बिना आहट के खत्म हो रही है एक पूरी दुनिया, पश्चिमी घाट से गायब हुए 35% ड्रैगनफ्लाई, बजी खतरे की घंटी!

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बिना आहट के खत्म हो रही है एक पूरी दुनिया, पश्चिमी घाट से 35% ड्रैगनफ्लाई गायब
Last Updated:May 05, 2026, 21:53 IST
पश्चिमी घाट में हुए एक नए सर्वे में खुलासा हुआ है कि ड्रैगनफ्लाई और डैम्सफ्लाइ की 35% प्रजातियां गायब हो चुकी हैं. शहरीकरण और प्रदूषण के कारण मीठे पानी का इकोसिस्टम तबाह हो रहा है. ये कीट पर्यावरण की सेहत बताने वाले मुख्य संकेतक होते हैं. इनका गायब होना पूरे बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट के लिए एक गंभीर खतरे का संकेत है.
पश्चिमी घाट से गायब हुई ड्रैगनफ्लाई. (Photo made with Generative AI)
नई दिल्ली: दुनिया के सबसे बेहतरीन बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट में शामिल पश्चिमी घाट से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है. एक हालिया सर्वे में खुलासा हुआ है कि भारत में पाई जाने वाली ड्रैगनफ्लाई (व्याध पतंग) और डैम्सफ्लाइ (सुई कीड़ा) की एक तिहाई प्रजातियां गायब हो चुकी हैं. हाल के सालों में जिस तेजी से शहरीकरण बढ़ा है, उसने इन कीटों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है. रिसर्चर्स के अनुसार, यह गिरावट ग्लोबल लेवल पर कीटों की आबादी में आ रही भारी कमी का एक बड़ा संकेत है. पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में हुआ यह दो साल का सर्वे बताता है कि वहां के इकोसिस्टम में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.
इकोसिस्टम के लिए खतरे की घंटी है ड्रैगनफ्लाई का गायब होना
रिसर्चर्स ने चेतावनी दी है कि ड्रैगनफ्लाई और डैम्सफ्लाइ की प्रजातियों का स्थानीय स्तर पर खत्म होना बहुत चिंताजनक है. इन कीटों को ओडोोनेट्स भी कहा जाता है और ये पर्यावरण में होने वाले बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं.
ये कीट अपने प्रजनन के लिए मीठे पानी के इकोसिस्टम पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं.
इसका मतलब है कि इनका जीवन चक्र छोटा होता है और ये पर्यावरण में आने वाले किसी भी बदलाव पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं. अगर ये पश्चिमी घाट से गायब हो रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि वहां के जल निकायों की सेहत बहुत खराब हो चुकी है.
2 साल के गहन सर्वे में क्या चौंकाने वाले सच आए सामने?
पश्चिमी घाट में प्रजातियों की कमी के पीछे क्या हैं मुख्य कारण?
About the Authorदीपक वर्माDeputy News Editor
दीपक वर्मा हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़ एडिटर के रूप में कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक से भी ज्यादा का अनुभव रखने वाले दीपक मुख्य रूप से विज्ञान, राजनीति और भारत के आंतरिक घ…और पढ़ें
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ये कीट अपने प्रजनन के लिए मीठे पानी के इकोसिस्टम पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं.
इसका मतलब है कि इनका जीवन चक्र छोटा होता है और ये पर्यावरण में आने वाले किसी भी बदलाव पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं. अगर ये पश्चिमी घाट से गायब हो रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि वहां के जल निकायों की सेहत बहुत खराब हो चुकी है.
2 साल के गहन सर्वे में क्या चौंकाने वाले सच आए सामने?
पश्चिमी घाट में प्रजातियों की कमी के पीछे क्या हैं मुख्य कारण?
पश्चिमी घाट 1600 किलोमीटर लंबी पर्वत श्रृंखला है, जहां अब प्रजातियों की भारी गिरावट और आवास विनाश देखा जा रहा है.
इकोलॉजिस्ट पंकज कोपार्डे के अनुसार, सर्वे में केवल 65 प्रतिशत प्रजातियों का मिलना आवासों के नुकसान की ओर इशारा करता है. इसके पीछे कई बड़े कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें बुनियादी ढांचे का विकास और जलविद्युत परियोजनाएं शामिल हैं.
नदियों में बढ़ता प्रदूषण और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव ने इन कीटों के घरों को उजाड़ दिया है. इसके अलावा, बेकाबू टूरिज्म, जंगलों में बार-बार लगने वाली आग और क्लाइमेट चेंज इस संकट को और गहरा बना रहे हैं.
ग्लोबल लेवल पर कीटों की घटती आबादी का भारत पर क्या होगा असर?
हालिया स्टडीज बताती हैं कि पश्चिमी घाट में मीठे पानी के जानवरों की संख्या लगातार कम हो रही है. बाहरी हमलावर प्रजातियां भी स्थानीय जीवों के लिए खतरा बन गई हैं. दुनिया भर में कीटों की आबादी हर साल 1 से 2 प्रतिशत की दर से घट रही है. लगभग 40 प्रतिशत कीट प्रजातियां आज विलुप्त होने की कगार पर हैं.
अगर पश्चिमी घाट जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र से ड्रैगनफ्लाई जैसी प्रजातियां गायब होती हैं, तो यह पूरे फूड चेन को बिगाड़ सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पश्चिमी घाट की ये रंगीन दुनिया हमेशा के लिए खत्म हो सकती है.
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