बिना सैलरी के थिएटर में किया काम, खड़ा किया खुद का प्रोडक्शन हाउस, नए-नवेले एक्टर्स को बनाया स्टार

Last Updated:May 10, 2026, 04:31 IST
राजश्री प्रोडक्शन्स के फाउंडर ताराचंद बड़जात्या 1933 में बिना वेतन के थिएटर में काम सीखकर आगे बढ़े. सूरज बड़जात्या ने अपना सफर शुरू करने वाले 1947 में राजश्री पिक्चर्स की नींव रखी. उन्होंने ‘शोले’ और ‘आनंद’ जैसी बड़ी फिल्मों का डिस्ट्रीब्यूशन किया और ‘दोस्ती’, ‘नदिया के पार’ व ‘सारांश’ जैसी पारिवारिक फिल्में बनाईं. अनुपम खेर और माधुरी दीक्षित जैसे सितारों को मौका देने वाले ताराचंद जी ने भारतीय सिनेमा को संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ा. उनका जीवन यह साबित करता है कि कड़ी मेहनत और साफ नीयत से शून्य से भी साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है.
ख़बरें फटाफट

ताराचंद बड़जात्या एक डिस्ट्रिब्यूटर भी थे. (फोटो साभार: IANS)
नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा में जब भी पारिवारिक और संस्कारी फिल्मों का जिक्र आता है, तो ‘राजश्री प्रोडक्शन्स’ का नाम सबसे पहले जेहन में आता है. लेकिन इस विशाल साम्राज्य को खड़ा करने वाले शख्स ताराचंद बड़जात्या की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है. 10 मई 1914 को राजस्थान के एक छोटे से शहर कुचामन में जन्मे ताराचंद जी बचपन से ही बहुत मेहनती थे. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब करियर की बात आई, तो उन्होंने उस दौर में ग्लैमर से भरी फिल्मी दुनिया को चुना. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि साल 1933 में जब उन्होंने ‘मोती महल थिएटर्स’ में अपना पहला कदम रखा, तो वहां बिना किसी सैलरी के काम करना शुरू किया. उन्हें पैसों की लालच नहीं थी, बल्कि वे सिनेमा की बारीकियों को सीखना चाहते थे. उनकी इसी निस्वार्थ मेहनत और लगन ने थिएटर मालिकों का दिल जीत लिया, जिससे आगे चलकर उन्हें अपना काम शुरू करने में बड़ी मदद मिली.
ताराचंद ने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर 15 अगस्त 1947 को ‘राजश्री पिक्चर्स’ की नींव रखी. वे न केवल एक बेहतरीन निर्माता थे, बल्कि एक बहुत ही समझदार डिस्ट्रीब्यूटर भी थे. आपको जानकर हैरानी होगी कि ‘शोले’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘आनंद’ और ‘कुली’ जैसी कालजयी फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचाने में उनकी कंपनी का बड़ा हाथ रहा. उन्होंने साउथ भारतीय सिनेमा और बॉलीवुड के बीच एक पुल का काम किया. 1960 के दशक में उन्होंने पूरी तरह फिल्म निर्माण में कदम रखा और ‘आरती’ जैसी सफल फिल्म दी. लेकिन असली धमाका साल 1964 में फिल्म ‘दोस्ती’ से हुआ, जिसने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और 6 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स अपने नाम किए. इसके बाद तो ‘नदिया के पार’, ‘सारांश’ और ‘चितचोर’ जैसी फिल्मों की झड़ी लग गई, जिन्होंने भारतीय समाज की जड़ों और रिश्तों को पर्दे पर खूबसूरती से उतारा.
नए हुनर को पहचानने में माहिर ताराचंद बड़जात्या की सबसे खास बात यह थी कि वे नए हुनर को पहचानने में माहिर थे. आज जिन्हें हम बॉलीवुड के दिग्गज मानते हैं, उनमें से कई सितारों को राजश्री के बैनर ने ही पहली बार मौका दिया था. माधुरी दीक्षित, अनुपम खेर, और संगीत की दुनिया के मशहूर नाम जैसे उदित नारायण और अलका याग्निक को तराशने का श्रेय उन्हीं को जाता है. वे सिर्फ फिल्में नहीं बनाते थे, बल्कि एक ऐसी संस्कृति बना रहे थे जहां सिनेमा पूरे परिवार के एक-साथ बैठने का बहाना बन सके. 1992 में भले ही वे दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन ‘मैने प्यार किया’ और ‘हम आपके हैं कौन’ जैसी बाद की फिल्मों में भी उनकी वही सादगी भरी सोच झलकती रही. आज राजश्री प्रोडक्शन्स की सफलता इस बात का गवाह है कि अगर इंसान के इरादे मजबूत हों, तो बिना जेब में पैसे लिए भी एक पूरा साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है.
About the AuthorAbhishek NagarSenior Sub Editor
अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के रहने वाले अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने एंटरटेनमेंट बीट के अलावा करियर, हेल्थ और पॉल…और पढ़ें
अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज
खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में
सबमिट करें
Location :
Delhi,Delhi,Delhi



