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भारत में पहली बार पेड़-पौधों से बने विटामिन डी 3 सप्लीमेंट को मंजूरी, देश में 30 फीसदी लोगों को इस विटामिन की कमी

Last Updated:July 09, 2026, 18:13 IST

Vitamin D3: विटामिन डी 3 हमारे लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व है. यह कुदरती रूप से सूरज की रोशनी से अपने आप हमारे शरीर में बन जाता है लेकिन कई कारणों से भारत के लगभग 30 फीसदी लोगों में विटामिन डी की कमी होती है. विटामिन डी की कमी से हमारी मांसपेशियों में संकुचन नहीं होगा जिससे हम कोई काम नहीं कर पाएंगे. इसकी कमी से हड्डियां कमजोरी हो जाएंगी. इम्यूनिटी कमजोर हो जाएंगी, मूड खराब रहेगा और हार्ट पर सीधा असर पड़ेगा. ऐसे में FSSAI ने प्लांट आधारित विटामिन डी सप्लीमेंट को मंजूरी दी है.भारत में पहली बार पेड़-पौधों से बने विटामिन डी 3 सप्लीमेंट को मंजूरी Zoomविटामिन डी 3.

Vitamin D3 : विटामिन डी सबसे ज्यादा सूरज की रोशनी से मिलता है. भारत में धूप की कोई कमी नहीं है लेकिन हैरानी इस बात की है भारत में 70 प्रतिशत लोगों में विटामिन डी की कमी पाई गई है. विटामिन डी हमारी जिंदगी के लिए महत्वपूर्ण है. अगर विटामिन डी की कमी हो जाए तो हमें अपने हाथ-पैरों को चलाने में भी दिक्कत हो जाएगी. यादाश्त बिल्कुल कमजोर हो जाएगा और हम पंगु हो जाएंगे. जब डॉक्टर किसी व्यक्ति में विटामिन डी की कमी पाते हैं तो उन्हें विटामिन डी सप्लीमेंट के लिए दवा लिखते हैं. ये दवा रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बने सॉल्ट से बनी होती हैं लेकिन भारत में अब प्लांट से तैयार विटामिन डी को मंजूरी मिल गई है.

दवा को कैसे बनाया गया विटाडी को सोयाबीन के तेल के उत्पादन के दौरान बचने वाले अवशेष वेस्ट स्ट्रीम से निकाले गए फाइटोस्टेरॉल से तैयार किया गया है. यह पूरी तरह पौधों से प्राप्त विटामिन डी 3 है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि आपकी दवा की अलमारी में रखी विटामिन डी की गोलियां तुरंत बदल जाएंगी. लेकिन इससे लोगों के पास विटामिन डी के अधिक विकल्प उपलब्ध हो जाएंगे. यह खास तौर पर भारत जैसे देश के लिए महत्वपूर्ण है, जहां भरपूर धूप होने के बावजूद विटामिन डी की कमी एक आम समस्या बनी हुई है. साथ ही शाकाहारी और वीगन जीवनशैली अपनाने वाले लोगों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह नया पौध-आधारित विकल्प उनकी खान-पान संबंधी जरूरतों के अनुरूप एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है. पिछले वर्ष इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस और अन्वका फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘रोडमैप टू एड्रेस विटामिन डी डेफिशिएंसी इन इंडिया’ में बताया गया था कि भारत में हर पांच में से एक व्यक्ति विटामिन डी की कमी से जूझ रहा है. यह शरीर के लिए बेहद जरूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट है.

ज्यादा विकल्प उपलब्ध होंगे भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने फरमेंटा बायोटेक द्वारा विकसित विटाडी दवा को मंजूरी दे दी है. यह दवा पौधों से प्राप्त विटामिन डी 3 है. विटामिन डी को मेडिकल टर्म में कोलेकैल्सीफेरॉल कहा जाता है. मंजूरी मिलने के बाद दवा कंपनियां अब विटामिन डी सप्लीमेंट को किसी खाद्य पदार्थ में भी मिला सकता है. जब किसी देश में बड़े पैमाने पर किसी पोषक तत्व की कमी हो जाए तो इसके लिए सरकार अनाज या पेय पदार्थ में इसे मिला देता है ताकि सार्वजनिक रूप से यह समस्या दूर हो. इसलिए यह मंजूरी बेहद महत्वपूर्ण है. विटामिन डी हड्डियों, मांसपेशियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता को स्वस्थ बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है. सामान्यतः हमारी त्वचा सूर्य की रोशनी के संपर्क में आने पर विटामिन डी बनाती है. लेकिन लंबे समय तक घर या दफ्तर के भीतर काम करना, बढ़ते प्रदूषण, सनस्क्रीन का अधिक इस्तेमाल और बदलती लाइफस्टाइल के कारण भारतीयों में कुदरती रूप से पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी नहीं बन पाता. नए उत्पाद को मिली मंजूरी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अब भारत में पौधों से प्राप्त विटामिन डी3 का बड़े पैमाने पर फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों और पोषण संबंधी उत्पादों में इस्तेमाल किया जा सकेगा.

पहले कैसे तैयार होता था विटामिन डी अधिकांश लोगों को यह जानकारी नहीं होती कि बाजार में मिलने वाले पारंपरिक विटामिन डी 3 सप्लीमेंट आमतौर पर पशु स्रोतों से बनाए जाते हैं. इंडिया टूडे की खबर में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार बताते हैं कि दुनिया भर में बिकने वाले अधिकांश विटामिन डी3 का निर्माण लैनोलिन से होता है. लैनोलिन एक प्राकृतिक मोम जैसा पदार्थ है, जिसे भेड़ की ऊन से निकाला जाता है. निर्माण प्रक्रिया में सबसे पहले लैनोलिन से 7-डीहाइड्रोकोलेस्ट्रॉल नामक यौगिक अलग किया जाता है. इसके बाद इसे अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में लाकर कोलेकैल्सीफेरॉल (विटामिन डी3) बनाया जाता है. यही विटामिन डी3 सामान्य सप्लीमेंट्स में भी मौजूद होता है. हालांकि डॉ. सुधीर कुमार स्पष्ट करते हैं कि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि लैनोलिन से बना विटामिन डी 3 कम प्रभावी या असुरक्षित है. इसका उपयोग कई दशकों से सुरक्षित और प्रभावी तरीके से किया जा रहा है. साथ ही विटामिन डी3 बनाने के लिए भेड़ों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाता. असल फर्क इस बात में नहीं है कि शरीर में विटामिन डी3 कितना प्रभावी है, बल्कि यह किस स्रोत से प्राप्त किया गया है. पौधों से प्राप्त विटामिन डी3 के निर्माण में किसी भी पशु-आधारित कच्चे माल का इस्तेमाल नहीं किया जाता. दुनिया के कई देशों में इसके लिए लाइकेन का उपयोग किया जाता है, जबकि नई तकनीकों में किण्वन (फर्मेंटेशन) की प्रक्रिया से भी वही विटामिन डी3 तैयार किया जा रहा है.

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18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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