सांप पकड़ने वाले हाथों में अब किताबें! कोटा का यह छात्रावास बदल रहा घुमंतु बच्चों की किस्मत, जानिए पूरी कहानी

कोटा. शिक्षा नगरी कोटा से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो समाज के उस हिस्से की तस्वीर बदल रही है, जिसे अक्सर मुख्यधारा से दूर माना जाता है. महावीर नगर प्रथम स्थित श्री गोविंद गुरू घुमंतु छात्रावास आज घुमंतु समाज के बच्चों की तकदीर गढ़ने का काम कर रहा है. यहां कभी अपने माता-पिता के साथ सांप पकड़ने, लोहा पीटने और मजदूरी करने वाले बच्चों के हाथों में अब किताबें हैं और आंखों में बड़े सपने.
शाम के समय छात्रावास परिसर में गूंजती हनुमान चालीसा और “भारत माता की जय” के नारों की आवाज किसी मंदिर का अहसास कराती है, लेकिन यह एक अनुशासित छात्रावास है, जहां कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जा रही है. हाड़ौती क्षेत्र के खानपुर, भवानीमंडी, बूंदी, इटावा सहित कई इलाकों से नट, कंजर, कालबेलिया, बंजारा, मोगिया जैसी घुमंतु जातियों के बच्चों को यहां चयनित कर प्रवेश दिया जाता है.
छात्रावास के कोषाध्यक्ष संतोष यादव बताते हैं कि इन बच्चों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का मूल्यांकन कर उन्हें यहां लाया जाता है. “ये बच्चे पहले अपने परिवार के साथ पारंपरिक काम करते थे, लेकिन अब शिक्षा के जरिए उन्हें नई दिशा दी जा रही है,” उन्होंने कहा.
संस्कार और आधुनिक शिक्षा का संगमछात्रावास के अध्यक्ष गणपत शर्मा का कहना है कि उद्देश्य केवल पढ़ाई कराना नहीं, बल्कि बच्चों को संस्कारित और आत्मनिर्भर बनाना है. “यहां बच्चे अंग्रेजी में आत्मविश्वास से परिचय देते हैं और साथ ही बड़ों का सम्मान करना भी सीखते हैं,” उन्होंने बताया. यही संतुलन इस छात्रावास की सबसे बड़ी खासियत है.
बच्चो का दिनचर्या से बनता अनुशासनसुबह 6 बजे उठने से लेकर रात तक बच्चों की पूरी दिनचर्या तय है. प्रार्थना, अल्पाहार, स्कूल, शाम की शाखा, पढ़ाई और विश्राम हर गतिविधि समयबद्ध है. अधीक्षक गौरीशंकर नागर के अनुसार, यह दिनचर्या बच्चों में अनुशासन और जिम्मेदारी विकसित करती है.
भामाशाहों के सहयोग से चल रहा प्रयासछात्रावास का संचालन समाजसेवियों और भामाशाहों के सहयोग से हो रहा है. यहां रहने, खाने, पढ़ाई और अन्य सुविधाएं पूरी तरह निःशुल्क हैं. परिसर में सीसीटीवी, लाइब्रेरी और ट्यूटर जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं. बच्चों को संस्कृत भी सिखाई जा रही है और वे आपस में उसी भाषा में संवाद करने का अभ्यास करते हैं.
शान से कहते है बच्चे कोई अफ़सर तो कोई कमांडो नैनवां के छात्र अंकित बताते हैं कि वे पिछले तीन साल से यहां रहकर पढ़ाई कर रहे हैं और अब उनका मन पढ़ाई में लगता है. वहीं बारा के अमन का सपना है कि वह बड़ा होकर कमांडो बने. शिक्षक हेमंत का कहना है कि “इन बच्चों में अपार क्षमता है, जरूरत सिर्फ सही मार्गदर्शन की है.”



