1987 से अब तक नहीं बन पाए सोलो एक्टर, मल्टी-स्टारर फिल्मों का बनकर रह गए हिस्सा, दूसरे देश में है गजब का स्टारडम

Last Updated:April 27, 2026, 17:54 IST
बॉलीवुड की चकाचौंध भरी दुनिया में हर एक्टर सुपरस्टार बनने का सपना लेकर आता है, लेकिन चंकी पांडे की कहानी सिनेमा के इतिहास के सबसे दिलचस्प चैप्टर में से एक है. 1987 में ‘आग ही आग’ से डेब्यू करने वाले एक्टर पिछले चार दशकों से हिंदी सिनेमा का हिस्सा हैं. अजीब बात है कि वे बॉलीवुड में कभी भी एक सफल सोलो लीड के तौर पर अपनी पहचान नहीं बना पाए. जहां वे भारत में मल्टी-स्टारर फिल्मों और सपोर्टिंग रोल तक ही सीमित रहे, वहीं बॉर्डर पार एक दूसरे देश ने उन्हें ‘सुपरस्टार’ के तौर पर पहचाना. यह एक ऐसे आर्टिस्ट की कहानी है जिसने कभी हार नहीं मानी और हर दौर में खुद को नए सिरे से बनाया.
नई दिल्ली. चंकी पांडे ने 1987 में फिल्म ‘आग ही आग’ से बॉलीवुड में एंट्री की. उनके लुक्स, फिजीक और स्टाइल को देखकर लोगों ने उन्हें भविष्य का सुपरस्टार बता दिया था. लेकिन, किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था. उनकी पहली ही फिल्म एक मल्टी-स्टारर थी और वही उनकी किस्मत बन गई. 1987 से 2026 तक के इस लंबे सफर में, चंकी ने कई बार सोलो हीरो के तौर पर अपनी जगह बनाने की कोशिश की, लेकिन दर्शकों ने हमेशा उन्हें भीड़ का हिस्सा बनकर चमकते हुए देखना पसंद किया. (तस्वीर बनाने में एआई की मदद ली गई है.)
80 के दशक के आखिर और 90 के दशक की शुरुआत में, चंकी ने ‘मिट्टी और सोना’ और ‘कसम वर्दी की’ जैसी कुछ फिल्मों में सोलो लीड रोल किया. ये फिल्में सफल रहीं, लेकिन चंकी को वह क्रेज नहीं मिला जो उस समय के दूसरे एक्टर्स को मिला था. मेनस्ट्रीम बॉलीवुड ने उन्हें एक ऐसे एक्टर के तौर पर लेबल किया जो किसी बड़े स्टार के साथ काम करने पर फिल्म में जान डाल सकता था, लेकिन अकेले बोझ उठाने में शायद पीछे रह जाता था.
चंकी पांडे की असली ताकत उनके सपोर्टिंग रोल्स में थी. 1988 की फिल्म ‘तेजाब’ में अनिल कपूर के दोस्त ‘बब्बन’ के उनके रोल ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया. इसके बाद, 1993 में रिलीज हुई ‘आंखें’ ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. गोविंदा और चंकी की जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला दी थी. हालांकि, यहां भी क्रेडिट बंट गया. चंकी ऐसे एक्टर रहे जो फिल्म को हिट तो करा सकते थे, लेकिन उन्हें कभी पूरा क्रेडिट नहीं मिला.
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कहा जाता है कि 90 के दशक के बीच तक, चंकी पांडे का बॉलीवुड करियर लगभग खत्म हो गया था. उनके पास कोई फिल्म नहीं थी और जो थीं वे भी फ्लॉप हो रही थीं. ऐसे मुश्किल समय में, चंकी ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने सबको हैरान कर दिया- वे बांग्लादेशी फिल्म इंडस्ट्री चले गए.
वहां जो हुआ वह किसी चमत्कार से कम नहीं था. चंकी पांडे ने बांग्लादेश में सोलो लीड हीरो के तौर पर एक के बाद एक ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं. वहां उनकी पॉपुलैरिटी इतनी थी कि उन्हें ‘बांग्लादेश का अमिताभ बच्चन’ कहा जाने लगा. मुंबई की गलियों में उन्हें जो सोलो स्टारडम चाहिए था, वह ढाका के सिनेमाघरों में मिला. वे पहले भारतीय एक्टर बने जिन्होंने सालों तक दूसरे देश के सिनेमा पर राज किया.
2000 के दशक में चंकी बॉलीवुड में वापस आए, लेकिन इस बार वे एक बदले हुए इंसान और आर्टिस्ट थे. उन्हें एहसास हुआ कि अगर उन्हें सर्वाइव करना है, तो उन्हें खुद को रीइन्वेंट करना होगा. उन्होंने कॉमेडी को चुना और ‘हाउसफुल’ सीरीज में ‘अपना सपना मनी मनी’ और ‘आखिरी पास्ता’ में अपने रोल से नई पीढ़ी के दिलों में जगह बनाई. ‘आई एम जोकिंग’ उनका ट्रेडमार्क बन गया.
लेकिन चंकी यहीं नहीं रुके. उन्होंने ‘बेगम जान’ और ‘साहो’ जैसी फिल्मों में डार्क और बेरहम विलेन का रोल करके अपनी इमेज फिर से तोड़ी. 2026 तक चंकी पांडे एक वर्सेटाइल एक्टर बनकर उभरे, जो ओटीटी से लेकर बड़े पर्दे तक हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है.
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April 27, 2026, 17:54 IST



