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1921 में रखी गई थी सीकर के इस मंदिर की नींव, डिग्गीपुरी महाराज के प्रतिरूप में रात को होता है दिव्य मिलन

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1921 में रखी गई थी सीकर के इस मंदिर की नींव, रात को होता है दिव्य मिलन

Last Updated:May 01, 2026, 11:37 IST

Shri Kalyan Mandir Sikar: सीकर का श्री कल्याण मंदिर डूजोद गेट के पास स्थित एक प्राचीन और प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है. इसे स्थानीय लोग कल्याण धाम के नाम से भी जानते हैं. इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1921 में तत्कालीन शासक राव राजा कल्याण सिंह द्वारा की गई थी. यह मंदिर लगभग 100 से अधिक वर्षों पुराना है और समय के साथ इसकी आस्था और महिमा लगातार बढ़ती गई है. यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक शांति, आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं.

सीकर के श्री कल्याण मंदिर सीकर सीकर जिले के दूजोद गेट के पास स्थित एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है. स्थानीय लोग श्रद्धा से इसे कल्याण धाम के नाम से जानते हैं. यह मंदिर करीब 109 वर्षों से अधिक पुराना बताया जाता है और समय के साथ इसकी महिमा लगातार बढ़ती गई है. दूर-दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं और इसे अपनी आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक शांति का प्रमुख केंद्र मानते हैं. लोगो के अनुसार यहां आने से उन्हें मानसिक संतुलन और चमत्कार का अनुभव होता है.

इस धाम की स्थापना वर्ष 1921 में तत्कालीन शासक राव राजा कल्याण सिंह द्वारा करवाई गई थी. उन्होंने इसे केवल एक मंदिर के रूप में नहीं बल्कि अपनी धार्मिक आस्था और परंपराओं के संरक्षण के प्रतीक के रूप में विकसित किया. इस मंदिर में आज भी राजशाही परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है. जिसमें अनुशासन, विधि-विधान और प्राचीन संस्कृति का विशेष ध्यान रखा जाता है. इस कारण यह स्थान अन्य मंदिरों से अलग और खास पहचान बनाए हुए है.

श्री कल्याण मंदिर के निर्माण की कहानी भी एक गहरी धार्मिक आस्था और पारिवारिक भावना से जुड़ी हुई है. बताया जाता है कि राव राजा के पिता वल्लभ सिंह ने डिग्गीपुरी कल्याणजी मंदिर में भगवान कल्याणजी से संतान प्राप्ति की मनोकामना की थी. जब उनकी यह इच्छा पूर्ण हुई, तो उन्होंने इसे ईश्वरीय कृपा मानते हुए अपने पुत्र का नाम कल्याण रखा और इस आस्था को स्थायी रूप देने का संकल्प लिया.

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सुबह मंगला आरती के बाद माता लक्ष्मी को पुनः उनके मूल स्थान पर स्थापित कर दिया जाता है. इस धाम में पूजा-अर्चना की शुरुआत भी एक विशेष क्रम में की जाती है, जिसमें सबसे पहले माता लक्ष्मी की आरती की जाती है और उसके बाद भगवान नारायण की पूजा की जाती है. यह परंपरा समृद्धि और कल्याण के प्रतीक के रूप में मानी जाती है, जिसके कारण श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आते हैं और सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं.

इसके बाद जब कल्याण सिंह स्वयं राजा बने, तब उन्होंने अपने पिता की आस्था और संकल्प को साकार करने के लिए सीकर में इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया. यह मंदिर डिग्गीपुरी के कल्याण भगवान के प्रतिरूप के रूप में स्थापित किया गया, जिससे स्थानीय लोगों को दूर जाने की आवश्यकता न पड़े और वे अपने क्षेत्र में ही उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान के दर्शन कर सकें, जो डिग्गीपुरी में अनुभव किए जाते हैं.

इस मंदिर की पहचान इसकी अनूठी और पारंपरिक पूजा पद्धति के कारण भी है, जो इसे अन्य धार्मिक स्थलों से अलग बनाती है. यहां भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी दिन के समय अलग-अलग स्थानों पर विराजमान रहते हैं. जिससे भक्तों को दोनों के अलग-अलग रूपों में दर्शन करने का अवसर मिलता है. यह परंपरा वर्षों से निरंतर चली आ रही है और इसे बेहद श्रद्धा और नियमों के साथ निभाया जाता है.

इस मंदिर में रात के समय शयन आरती के दौरान एक विशेष धार्मिक प्रक्रिया संपन्न की जाती है. इस अवसर पर माता लक्ष्मी की अष्टधातु की प्रतिमा को विधिवत रूप से सजाया जाता है और पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. इसके बाद प्रतिमा को भगवान नारायण के समीप लाया जाता है. यहां दोनों का दिव्य मिलन कराया जाता है. यह दृश्य अत्यंत भावनात्मक और आध्यात्मिक माना जाता है. भक्तों के लिए यह क्षण आस्था और भक्ति से भरपूर होता है. इस अनुष्ठान को देखने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं और दिव्यता का अनुभव करते हैं.

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