9वीं में फेल होकर छोड़ा गांव, 1300 रुपये से शुरू किया ठेला…

कोटा. राजस्थान के कोटा में ‘बाबू टी स्टॉल’ आज एक बड़ी पहचान बन चुका है, लेकिन इस पहचान के पीछे संघर्ष, मेहनत और कई त्याग की लंबी कहानी छिपी हुई है. बाबूलाल प्रजापति की जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया, जब वह सिर्फ 15 साल की उम्र में 9वीं कक्षा में फेल हो गए. इस असफलता के बाद वह काफी निराश हो गए और गांव छोड़कर कोटा आना पड़ा. यहां उन्होंने एक चाय की दुकान पर 30 रुपये रोज यानी करीब 900 रुपये महीने की नौकरी शुरू की. उसी दुकान पर रहना, खाना और दिनभर काम करना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया.
करीब 3 साल तक उन्होंने लगातार चाय की दुकान पर काम किया और इसी दौरान चाय बनाना सीखा. बाबूलाल कहते हैं कि उनके मन में हमेशा आगे बढ़ने की इच्छा थी. उन्होंने सोचा कि जब चाय बनाना सीख ही लिया है तो खुद का ठेला लगाना चाहिए, लेकिन सबसे बड़ी परेशानी पैसों की थी. उन्होंने सबसे पहले यह बात अपनी मां को बताई. मां ने गांव से उधार लेकर करीब 1300 रुपये जुटाए. ठेला लगाने के लिए बर्तन तक नहीं थे, इसलिए घर से ही बर्तन लेकर आए. किसी तरह सिलेंडर की व्यवस्था की और साल 2009 में छोटे से ठेले पर चाय बेचने की शुरुआत कर दी. शुरुआती दिनों में काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
पहले हजार रुपये महीने होती थी कमाईपहले 1000 रुपये महीने की कमाई हुई, फिर धीरे-धीरे यह बढ़कर 2000 रुपये तक पहुंच गई. बाबूलाल बताते हैं कि उस दौर में उन्होंने नींद तक त्याग दी थी. दिन-रात मेहनत कर उन्होंने धीरे-धीरे ग्राहकों का भरोसा जीतना शुरू किया.
चाय के साथ बदली किस्मतकाम बढ़ा तो उन्होंने किराए पर दुकान ली और चाय को नए अंदाज में पेश करना शुरू किया. साल 2016 में करीब 6 लाख रुपये का निवेश कर दुकान को कैफे जैसा लुक दिया गया. यहां पारंपरिक चाय को आधुनिक अंदाज और फैमिली कैफे कॉन्सेप्ट के साथ परोसा जाने लगा.
बाबूलाल का कहना है कि लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना उनकी सबसे बड़ी ताकत रही. उन्होंने सिर्फ चाय के स्वाद पर ही नहीं, बल्कि दुकान के माहौल पर भी खास ध्यान दिया. दुकान के इंटीरियर से लेकर चाय बेचने के तरीके तक, काफी चीजें उन्होंने यूट्यूब देखकर सीखीं. संघर्ष के दिनों में उन्हें प्रशासन और कई दूसरी परेशानियों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. उनका मानना था कि जिंदगी अब चाय के कारोबार से ही आगे बढ़ेगी.
आज कई शहरों तक पहुंचा कारोबारकोविड काल में उनके अच्छे-खासे चल रहे व्यापार को बड़ा झटका लगा, लेकिन उन्होंने फिर से खुद को संभाला. आज बाबूजी टी स्टॉल के कोटा, जयपुर, झालावाड़ और महाराष्ट्र समेत करीब 15 आउटलेट हैं. इनमें से 3 आउटलेट खुद कोटा में संचालित किए जा रहे हैं, जबकि बाकी फ्रेंचाइजी मॉडल पर चल रहे हैं.
बाबूलाल प्रजापति कहते हैं कि अगर उस समय मेहनत नहीं करते और नींद का त्याग नहीं करते, तो शायद आज उनका चाय का ब्रांड खड़ा नहीं हो पाता. आज उनकी मासिक आय करीब 1 से 1.5 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है. बाबूलाल मुस्कुराते हुए कहते हैं, चाय बनाने का तरीका ही हमारी पहचान बन गया.



