हंगरी का रोमा जिप्सी समुदाय डॉ. अंबेडकर को क्यों मुक्तिदाता मानकर पूजता है

डॉ. भीमराव अंबेडकर की लोकप्रियता या गॉड फीगर केवल भारत में ही नहीं है बल्कि उन्हें कई और देशों में पूजे जाने की स्थिति है. इसमें सबसे ऊपर है हंगरी. जहां रोमा जिप्सी उन्हें अपना मुक्तिदाता मानने लगे हैं. वो उनकी बताई बातों को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं. इसके जरिए अपनी तकदीर को बदल रहे हैं. भारत के बाद अंबेडकर की लोकप्रियता हंगरी, अमेरिका और ब्रिटेन में सबसे अधिक देखी जा सकती है.
हंगरी के रोमा समुदाय खुद को डॉ. बीआर अंबेडकर के साथ इसलिए जोड़ते हैं क्योंकि उनकी सामाजिक स्थिति भारतीय दलितों से मिलती जुलती है. दोनों समूह सदियों से गहरे भेदभाव, अलगाव, गरीबी, शिक्षा से वंचित रहने और मुख्यधारा से बाहर रहने का सामना करते आए हैं. रोमा यूरोप में ‘जिप्सी’ कहलाते हैं. हंगरी में वो सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय हैं.
स्कूलों में उनके 60% से ज्यादा बच्चे ड्रॉपआउट हो जाते हैं, उन्हें ‘मेंटली चैलेंज्ड’ बताकर अलग क्लास में डाल दिया जाता है. वहां के समाज में उन्हें ‘अछूत’ जैसा ट्रीटमेंट मिलता है.
कनेक्शन कैसे बना?
यह कनेक्शन 1990 के अंत और 2000 के शुरुआती सालों में शुरू हुआ. रोमा एक्टिविस्ट जैनोस ओरसोस और हंगेरियन समाजशास्त्री तिबोर डेरडेक ने अंबेडकर की जीवनी पढ़ी. उन्हें अंबेडकर के संघर्ष में अपना दर्द दिखाई दिया – जिसमें जातिवाद के खिलाफ लड़ाई, शिक्षा की ताकत और सम्मान की लड़ाई शामिल थी.
मिस्कोल्क शहर में डॉ. अंबेडकर हाईस्कूल
2005 के आसपास दोनों भारत आए. महाराष्ट्र में त्रिरांता बौद्धिस्ट आर्गनाइजेशन के धम्म रिट्रीट में गए, जहां उन्होंने देखा कि दलित समुदाय अंबेडकर के विचारों से कैसे मजबूत हो रहा है. दबे हुए लोग समाज में ऊंचे पदों तक पहुंच रहे हैं.
वापस लौटकर वर्ष 2007 में उन्होंने हंगरी में जय भीम नेटवर्क बनाया (2007 में). अंबेडकर के बौद्धिज्म को अपनाया. अंबेडकर के तीन मंत्र -“शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित रहो” को अपनाया. उन्होंने अंबेडकर की किताबें और भाषणों का हंगेरियन भाषा में अनुवाद कराया.
अंबेडकर स्कूल
मिस्कोल्क शहर में डॉ. अंबेडकर हाईस्कूल बनाया गया, जो रोमा बच्चों को मुख्यधारा के स्कूलों से निकाल दिए जाने के बाद दूसरा मौका देता है. स्कूल में सुबह घंटी की बजाय गोंग बजता है. दीवारों पर अंबेडकर के विचार लिखे होते हैं. बाहर उनकी मूर्ति लगी है. रोमा इसे परी कथा कहते हैं कि एक व्यक्ति जो स्कूल में दाखिला नहीं पाता था, विदेश जाकर बैरिस्टर बना, जातिवाद से लड़ा और देश का संविधान लिखा. ये स्कूल अब रोमा एक्टिविस्टों के लिए तीर्थस्थल बन गया है. पूरे यूरोप के रोमा यहां से प्रेरणा लेते हैं.
ये माना जाता है कि रोमा का मूल उत्तर भारत से जुड़ा है. करीब 1000 साल पहले वे भारत से यूरोप गए थे. इसलिए अंबेडकर और भारतीय दलित आंदोलन से उनका भावनात्मक जुड़ाव भी और मजबूत हो गया.
जय भीम अभिवादन
अंबेडकर ने साबित किया कि दमन से बाहर निकलना संभव है – शिक्षा, जातिवाद से मुक्त बौद्ध धर्म और संघर्ष से. स्कूल के जरिए रोमा बच्चे शिक्षा पा रहे हैं, आत्मसम्मान सीख रहे हैं, और नेता बन रहे हैं. जय भीम का अभिवादन अब हंगरी के रोमा समुदाय में आम है. रोमा खुद अंबेडकर तक पहुंचे. उन्हें अपना आइकन बनाया. आज भी हंगरी में यह आंदोलन चल रहा है. रोमा युवा अंबेडकर को अपना हीरो मानते हैं. उन्हें अपना मुक्तिदाता मानकर पूजते हैं.
अंबेडकर हंगरी के रोमा जिप्सियों के लिए जिंदगी की नई राह दिखाने वाले शख्स बन रहे हैं. (फाइल फोटो)
अमेरिका का ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन और वहां का दलित प्रवासी समुदाय अंबेडकर के “शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित रहो” नारे को अपना आधार बनाता है.
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के नंबर 1 छात्र
साल 2004 में, अमेरिका की प्रतिष्ठित कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने अपनी स्थापना के 250 वर्ष पूरे होने पर दुनिया के उन 100 महान विद्वानों की सूची जारी की, जिन्होंने वहां से पढ़ाई की थी. इसमें डॉ. अंबेडकर का नाम सबसे ऊपर रखा गया. यह सम्मान उन्हें बराक ओबामा जैसी हस्तियों से भी ऊपर एक क्रांतिकारी आधुनिक विचारक के रूप में दिया गया. कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उनकी एक बड़ी प्रतिमा लगी हुई है.
दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटीज में एक ऑक्सफोर्ड ने एक सर्वे किया, जिसमें पिछले 10,000 वर्षों के इतिहास के सबसे प्रतिभाशाली व्यक्तियों की सूची तैयार की गई. इस सर्वे में डॉ. अंबेडकर का नाम उन शीर्ष हस्तियों में शामिल था जिन्होंने मानव समाज की सोच को पूरी तरह बदल दिया.
कोलंबिया यूनिवर्सिटी, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स समेत कई जगहों पर उनकी बड़ी प्रतिमाएं लगी हैं.
मैरीलैंड में ऊंची प्रतिमा
अमेरिका के मैरीलैंड में उनकी 19 फीट की प्रतिमा को ‘स्टेच्यू ऑफ जस्टिस’ नाम दिया गया है. ये दुनिया को यह संदेश देता है कि अंबेडकर केवल दलितों के नेता नहीं बल्कि न्याय के वैश्विक प्रतीक हैं.
बाबासाहेब दुनिया के पहले और अकेले व्यक्ति हैं जिनकी प्रतिमा लंदन के ‘म्यूजियम ऑफ लंदन’ में कार्ल मार्क्स की प्रतिमा के साथ लगाई गई है जो दिखाता है कि दुनिया उन्हें समाजवाद और समानता के बड़े विचारकों के बराबर मानती है.
लंदन के लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में उनकी प्रतिमा के नीचे उनके द्वारा दी गई वह प्रसिद्ध स्पीच का हिस्सा लिखा है, जिसमें उन्होंने शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार बताया था. वहां अंबेडकर को उनके सबसे प्रतिभाशाली छात्रों में गिना जाता है.
वियतनाम में शोध
हाल के वर्षों में वियतनाम जैसे देशों में भी उनके विचारों के प्रति रुचि बढ़ी है. वहां के विद्वान यह शोध कर रहे हैं कि कैसे अंबेडकर ने ‘बौद्ध धम्म’ को सामाजिक बदलाव और वैज्ञानिक सोच के साथ जोड़कर एक आधुनिक स्वरूप दिया.
ग्लोबल इकोनॉमिक्स में योगदान
बहुत कम लोग जानते हैं कि बाबासाहेब ने ‘हिल्टन यंग कमीशन’ के सामने जो विचार रखे थे, उन्हीं के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक की नींव रखी गई. आज भी दुनिया भर के अर्थशास्त्री उनकी किताब ‘द प्रॉब्लम ऑफ द रुपी’ को मुद्रा प्रबंधन के लिए एक बुनियादी ग्रंथ मानते हैं.


