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Muharram News | Jaipur Silver Tazia

Last Updated:June 25, 2026, 20:15 IST

Jaipur Muharram Silver Tazia : जयपुर जिले के चौमूं शहर में मोहर्रम के अवसर पर निकलने वाला 42 किलो शुद्ध चांदी का घोड़ी ताजिया आज भी लोगों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा प्रतीक बना हुआ है. करीब 400 वर्ष पुराने इस ताजिए का निर्माण बगड़ शरीफ से चौमूं आकर बसे चार भाइयों ने कराया था. साढ़े सात फीट ऊंचे और साढ़े तीन फीट चौड़े इस ताजिए को विशेष तख्त पर स्थापित किया जाता है और मोहर्रम के दौरान ढोल-ताशों की मातमी धुनों के बीच जुलूस में निकाला जाता है. ताजिए के शीर्ष पर लगी सोने की कढ़ाई से बनी चांद की आकृति इसकी सबसे खास पहचान मानी जाती है. श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर इस पर सेहरा चढ़ाते हैं. समय के साथ ताजिया निर्माण की परंपरा बदली जरूर है, लेकिन चौमूं का यह चांदी का घोड़ी ताजिया आज भी शहर की साझा संस्कृति, इतिहास और धार्मिक आस्था की जीवंत मिसाल बना हुआ है.

जयपुर. मुहर्रम के पवित्र अवसर पर पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की याद में ताजिए निकाले जाते हैं. इसी परंपरा के तहत जयपुर के चौमूं शहर में 42 किलो शुद्ध चांदी से निर्मित ताजिया ढोल-ताशों की मातमी धुनों के बीच निकाला जाता है. यहां का घोड़ी ताजिया अपने अनूठे इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के कारण विशेष पहचान रखता है. चौमूं में मोहर्रम के दौरान तीन प्रमुख ताजिए निकाले जाते हैं, लेकिन पंचायत पठानान का यह चांदी का घोड़ी ताजिया सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र रहता है.

घोड़ी ताजिए का इतिहास करीब 400 वर्ष पुराना बताया जाता है. इसका निर्माण बगड़ शरीफ से चौमूं आकर बसे चार भाई कर्म खां, शेर खां, मिश्री खां और नवाज खां ने कराया था. 84 वर्षीय मौलाना जफर मोहम्मद के अनुसार, यह ताजिया ठाकुर जोधसिंह नाथावत के समय बनवाया गया था. उस दौर में चारों भाइयों का जयपुर दरबार में महत्वपूर्ण प्रभाव था. कर्म खां कप्तान, मिश्री खां जिलेदार और नवाज खां उम्मेदान के पद पर नियुक्त थे. उन्होंने लगभग साढ़े सात फीट ऊंचा और साढ़े तीन फीट चौड़ा यह भव्य ताजिया 42 किलो चांदी से तैयार कराया. ताजिए को रखने के लिए चार फीट लंबा विशेष तख्त भी बनवाया गया था.

ताजिए पर चढ़ाया जाता है सेहराइस ऐतिहासिक ताजिए की सबसे बड़ी विशेषता इसके शीर्ष पर लगी सोने की कढ़ाई से तैयार की गई चांद की आकृति है. मोहर्रम के अवसर पर सबसे पहला सेहरा पंचायत की ओर से चढ़ाया जाता है. इसके बाद श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर ताजिए पर सेहरा चढ़ाकर अपनी आस्था व्यक्त करते हैं. यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जा रही है. मौलाना जफर मोहम्मद बताते हैं कि जब जयपुर रियासत के तत्कालीन शासक सवाई ईश्वर सिंह को चौमूं में चांदी के ताजिए की जानकारी मिली तो उन्होंने पठान समाज के प्रतिनिधियों को अपने दरबार में आमंत्रित किया. दरबार में जब चौमूं के लोगों ने पहले से चांदी का ताजिया होने की जानकारी दी तो राजा स्वयं भी आश्चर्यचकित रह गए.

स्थायी ताजियों का चलन बढ़ासमय के साथ ताजिया निर्माण की परंपरा में भी बदलाव आया है. पहले बांस के ढांचों पर सोने-चांदी के वर्क और मीनाकारी से सजे दो मंजिला ताजिए तैयार किए जाते थे, लेकिन कारीगरों की कमी, बढ़ती लागत और पर्याप्त चंदा नहीं जुट पाने के कारण अब स्थायी ताजियों का चलन बढ़ गया है. वर्ष 1982 में जोगी मोहल्ले के लोगों ने 62 हजार रुपये की लागत से पीतल का ताजिया बनवाया था, जबकि रावण गेट क्षेत्र के लोगों ने करीब 35 वर्ष पहले लोहे की जाली वाला 25 किलो वजनी गोल्डन रंग का ताजिया तैयार कराया. आज भी मोहर्रम के दौरान ये ताजिए मातमी जुलूसों में निकाले जाते हैं और उन्हें ताजे फूलों तथा सोने-चांदी के तारों से बने सेहरों से सजाया जाता है. चौमूं का चांदी का घोड़ी ताजिया न केवल मुस्लिम आस्था का प्रतीक है, बल्कि शहर की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का भी जीवंत उदाहरण है.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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