरा सोई साइक्लिंग एक्सपेडिशन का नेतृत्व किया.यह अभियान सियाचिन वॉर मेमोरियल से कारगिल वॉर मेमोरियल तक आयोजित किया गया.करीब 508 किलोमीटर लंबी इस यात्रा को 11 दिनों में पूरा किया गया.पूरी यात्रा 9 हजार से 12 हजार फीट की ऊंचाई वाले बेहद कठिन पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरी.इस अभियान ने साबित कर दिया कि शिवा चौहान शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद मजबूत अधिकारी हैं.
सियाचिन जाने से पहले मिली विशेष ट्रेनिंग
इस शानदार प्रदर्शन के बाद शिवा चौहान का चयन सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशनल तैनाती के लिए किया गया लेकिन सियाचिन भेजने से पहले उन्हें सियाचिन बैटल स्कूल में विशेष प्रशिक्षण दिया गया. यहां उन्होंने पुरुष अधिकारियों और जवानों के साथ समान स्तर पर ट्रेनिंग ली.इस दौरान उन्हें बर्फीली दीवारों पर चढ़ना, ग्लेशियर में चलना, हिमस्खलन से बचाव, क्रेवास रेस्क्यू, अत्यधिक ऊंचाई पर जीवित रहने की तकनीक और बेहद कम ऑक्सीजन में काम करने का प्रशिक्षण दिया गया.
जनवरी 2023 में रचा इतिहास
करीब 2 जनवरी 2023 को कैप्टन शिवा चौहान को सियाचिन ग्लेशियर के कुमार पोस्ट पर तीन महीने के ऑपरेशनल कार्यकाल के लिए तैनात किया गया.करीब 15,632 फीट की ऊंचाई पर स्थित कुमार पोस्ट दुनिया के सबसे कठिन सैन्य ठिकानों में गिना जाता है. यहां तापमान कई बार माइनस 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. तेज बर्फीली हवाएं, ऑक्सीजन की कमी, हिमस्खलन और गहरी बर्फ यहां रोजमर्रा की चुनौती होती है.इसी पोस्ट पर ऑपरेशनल ड्यूटी करने वाली शिवा चौहान भारतीय सेना की पहली महिला अधिकारी बनीं.
सियाचिन में क्या थीं उनकी जिम्मेदारियां?
कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स की अधिकारी होने के नाते शिवा चौहान ने वहां इंजीनियरिंग टीम का नेतृत्व किया.उनकी जिम्मेदारियों में हेलिपैड, सैन्य ढांचे और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण व रखरखाव शामिल था.इसके अलावा उन्होंने अपने अधीन तैनात सैनिकों का नेतृत्व किया और उनकी सुरक्षा, मनोबल तथा ऑपरेशनल तैयारियों की भी जिम्मेदारी संभाली.इतनी ऊंचाई पर हर छोटा काम भी बेहद कठिन होता है लेकिन उन्होंने हर चुनौती का सफलतापूर्वक सामना किया.
आखिर इतना कठिन क्यों है सियाचिन?
सियाचिन ग्लेशियर को दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र कहा जाता है.यहां सैनिकों को दुश्मन से ज्यादा प्रकृति से लड़ना पड़ता है. बेहद कम ऑक्सीजन, बर्फीले तूफान, हिमस्खलन, गहरी दरारें (क्रेवास), फ्रॉस्टबाइट और स्नो ब्लाइंडनेस जैसी परिस्थितियां हर समय जानलेवा बनी रहती हैं.ऐसे माहौल में केवल वही अधिकारी और जवान भेजे जाते हैं जो विशेष प्रशिक्षण और कठिन मेडिकल मानकों पर खरे उतरते हैं.
भारतीय सेना में महिलाओं के लिए बना नया रास्ता
कैप्टन शिवा चौहान की तैनाती को भारतीय सेना में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का बड़ा कदम माना गया.इससे पहले महिलाएं सेना की कई शाखाओं में काम कर रही थीं, लेकिन सियाचिन जैसे ऑपरेशनल पोस्ट पर उनकी तैनाती नहीं हुई थी. शिवा चौहान ने यह साबित कर दिया कि कठिन सैन्य जिम्मेदारियां निभाने की क्षमता तैयारी, नेतृत्व और हौसले से तय होती है.
रक्षा सेवाओं की तैयारी करने वालों के लिए मिसाल
आज कैप्टन शिवा चौहान की कहानी NDA, CDS, AFCAT, SSC-Tech और अन्य रक्षा परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है.उन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया. इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की.SSB में ऑल इंडिया रैंक-1 हासिल की. OTA से ट्रेनिंग ली. 508 किलोमीटर की हाई-एल्टीट्यूड साइक्लिंग एक्सपेडिशन की अगुवाई की और आखिरकार सियाचिन के कुमार पोस्ट तक पहुंचकर इतिहास रच दिया.
देश की बेटियों के लिए बनीं मिसाल
कैप्टन शिवा चौहान की उपलब्धि सिर्फ एक व्यक्तिगत सफलता नहीं है. यह भारतीय सेना में महिलाओं की बढ़ती भूमिका, समान अवसर और बदलती सोच का प्रतीक भी है.उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, मेहनत लगातार हो और देश सेवा का जज्बा दिल में हो तो दुनिया का सबसे कठिन रणक्षेत्र भी किसी सपने की मंजिल बन सकता है.उनकी यह कहानी आने वाली पीढ़ियों, खासकर वर्दी पहनने का सपना देखने वाली बेटियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी.



