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Japan Buy Oil From Russia: दोस्त से गद्दारी? होर्मुज संकट के आगे मजबूर हुआ अमेरिका का जिगरी यार, रूस से 4 साल बाद खरीदा तेल

US Japan relations: जापान अमेरिका का सबसे भरोसेमंद एशियाई साथी है. लेकिन जापान ने अचानक पुरानी दोस्ती की सीमाएं लांघ दी हैं. होर्मुज की नाकेबंदी ने मिडिल ईस्ट से आने वाले तेल के रास्ते को रोक रखा है और टोक्यो को मजबूरन रूस की ओर रुख करना पड़ा. साल 2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार जापान ने रूस से तेल खरीदा है. यह फैसला सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा का नहीं, बल्कि कूटनीतिक मजबूरी का भी प्रतीक है. जब अपना अस्तित्व दांव पर हो तो दोस्ती के नाम पर भावनाएं ज्यादा दिन नहीं टिक पातीं. जापान जो 90 प्रतिशत से ज्यादा कच्चे तेल के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर है, अब अपनी रणनीतिक जरूरतों को प्राथमिकता दे रहा है. अमेरिका-ईरान तनाव के बीच होर्मुज संकट ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को हिला दिया है. जापान का यह कदम दिखाता है कि ऊर्जा संकट के समय राष्ट्र पहले अपनी जनता और अर्थव्यवस्था को बचाते हैं फिर गठबंधनों की चिंता करते हैं.

इस खबर ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है. जापान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रणनीतिक तेल भंडार है, फिर भी उसने रूस से ब्लेंड खरीद लिया. ओमानी झंडे वाले टैंकर वॉयेजर 3 मई को शिकोकू द्वीप के किकुमा बंदरगाह पर पहुंचने वाला है. ताइयो ऑयल की रिफाइनरी को यह तेल मिलेगा. जापान सरकार ने राष्ट्रीय भंडारों से अतिरिक्त 20 दिनों की खपत के बराबर तेल छोड़ने का फैसला भी किया है. प्रधानमंत्री सनाए टाकाइची ने स्पष्ट कहा कि मई के लिए 60 प्रतिशत तेल की जरूरत होर्मुज से दूर के रास्तों से पूरी की जाएगी. इस बीच जापान अपनी पुरानी दोस्ती और नई मजबूरियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.

होर्मुज संकट के बीच जापान ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी है.

जापान की मजबूरी, रूस का अवसर और अमेरिका की चुप्पी

यह पूरा घटनाक्रम तीन बड़े पहलुओं को सामने लाता है, जापान की ऊर्जा मजबूरी, रूस के लिए खुलता नया अवसर और अमेरिका की अपेक्षाकृत शांत प्रतिक्रिया. जापान के लिए यह फैसला उसकी ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है. रूस के लिए यह पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच एक नया बाजार है. वहीं अमेरिका जो जापान का सबसे बड़ा सहयोगी है, इस पर खुलकर प्रतिक्रिया देने से बचता नजर आ रहा है.
जापान की ऊर्जा व्यवस्था काफी हद तक आयात पर निर्भर है और उसमें भी पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से ज्यादा है. होर्मुज जलडमरूमध्य इस सप्लाई का सबसे अहम रास्ता है. जब यही रास्ता अस्थिर हो जाए तो किसी भी देश के लिए विकल्प तलाशना जरूरी हो जाता है. यही कारण है कि जापान ने रूस से तेल खरीदने का जोखिम उठाया.
दूसरी ओर जापान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रणनीतिक तेल भंडार है, इसमें करीब 44 करोड़ बैरल तेल जमा है. यह भंडार उसकी 200 दिनों से ज्यादा की जरूरत को पूरा कर सकता है. इसके बावजूद जापान सिर्फ भंडार पर निर्भर नहीं रहना चाहता. वह लगातार नए स्रोत भी तलाश रहा है ताकि संकट लंबा खिंचने पर भी आपूर्ति बनी रहे.

जापान की तेल खरीदारी: क्यों और कैसे?

रूस की समाचार एजेंसी TASS के अनुसार जापान ने सखालिन ब्लेंड ग्रेड का तेल खरीदा है. यह तेल ओमानी झंडे वाले टैंकर ‘वॉयेजर’ के जरिए भेजा गया है. यह 3 मई को किकुमा पोर्ट पहुंचेगा. ताइयो ऑयल ने भी इस खरीद की पुष्टि की है और कहा है कि यह पूरी प्रक्रिया सरकार के समन्वय से हो रही है. साथ ही जापान ने इबाराकी समेत कई ठिकानों से 58 लाख किलोलीटर तेल जारी करने का फैसला किया है.

रणनीतिक भंडार और सरकार की तैयारी

जापान के पास 44 करोड़ बैरल का विशाल तेल भंडार है, जो उसे किसी भी बड़े संकट में सहारा देता है. सरकार पहले ही करीब 50 दिनों के बराबर भंडार जारी कर चुकी है और अब अतिरिक्त 20 दिनों का तेल बाजार में उतार रही है. इसके अलावा जापान ने सऊदी अरब, यूएई और कुवैत में भी अपने तेल भंडार सुरक्षित रखे हैं, जिससे जरूरत पड़ने पर तुरंत सप्लाई मिल सके.

अमेरिका-जापान संबंधों पर क्या असर?

हालांकि जापान का यह कदम चौंकाने वाला है, लेकिन इससे अमेरिका-जापान संबंधों में कोई बड़ा बदलाव आने की संभावना कम है. दोनों देशों के बीच सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी मजबूत बनी हुई है. ऊर्जा के मामले में हर देश अपनी जरूरतों को प्राथमिकता देता है. जापान का यह फैसला भी उसी दिशा में एक व्यावहारिक कदम है, न कि किसी तरह की राजनीतिक दूरी का संकेत.

क्या जापान का रूस से तेल खरीदना अमेरिका के साथ गद्दारी है?

जापान ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी है. होर्मुज संकट में मध्य पूर्व पर 90% निर्भरता घातक साबित हो सकती थी. रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल करते हुए भी जापान ने वैकल्पिक स्रोत तलाशे. अमेरिका-जापान सुरक्षा गठबंधन अभी भी मजबूत है लेकिन ऊर्जा मामलों में हर देश अपनी राष्ट्रीय हितों को पहले रखता है. यह फैसला मजबूरी का नजर आ रहा है.

जापान के पास इतना बड़ा तेल भंडार होने के बावजूद रूस से खरीद क्यों?

44 करोड़ बैरल का भंडार 204 दिनों के लिए काफी है लेकिन लंबे संकट में निरंतर आपूर्ति जरूरी है. भंडार को खाली करने के बजाय नए स्रोत से खरीदारी जारी रखना समझदारी है. तेल आसानी से उपलब्ध हुआ और जापान की रिफाइनरी इसके लिए तैयार है. सरकार ने 50 दिनों के भंडार पहले ही छोड़े हैं और अब 20 दिन और छोड़ रही है. यह संतुलित रणनीति है जो भंडार को लंबे समय तक बनाए रखेगी.

इस घटना से वैश्विक तेल बाजार और कूटनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव हो सकता है लेकिन जापान जैसे बड़े खरीदार के नए स्रोत तलाशने से बाजार में कुछ संतुलन आएगा. रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद बाजार मिल रहा है. कई देश अब होर्मुज पर निर्भरता कम करने की कोशिश करेंगे. कूटनीति में यह याद दिलाता है कि ऊर्जा हमेशा राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा रहती है. संकट जितना लंबा चलेगा, ऐसे वैकल्पिक सौदे बढ़ते जाएंगे.

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