Rakesh Chitkela Success Story: 11 की उम्र में छूटा पिता का साया, मां स्कूल में लगाने लगी झाड़ू, बेटा शिक्षा मंत्रालय में बन गया अफसर

Last Updated:April 18, 2026, 11:22 IST
Rakesh Chitkela Success Story: तेलंगाना के राकेश चिटकेला ने संघर्ष की अद्भुत मिसाल पेश की है. उनकी मां स्कूल में ‘आया’ थीं. वह खुद भी बचपन में मां के साथ काम करने जाया करते थे. आज वह शिक्षा मंत्रालय में अधिकारी बन गए हैं. गरीबी को मात देकर सफलता का शिखर छूने वाले राकेश चिटकेला की कहानी आपके रोंगटे खड़े कर देगी और कभी हार न मानने की प्रेरणा भी देगी.
Rakesh Chitkela Success Story: राकेश चिटकेला ने मेहनत और संघर्ष से सफलता की नई इबारत लिखी है
नई दिल्ली (Rakesh Chitkela Success Story). सफलता की कहानियां अक्सर महलों में नहीं, बल्कि उन कच्ची बस्तियों और तंग गलियों में जन्म लेती हैं. तेलंगाना के संगारेड्डी जिले के राकेश चिटकेला की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. जिस उम्र में बच्चे बेफिक्र होकर खेलते हैं, उस उम्र में राकेश सुबह 4 बजे उठकर अपनी मां के साथ सफाई का काम करते थे. आज वही राकेश चिटकेला देश के शिक्षा मंत्रालय में भारत की शिक्षा नीति को बेहतर बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं.
राकेश की यात्रा केवल उनकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि उन करोड़ों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है, जो संसाधनों के अभाव में अपने सपनों का गला घोंट देते हैं. शिक्षा मंत्रालय में प्रतिष्ठित पद हासिल कर राकेश चिटकेला ने अपनी मां के उन आंसुओं और पसीने की कीमत चुका दी, जेो उन्होंने राकेश को पढ़ाने के लिए बहाए थे. राकेश की सफलता के पीछे उनकी मां सत्यम्मा का वह अडिग विश्वास है, जिन्होंने तंगहाली के बावजूद अपने बच्चों की शिक्षा से कभी समझौता नहीं किया. पढ़िए सक्सेस स्टोरी.
कम उम्र में उठा पिता का साया
राकेश चिटकेला का जीवन तब पूरी तरह बदल गया, जब साल 2000 की शुरुआत में उनके पिता का निधन हो गया. उस समय राकेश मात्र 11 साल के थे. परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और आर्थिक स्थिति डगमगा गई. घर चलाने के लिए उनकी मां ने ‘सेंट एंथोनी हाई स्कूल’ में ‘आया’ के रूप में काम करना शुरू किया, जहां उन्हें महीने के मात्र 6,000 रुपये मिलते थे. घर की जरूरतें पूरी करने और एक्सट्रा कमाई के लिए राकेश सुबह 4 बजे उठकर अपनी मां के साथ पास के फायर स्टेशन की सफाई करने जाते थे.
तानों के बीच शिक्षा को बनाया ढाल
The Better India में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, राकेश चिटकेला का परिवार जब संघर्ष कर रहा था, तब रिश्तेदारों ने बच्चों को सरकारी स्कूल में डालने और उन्हें काम पर लगाने की सलाह दी. लेकिन मां सत्यम्मा ने हार नहीं मानी. उन्होंने कर्ज लिया, अपनी जरूरतें कम कीं और शादियों में सफाई जैसे अतिरिक्त काम किए, जिससे बच्चों की पढ़ाई जारी रहे. राकेश ने भी अपनी मां के संघर्ष को व्यर्थ नहीं जाने दिया. उन्होंने 10वीं में 9.2 GPA हासिल किया और विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी पढ़ाई जारी रखी.
केरल से जोधपुर और फिर दिल्ली का सफर
राकेश चिटतेला की मेहनत ने तब रंग दिखाया, जब उन्होंने ‘सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ केरल’ से इंटरनेशनल रिलेशंस में मास्टर्स किया. यहां उन्होंने न केवल टॉप किया, बल्कि गोल्ड मेडल (सेकंड रैंक) भी हासिल किया. इसके बाद उन्होंने आईआईटी जोधपुर में प्रशासनिक सहयोगी के रूप में काम किया. इन अनुभवों ने उन्हें वह कॉन्फिडेंस दिया, जिसने उन्हें देश के सबसे प्रतिष्ठित गलियारों तक पहुंचा दिया.
शिक्षा मंत्रालय में मिली अहम भूमिका
दिसंबर 2024 में राकेश ‘शिक्षा मंत्रालय’ में शामिल हुए. आज वे उन पॉलिसी और चर्चाओं का हिस्सा हैं, जो देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा तय करती हैं. इसके साथ ही, 2026 में उन्हें ‘हार्वर्ड कॉलेज प्रोजेक्ट फॉर एशियन एंड इंटरनेशनल रिलेशंस’ (HPAIR) के लिए डेलिगेट चुना गया, जो एक ग्लोबल सम्मान है. राकेश अब यूपीएससी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं और उनका सपना प्रशासनिक अधिकारी बनकर समाज की सेवा करना है.
About the AuthorDeepali Porwal
With more than 10 years of experience in journalism, I currently specialize in covering education and civil services. From interviewing IAS, IPS, IRS officers to exploring the evolving landscape of academic sys…और पढ़ें
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First Published :
April 18, 2026, 11:22 IST



