खेती में भी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’! अब पाकिस्तान की तरह दुश्मन कीटों का भी होगा सफाया; काजरी के ‘अस्त्र’ बनेंगे ढाल

पाली. भारत की पाकिस्तान पर की गई वो ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ तो आपको याद ही होगी… जब भारतीय जांबाजों ने सीमा पार जाकर दुश्मनों के दांत खट्टे किए थे. वैसी ही एक और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ अब राजस्थान के पाली में शुरू हो चुकी है. लेकिन इस बार निशाना सीमा पार का दुश्मन नहीं, बल्कि खेतों में फसलों का दम घोंटने वाले वो जहरीले ‘कीट’ और ‘रसायन’ हैं जो किसान की मेहनत को दीमक की तरह चाट रहे हैं. पाली के काजरी (CAZRI) वैज्ञानिकों ने ऐसे दुश्मनों के झुंड को खत्म करने के लिए कुछ ऐसे खास अस्त्र तैयार किए हैं, जिनके नाम महज से ही दुश्मन भाग खडे होते है.
ब्रह्मास्त्र, नीमास्त्र और अग्निअस्त्र के साथ-साथ फफूंदनाशक नाम यह अस्त्र अब किसानों के लिए ढाल बनकर इनको एक अच्छी उपज देने में सहायक साबित होंगे. जी हां, अब खेतों में रसायनों का जहर नहीं, बल्कि काजरी का स्वदेशी नुस्खा चलेगा. अब फसलों के दुश्मनों का खात्मा घर में बनी दवाओं से होगा और वो भी जीरो बजट में! देखिए पाली से यह विशेष रिपोर्ट…”
खेतों में किसान भी अस्त्रों से होंगे लैस
सीमा पर तैनात जवानों की तरह अब खेतों में किसान भी ‘अस्त्रों’ से लैस होंगे. काजरी पाली के वैज्ञानिक डॉ. अरविंद सिंह तेतरवाल ने प्राकृतिक खेती को एक ‘मिशन मोड’ पर ले लिया है. उनका दावा है कि जो काम महंगे रासायनिक कीटनाशक नहीं कर पाते, वो काम हमारी देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से बने नुस्खे कर दिखाएंगे. डॉ. अरविंद सिंह तेतरवाल और उनकी टीम ने देसी गाय के गोबर-मूत्र के साथ मिलकर प्रकृति के कुछ ऐसे नुस्खे तैयार किए हैं, जो किसी भी पेस्टिसाइड से दस गुना ज्यादा असरदार हैं.
मिशन के मास्टर प्लान से रसायनों की होगी ‘छुट्टी’
डॉ. तेतरवाल के अनुसार, इस सर्जिकल स्ट्राइक का सबसे बड़ा हथियार है ‘देसी गाय’. ब्रह्मास्त्र और नीमास्त्र ये वो नाम हैं जो अब कीड़ों के लिए काल बन चुके हैं. 10 तरह की जड़ी-बूटियों का अर्क से तैयार किया गया है. खेत की मेड़ पर उगे धतूरे, नीम, सीताफल, करंज और तुलसी जैसी 10 वनस्पतियों को मिलाकर ‘दसपर्णी अर्क’ तैयार किया गया है. ये वो पौधे हैं, जिन्हें जानवर मुंह नहीं लगाते, लेकिन यही अब फसलों के रक्षक बनेंगे.
काजरी का ‘ऑपरेशन’ रहा सफल
पिछले 3 सालों से चल रहे इस प्रोजेक्ट के नतीजे चौंकाने वाले हैं. जीरो रसायनिक तत्वों का इस्तेमाल किया गया है. काजरी ने खुद अपने फार्म और 3 प्रगतिशील किसानों के यहां गेहूं की ऐसी फसल लहलहाई है, जिसमें एक बूंद भी केमिकल का उपयोग नहीं हुआ.ट्रेनिंग कैंप में अब तक सैकड़ों किसानों को इस ‘युद्ध’ के लिए तैयार किया जा चुका है. 150 से ज्यादा किसान इस तकनीक को पूरी तरह अपनाकर ‘प्राकृतिक योद्धा’ बन चुके हैं. बाजार से महंगी दवाइयां खरीदने की जरूरत खत्म. गुड़, बेसन और गोमूत्र के मिश्रण से तैयार फफूंदनाशक मिट्टी को फिर से जिंदा कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री का विजन, काजरी का एक्शन
डॉ. तेतरवाल ने बताया कि प्रधानमंत्री का पूरा फोकस प्राकृतिक खेती पर है. काजरी ने इसे सिर्फ एक रिसर्च नहीं, बल्कि एक आंदोलन बना दिया है. किसानों को समय-समय पर डेमोस्ट्रेशन दिए जा रहे हैं ताकि वे खुद अपने ‘कीटनाशक’ और ‘फफूंदनाशक’ तैयार कर सकें. काजरी पाली के पौध संरक्षण वैज्ञानिक डॉ. अरविंद सिंह तेतरवाल के मुताबिक, पिछले 3 सालों से संस्थान में प्राकृतिक खेती का प्रोजेक्ट चल रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को बाजार के महंगे और जहरीले रसायनों के जाल से बाहर निकालना है. प्रधानमंत्री के विजन को ध्यान में रखते हुए, इसे ‘मिशन मोड’ पर चलाया जा रहा है.



