पर्यटन नहीं, यह है संघर्ष की कहानी… स्वर्णगिरी दुर्ग की दीवारों में कैद है आजादी का दर्द – हिंदी

पर्यटन नहीं, संघर्ष की कहानी… यहां दुर्ग की दीवारों में कैद है आजादी का दर्द
Jalore Heritage Places: जालोर का स्वर्णगिरी दुर्ग आज भले ही एक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता हो, लेकिन इसकी ऊंची दीवारों और भूलभुलैया में आज भी आज़ादी की लड़ाई की अनसुनी कहानियां दबी हुई हैं. 1930 के दशक में जब देशभर में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो रहा था, तब इस किले को क्रांतिकारियों की कैदगाह के रूप में इस्तेमाल किया गया. यहां मथुरादास माथुर, गणेश लाल व्यास, फतहराज जोशी और तुलसीदास राठी जैसे कई स्वतंत्रता सेनानियों को बंद रखा गया, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने हौसले को टूटने नहीं दिया. यह किला अपनी भौगोलिक संरचना और जटिल रास्तों के कारण कैद के लिए उपयुक्त माना जाता था. लेकिन कैद में रहने के बावजूद इन सेनानियों की आवाज दबाई नहीं जा सकी और आंदोलन की लौ जलती रही. आज जब लोग इस दुर्ग को देखने पहुंचते हैं, तो उन्हें सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि उन बलिदानों की गूंज सुनाई देती है, जिन्होंने देश को आज़ादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई.




