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उम्र बढ़ी लेकिन, समझ नहीं बढ़ रही है..चर्चित मनोवैज्ञानिक ने बताया क्या है डेवलपमेंटल डिले

Last Updated:June 17, 2026, 20:23 IST

इंजीनियर आर. शंकर के मुताबिक इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. मस्तिष्क के विकास में आई कुछ कमियां, आनुवंशिक कारण और न्यूरोलॉजिकल विकास से जुड़ी समस्याएं इसके प्रमुख कारण मानी जाती हैं. कई मामलों में बच्चे का शारीरिक विकास सामान्य रूप से होता रहता है, लेकिन मस्तिष्क का विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाता.

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बेगूसराय: आज के दौर में इंसान के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं लगातार सामने आ रही हैं. इनमें से एक है डेवलपमेंटल डिले या डेवलपमेंटल डिसऑर्डर. कई बार बच्चे युवा हो जाते हैं. उम्र 10, 20 या 30 साल तक पहुंच जाती है, लेकिन समझ, व्यवहार या खुद को व्यक्त करने की क्षमता उनकी वास्तविक उम्र से काफी कम रहती है. कई मामलों में तो ऐसे इंसान को समाज पागल समझ लेता है लेकिन ऐसा नहीं है. मनोविज्ञान का मानना है कि ऐसे मामलों में समय पर पहचान सबसे जरूरी है, क्योंकि पहचान ही इलाज की पहली सीढ़ी है.

पश्चिम बंगाल से आए देवेंद्र राय ने बेगूसराय में लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उनके बच्चे में ऐसी ही समस्या है. उन्होंने बताया कि इलाज के लिए अब तक करीब 2.50 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं. रांची तक जाकर इलाज कराया, लेकिन उन्हें कभी स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया कि बच्चे को आखिर समस्या क्या है. डॉक्टर अक्सर कहते रहे कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. आखिर वो समय कब आएगा. जवाब में सिर्फ निराशा मिलती है. उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि उनका बच्चा कभी ठीक नहीं होगा. देवेंद्र राय की कहानी ने ये बताया कि सही से बीमारी की पहचान नहीं होने से इलाज में जिंदगी भर की जमा पूंजी खत्म हो जाती है. बच्चे उम्र के हिसाब से मानसिक रूप से विकसित नहीं हो पाते और समाज उन्हें सामान्य रूप से “पागल” समझकर छोड़ देता है. ऐसे में बीमारी की सही पहचान और जागरूकता बेहद जरूरी हो जाती है.

इस बारे में दुनिया के चर्चित मनोवैज्ञानिक इंजीनियर आर. शंकर ने जानकारी दी. आर शंकर ने 150 देशों में इस टॉपिक को पढ़ाया है और उनकी लिखी किताबें पढ़ी जाती हैं. उन्होंने बताया कि डेवलपमेंटल डिले का मतलब है कि बच्चे का मानसिक विकास उसकी उम्र के अनुरूप नहीं हो पाता. उदाहरण के तौर पर यदि कोई बच्चा 12 साल का है, लेकिन उसकी समझ 6 साल के बच्चे जैसी है, तो यह डेवलपमेंटल डिले का संकेत हो सकता है. यह समस्या केवल समझ तक सीमित नहीं होती, बल्कि भाषा, व्यवहार और सामाजिक कौशल को भी प्रभावित कर सकती है.

कई रूपों में दिखाई देती है समस्याइन्होंने लोकल 18 पर आगे बताया डेवलपमेंटल डिले कई प्रकार का हो सकता है. कुछ बच्चे सामाजिक व्यवहार में पीछे रह जाते हैं और यह नहीं समझ पाते कि लोगों से किस तरह बातचीत करनी है. कुछ बच्चों में समझने और सीखने की क्षमता कमजोर होती है, जिसे कॉग्निटिव डेवलपमेंट में देरी कहा जाता है. वहीं कुछ बच्चे अपनी बात ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते और उनकी अभिव्यक्ति क्षमता उम्र के हिसाब से विकसित नहीं हो पाती.

क्या हो सकते हैं इसके कारण?इंजीनियर आर. शंकर के मुताबिक इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. मस्तिष्क के विकास में आई कुछ कमियां, आनुवंशिक कारण और न्यूरोलॉजिकल विकास से जुड़ी समस्याएं इसके प्रमुख कारण मानी जाती हैं. कई मामलों में बच्चे का शारीरिक विकास सामान्य रूप से होता रहता है, लेकिन मस्तिष्क का विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाता. इन्होंने आगे बताया कि इस स्थिति में मस्तिष्क के न्यूरोलॉजिकल फंक्शन प्रभावित हो सकते हैं. कुछ बच्चों में न्यूरॉन्स की संवेदनशीलता जरूरत से कम होती है, जबकि कुछ में जरूरत से ज्यादा. दोनों ही स्थितियों में बच्चा चीजों को समझने, सीखने और प्रतिक्रिया देने में कठिनाई महसूस कर सकता है. इसी वजह से उसकी मानसिक, सामाजिक और भाषाई क्षमताओं का विकास प्रभावित होता है.

उपचार के दो प्रमुख तरीके बताएमनोविज्ञान इंजीनियर आर. शंकर ने बताया कि डेवलपमेंटल डिले से जुड़े कई मामलों में न्यूरोलॉजिकल स्तर पर काम किया जाता है. उनके अनुसार यदि बच्चे के न्यूरॉन्स की संवेदनशीलता (न्यूरो सेंसिटिविटी) सामान्य से कम होती है, तो तकनीकों के माध्यम से बढ़ाने का प्रयास किया जाता है, ताकि बच्चा चीजों को बेहतर तरीके से समझ सके और सीख सके.वहीं दूसरी स्थिति में यदि बच्चे के न्यूरॉन्स की संवेदनशीलता जरूरत से ज्यादा होती है, तो उसे नियंत्रित करने पर काम किया जाता है. आर. शंकर के मुताबिक ऐसे मामलों में बच्चा जानकारी को सही तरीके से प्रोसेस नहीं कर पाता, जिससे उसकी समझ, तर्क क्षमता और अभिव्यक्ति प्रभावित होती है. उन्होंने बताया कि दोनों स्थितियों में अलग-अलग प्रकार की तकनीकों के जरिए सुधार का प्रयास किया जाता है.

About the AuthorRajneesh Singh

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